पश्चिम बंगाल की राजनीति अपनी तीव्रता और अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के संपन्न होते ही जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उन्होंने लोकतंत्र के इस उत्सव को एक तनावपूर्ण सस्पेंस थ्रिलर में बदल दिया है। मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, और एग्जिट पोल के नतीजों ने न केवल राज्य के भीतर बल्कि सीमा पार बांग्लादेश तक में खलबली मचा दी है। बंगाल की गलियों में इस समय केवल दो ही बातें तैर रही हैं, ईवीएम की सुरक्षा और काउंटिंग डे का मेगा प्लान।
एग्जिट पोल का असर: हिंसा की आहट और सियासी खौफ
जैसे ही टेलीविजन स्क्रीन्स पर एग्जिट पोल के नतीजे फ्लैश हुए, बंगाल के कई हिस्सों में चुनावी हिंसा ने एक बार फिर सिर उठा लिया। कई सर्वे एजेंसियों द्वारा भाजपा की संभावित बढ़त और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के गढ़ में सेंधमारी के दावों ने कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी। सत्तारूढ़ टीएमसी पर आरोप लगा है कि उन्होंने भाजपा के एक पोलिंग एजेंट के घर पर हमला किया और उनके साथ मारपीट की। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि 4 मई को होने वाली मतगणना केवल वोटों की गिनती नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए एक अग्निपरीक्षा होने वाली है।
स्ट्रॉन्ग रूम पर घमासान: आधी रात को जब सड़कों पर उतरीं ममता बनर्जी
बंगाल की राजनीति में ‘ईवीएम’ हमेशा से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। इस बार विवाद तब गहरा गया जब टीएमसी ने आरोप लगाया कि स्ट्रॉन्ग रूम की सील तोड़ी गई है और ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की कोशिश की जा रही है। विवाद इतना बढ़ा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद आधी रात को कोलकाता के शेखावत मेमोरियल स्कूल स्थित काउंटिंग सेंटर पहुँच गईं।
मुख्यमंत्री का खुद काउंटिंग सेंटर के भीतर जाकर मुआयना करना और ईवीएम की ‘रखवाली’ करना भाजपा को रास नहीं आया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने इसे ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए मौके पर हंगामा शुरू कर दिया। देखते ही देखते काउंटिंग सेंटर के बाहर टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए, जिससे पुलिस और केंद्रीय बलों को स्थिति संभालने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
चुनाव आयोग की सफाई: “अफवाहों पर न दें ध्यान”
बढ़ते बवाल को देखते हुए निर्वाचन आयोग को तुरंत स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। पश्चिम बंगाल के निर्वाचन आयुक्त ने साफ किया कि स्ट्रॉन्ग रूम का कोई ताला या सील नहीं तोड़ी गई है। आयोग ने बताया कि आधी रात को काउंटिंग सेंटर के भीतर ‘पोस्टल बैलेट’ (Postal Ballot) को अलग करने की नियमित प्रक्रिया चल रही थी, जिसकी जानकारी सभी राजनीतिक दलों को पहले ही दी गई थी। आयोग ने इसे एक मानक प्रक्रिया बताया जो हर चुनाव में अपनाई जाती है, लेकिन तनावपूर्ण माहौल में इस स्पष्टीकरण के बावजूद टीएमसी नेताओं का धरना जारी रहा।
काउंटिंग डे के लिए ‘मेगा सुरक्षा प्लान’
4 मई को होने वाली मतगणना के लिए प्रशासन ने एक अभूतपूर्व सुरक्षा खाका तैयार किया है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्टेडियम समेत राज्य के तमाम काउंटिंग सेंटर्स के बाहर केंद्रीय सुरक्षा बलों (Central Forces) की भारी तैनाती की गई है। कोलकाता के जॉइंट सीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी खुद मौके पर तैनात हैं। चूँकि एग्जिट पोल ने कांटे की टक्कर का संकेत दिया है, इसलिए प्रशासन को डर है कि नतीजों के दौरान या उसके तुरंत बाद प्रतिशोध की हिंसा भड़क सकती है। संवेदनशील इलाकों में ड्रोन से निगरानी और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की तैनाती की गई है।
बांग्लादेश में खलबली: सीमा पार क्यों है डर का माहौल?
बंगाल चुनाव के नतीजों का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश में भी इन एग्जिट पोल्स को लेकर भारी चिंता देखी जा रही है। वहाँ के राजनीतिक गलियारों और आम जनता में यह डर सता रहा है कि यदि भाजपा बंगाल की सत्ता में आती है, तो घुसपैठ और नागरिकता (CAA/NRC) जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाया जाएगा। बांग्लादेशी मीडिया और सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा गरम है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन का असर द्विपक्षीय व्यापार और सीमावर्ती सुरक्षा पर कैसा पड़ेगा। विशेषकर मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में एक अनिश्चितता का माहौल व्याप्त है।
लोकतंत्र की साख और जनता का फैसला
तमाम दावों, प्रतिदावों और विवादों के बीच असली फैसला उन मतपेटियों (EVM) में बंद है जिन्हें लेकर आज जंग छिड़ी हुई है। ममता बनर्जी की ‘ईवीएम पहरेदारी’ और भाजपा का ‘संवैधानिक मर्यादा’ का तर्क, दोनों ही 4 मई की सुबह फीके पड़ जाएंगे जब जनता का वास्तविक जनादेश सामने आएगा। बंगाल इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक तरफ विकास की उम्मीदें हैं और दूसरी तरफ राजनीतिक वर्चस्व की जंग। अब देखना यह है कि 4 मई का सूरज बंगाल के लिए शांति का संदेश लेकर आता है या फिर यह सियासी रंजिश एक नया मोड़ लेती है।





























