अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की हालिया रैंकिंग में भारत के छठे स्थान पर खिसकने की खबर ने बाजार और गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। लेकिन क्या वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है, या इसके पीछे कुछ और ही गणित है? कोटक म्यूचुअल फंड के प्रबंध निदेशक और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य नीलेश शाह ने इस स्थिति पर अपनी स्पष्ट राय दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह कोई गिरावट नहीं, बल्कि सांख्यिकीय समायोजन और मुद्रा की विनिमय दर में आए बदलाव का परिणाम है। भारत की अर्थव्यवस्था आज भी उन बुनियादी सिद्धांतों पर टिकी है जो इसे भविष्य की महाशक्ति बनाते हैं।
आंकड़ों का मायाजाल: गिरावट नहीं, बल्कि ‘रीकैलिब्रेशन’ का परिणाम
नीलेश शाह के अनुसार, भारत की वैश्विक रैंकिंग में आए इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से दो तकनीकी कारण हैं। पहला, भारत ने अपने जीडीपी (GDP) के आधार वर्ष (Base Year) में संशोधन किया है। दूसरा, पिछले एक साल के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आई है। इन दोनों कारकों के सम्मिलित प्रभाव के कारण भारत की जीडीपी का आंकड़ा कागजों पर 4 ट्रिलियन डॉलर के नीचे दिखाई देने लगा। शाह का तर्क है कि जब ग्लोबल रैंकिंग डॉलर के आधार पर तय होती है, तो मुद्रा के उतार-चढ़ाव और सांख्यिकीय संशोधनों से रैंकिंग बदल जाना स्वाभाविक है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत की वास्तविक विकास दर धीमी हुई है।
10वें से छठे स्थान का सफर: एक दशक की ऐतिहासिक उपलब्धि
अगर हम पिछले 12 सालों के सफर पर नज़र डालें, तो भारत की आर्थिक प्रगति की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं लगती। साल 2014 में भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। आज, तमाम चुनौतियों और सांख्यिकीय उतार-चढ़ाव के बावजूद, भारत छठे स्थान पर मजबूती से खड़ा है। शाह इसे देश के आर्थिक इतिहास की सबसे तेज वृद्धि बताते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह केवल एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि निरंतर नीतिगत सुधारों और संरचनात्मक बदलावों का परिणाम है। भारत ने पिछले एक दशक में जिस तरह से चार पायदानों की छलांग लगाई है, वह वैश्विक स्तर पर उसकी बढ़ती साख का प्रमाण है।
तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का लक्ष्य: सिर्फ दो-तीन साल की देरी
आईएमएफ (IMF) के नए अनुमानों के अनुसार, भारत अब 2031 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। पहले यह अनुमान 2027 या 2028 का था। नीलेश शाह इस बदलाव को किसी झटके (Setback) के रूप में नहीं देखते। उनका मानना है कि यह केवल दो से तीन साल की देरी (Delay) है, न कि कोई बड़ी गिरावट। भारत और उससे ऊपर की रैंकिंग वाली अर्थव्यवस्थाओं के बीच का अंतर अभी भी इतना है जिसे भारत अपनी तेज विकास दर के दम पर आने वाले वर्षों में आसानी से पाट सकता है। भारत की आर्थिक यात्रा का जो मार्ग (Trajectory) है, वह आज भी स्थिर और अडिग है।
समावेशी विकास: एक मजबूत और व्यापक आधार
भारत के विकास मॉडल की सबसे बड़ी खूबी इसकी ‘समावेशिता’ (Inclusivity) है। नीलेश शाह का तर्क है कि भारत जैसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था किसी एक कंपनी या किसी एक उद्यमी पर निर्भर नहीं रह सकती। भारत की प्रगति के पीछे विभिन्न क्षेत्रों—जैसे आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और सेवा क्षेत्र—का सामूहिक योगदान है। यह समावेशी दृष्टिकोण न केवल लंबी अवधि की स्थिरता सुनिश्चित करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि विकास का लाभ देश के विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों तक पहुंचे। यही वह ‘ब्रॉड-बेस्ड’ विकास है जो भारत को वैश्विक आर्थिक झटकों के खिलाफ एक ढाल प्रदान करता है।
नीतिगत निरंतरता: विकास की असली प्रेरक शक्ति
भारत की प्रगति का एक मुख्य स्तंभ ‘पॉलिसी कंटिन्यूटी’ (Policy Continuity) रही है। शाह ने इस बात का श्रेय निरंतरतापूर्ण आर्थिक नीतियों और सुधारों को दिया, जिसने भारत को 10वें स्थान से छठे स्थान तक पहुँचाया। नवाचार (Innovation), पूंजी निर्माण (Capital Formation) और बुनियादी ढांचे में निवेश ने विकास की गति को बनाए रखा है। नीलेश शाह का मानना है कि जब तक आर्थिक नीतियों की दिशा स्पष्ट और स्थिर रहेगी, भारत की विकास गाथा पर कोई आंच नहीं आएगी। रैंकिंग में आया हालिया बदलाव केवल एक सांख्यिकीय ‘शोर’ (Noise) है, जिसे भारत की वास्तविक आर्थिक शक्ति का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।




























