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ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए कैसे मजबूर किया ?

TFI Expert द्वारा TFI Expert
10 May 2026
in आयुध, रक्षा, रणनीति
ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को सीजफायर के लिए कैसे मजबूर किया

युद्ध के बाद पाकिस्तान की बेचैनी ही उसकी हार की असली कहानी कहती है

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10 मई 2025, यानी आज से ठीक एक साल पहले पाकिस्तान के DGMO की तरफ़ से भारत के DGMO (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स) को फ़ोन कर सीजफायर की गुहार लगाई गई थी, जिसे भारत द्वारा स्वीकार भी कर लिया गया था। हालांकि भारत द्वारा स्पष्ट कर दिया गया था कि वो ऑपरेशन सिंदूर को खत्म नहीं कर रही है, बस इसे रोका गया है।
हालांकि पाकिस्तान के जनरलों ने इस सीजफायर को अपनी रणनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश की। लेकिन संघर्ष के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तानी सेना के अंदर जो घटनाक्रम देखने को मिले, वो एक बिल्कुल अलग कहानी बयां करते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत 7 मई 2025 की सुबह भारत द्वारा पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू–कश्मीर में आतंकवादी ढांचे से जुड़े नौ ठिकानों पर सटीक हमलों के साथ हुई। महत्वपूर्ण बात यह थी कि भारत ने जानबूझकर पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना नहीं बनाया और सार्वजनिक रूप से ये साफ़ भी किया। यह भारत की ओर से संयम का स्पष्ट संकेत था, ताकि पाकिस्तान को तनाव कम करने और युद्ध में न उतरने का एक मौका दिया जा सके– लेकिन पाकिस्तान ने वह रास्ता नहीं चुना।

8 से 10 मई के बीच पाकिस्तान ने ड्रोन, रॉकेट और लंबी दूरी की तोपों से भारतीय ठिकानों पर हमला किया। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह जवाब सैन्य रूप से न सिर्फ अप्रभावी और बेअसर साबित हुआ, बल्कि रणनीतिक रूप से विनाशकारी भी साबित हुआ। पाकिस्तान के अधिकांश ड्रोन भारतीय एयर डिफेंस द्वारा हवा में में ही मार गिराए गए, जबकि उसकी गोलाबारी से भी कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ।

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लेकिन इस सबके बीच पाकिस्तान की सबसे बड़ी गलती यह थी कि इस प्रतिक्रिया ने भारत को वह जवाब देने का अवसर दे दिया, जिसकी पाकिस्तान ने कल्पना भी नहीं की थी।

भारत ने एक समन्वित अभियान में पाकिस्तान के 11 एयरबेसों पर हमला किया। इनमें नूर खान एयरबेस भी शामिल था, जो पाकिस्तान के जनरल मुख्यालय और इस्लामाबाद कैपिटल टेरिटरी के बेहद करीब स्थित है।

ऑपरेशन सिंदूर: सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक संदेश

ऑपरेशन सिंदर के ज़रिए भारत की ये जवाबी कार्रवाई सिर्फ सैन्य क्षमता का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक संदेश भी था कि अगर भारत चाहे तो पाकिस्तान के रणनीतिक और कमांड केंद्रों तक सीधे पहुंच सकता है।

संदेश साफ था: अगर तनाव बढ़ा, तो परिणाम पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर होंगे।इस प्रभावशाली और सटीक प्रहार के कुछ ही घंटों के भीतर पाकिस्तान युद्धविराम की कोशिशों में जुट गया।

लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है।

संघर्ष के बाद के हफ्तों और महीनों में पाकिस्तान ने अपने इतिहास के सबसे तेज सैन्य पुनर्गठन और हथियार खरीद अभियानों में से एक शुरू किया। और सबसे दिलचस्प बात यह रही कि लगभग हर नई खरीद उसी कमजोरी की ओर इशारा करती थी, जो ऑपरेशन SINDOOR के दौरान उजागर हुई थी।

पाकिस्तानी सेना के अंदर भारी फेर–बदल ऑपरेशन सिंदूर की कहानी बताते हैं

जमीनी मोर्चे पर पाकिस्तान ने FATAH-सीरीज रॉकेट सिस्टम के इर्द–गिर्द एक नया Army Rocket Force Command बनाया। गुजरांवाला और पानो अकील की आर्टिलरी फॉर्मेशनों को ARF Division (North) और ARF Division (South) में पुनर्गठित किया गया। अतिरिक्त मिसाइल रेजिमेंटों को सीधे GHQ के अधीन लाया गया। ये कदम बताता है कि पाकिस्तान के पास लंबी दूरी के सटीक हमलों की क्षमता की भारी कमी थी।

लगातार संघर्ष के दौरान गोला–बारूद की कमी उजागर होने के बाद 155mm आर्टिलरी गोला–बारूद उत्पादन सुविधा को भी तेजी से आगे बढ़ाया गया। पाकिस्तान ने चीन से 25 से अधिक रेजिमेंटों के लिए SH-15 Mounted Gun Systems खरीदने का निर्णय लिया ताकि उसकी आर्टिलरी की मोबिलिटीऔर सुरक्षा बेहतर हो सके। संघर्ष के दौरान ऐसी खबरें भी सामने आईं कि इन सिस्टमों को नागरिक इलाकों से संचालित किया गया, ताकि भारतीय हमलों से बचाया जा सके। (पाकिस्तान जानता है कि भारतीय सेनाएं नागरिक इलाकों को निशाना नहीं बनातीं)

हवाई मोर्चे पर अगस्त 2025 तक चीन के Z-10ME अटैक हेलिकॉप्टर No. 31 Attack Helicopter Squadron में शामिल किए गए। यह उस कमी को भरने की कोशिश थी, जो युद्ध के दौरान Close Air Support में स्पष्ट रूप से सामने आई थी।

इसके साथ ही बहावलपुर कॉर्प्स के अंतर्गत एक डेडीकेटेड UAV फोर्स बनाई गई, जो ISR और टार्गेटिंग ड्रोन पर केंद्रित थी। यह पाकिस्तान के असफल ड्रोन अभियान के बाद की प्रतिक्रिया थी।

इसके बाद चीन के CH-4 और CH-5 कॉम्बैट ड्रोन तथा SA-180 लोइटरिंग म्यूनिशन के लिए समझौते हुए। निम्न–स्तरीय हवाई खतरों से निपटने के लिए तुर्की के KORKUT एयर–डिफेंस सिस्टम खरीदे गए, जबकि OMTAS और ERYX एंटी–टैंक मिसाइलों को युद्ध के दौरान उजागर हुई कमजोरियों को दूर करने के लिए शामिल किया गया।

पाकिस्तान ने अपने टैंक बेड़े के आधुनिकीकरण को भी तेज किया और चीनी VT-4 टैंकों की खरीद का फैसला लिया गया। पाकिस्तान में इन्हें MBT Haider का नाम दिया गया है।
समुद्री क्षेत्र में भी खरीद अभियान जारी रहा। तुर्की के MILGEM-क्लास कॉर्वेट और Hangor-क्लास पनडुब्बियां शामिल की गईं। युद्धविराम के कुछ ही दिनों के भीतर पाकिस्तान और तुर्की के बीच इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सहयोग समझौता हुआ, जो इस बात का संकेत था कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और नेटवर्क संबंधी कमजोरियां संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के लिए सबसे बड़े झटकों में से थीं।

सैन्य नहीं, संस्थागत बदलाव ने उजागर की पाकिस्तान की कमजोरी

रिपोर्टों के अनुसार, 27वें संवैधानिक संशोधन के जरिए Chairman Joint Chiefs of Staff Committee के पद को समाप्त कर एक नया Chief of Defence Forces ढांचा बनाया गया, जिससे सैन्य शक्ति और अधिक केंद्रीकृत होकर सेना प्रमुख के हाथों में चली गई। यह इस बात का संकेत था कि युद्ध के दौरान पाकिस्तान की संयुक्त सैन्य कमान दबाव में कमजोर साबित हुई।
इसके साथ ही Commander, National Strategic Command का नया पद भी बनाया गया, जिसे एक लेफ्टिनेंट जनरल के अधीन रखा गया। यह साफ संकेत था कि भारत द्वारा गहरे हमले करने की क्षमता ने पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence) की विश्वसनीयता को भी झटका दिया।

पाकिस्तान की सैन्य थकान भी सामने आई

एक तरफ उसकी सेनाएं सऊदी अरब में Strategic Mutual Defence Agreement के तहत तैनात थीं, दूसरी ओर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में ऑपरेशन अज्म ए इश्तेकाम चल रहा था। साथ ही अफगान सीमा पर ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक़ के तहत तनाव बढ़ रहा था। ऐसे में भारत के साथ लंबा पारंपरिक संघर्ष पाकिस्तान के लिए सैन्य और लॉजिस्टिक रूप से भारी पड़ने वाला था।

पाकिस्तान ने भले ही अपने जवाबी अभियान ऑपरेशन बुनयान उन मरसूस को बड़ी जीत के रूप में प्रस्तुत किया हो, लेकिन असली सच उसके बाद के फैसलों में दिखाई देता है।

हथियारों की आपात खरीद, सैन्य पुनर्गठन, संवैधानिक बदलाव और तेजी से शुरू किए गए क्षमता–वृद्धि कार्यक्रम इस बात की गवाही देते हैं कि पाकिस्तान एक ऐसे संघर्ष से निकला, जिसने उसकी सैन्य और रणनीतिक कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया। और शायद यही सबसे बड़ा कारण था कि पाकिस्तान ने कुछ घंटों के अंदर ही युद्धविराम की राह पकड़ ली।

ये लेख TFIPost के लिए अजीत अमर सिंह ने लिखा है।
अजीत अमर सिंह वरिष्ठ रक्षा पत्रकार और विश्लेषक हैं, जिनके पास दक्षिण एशिया के सबसे संवेदनशील और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में रक्षा एवं सामरिक मामलों की रिपोर्टिंग का एक दशक से अधिक का अनुभव है।
अंग्रेजी में मूल लेख को पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें।

Tags: #पाकिस्तान_कड़ा_संदेशऑपरेशन सिंदूरपाकिस्तानी सेनाभारत- पाक सीजफायरभारतीय वायु सेनाभारतीय सेनाराफेल
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