‘पुष्पा झुकेगा नहीं’ कहने वाले TMC के जहांगीर खान चुनाव से पहले झुके? फाल्टा री-पोलिंग से पहले वापस लिया नामांकन!

पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित यू-टर्न देखने को मिला, जब दक्षिण 24 परगना जिले की हाई-प्रोफाइल फाल्टा विधानसभा सीट से सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक प्रत्याशी जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे खींच लिए।

'पुष्पा झुकेगा नहीं' कहने वाले TMC के जहांगीर खान चुनाव से पहले झुके?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित यू-टर्न देखने को मिला, जब दक्षिण 24 परगना जिले की हाई-प्रोफाइल फाल्टा विधानसभा सीट से सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक प्रत्याशी जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे खींच लिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आगामी 21 मई को होने वाले पुनर्मतदान से ऐन पहले जहांगीर खान ने चुनाव अधिकारी के समक्ष जाकर अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया है। चुनाव आयोग की अभूतपूर्व मुस्तैदी और इलाके में भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती के बीच सत्ताधारी दल के उम्मीदवार का इस तरह अचानक से चुनावी रण छोड़ देना पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है। इस फैसले ने न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों को हतप्रभ कर दिया है, बल्कि फाल्टा सीट के पूरे चुनावी गणित को भी पूरी तरह से पलट कर रख दिया है।

‘पुष्पा’ का नया क्लाइमेक्स: सोशल मीडिया की दबंगई हवा

फिल्म ‘पुष्पा’ का मशहूर संवाद ‘पुष्पा झुकेगा नहीं साला’ बोलकर सोशल मीडिया पर रील बनाकर सुर्खियां बटोरने वाले जहांगीर खान का यह कदम किसी बड़े फिल्मी सस्पेंस से कम नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उनके दबंग अंदाज और सोशल मीडिया रील्स को देखकर किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे वोटिंग से ठीक पहले मैदान से हट जाएंगे। मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, जो नेता चंद दिनों पहले तक विरोधियों को खुलेआम ललकार रहा था, उसने चुनाव आयोग और पुलिस प्रशासन की कड़क घेराबंदी के आगे घुटने टेक दिए। स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह चर्चा आम हो गई है कि आखिरकार ‘पुष्पा’ का यह तेवर इतनी जल्दी कैसे ढीला पड़ गया।

क्यों हो रहा फाल्टा विधानसभा में री-पोलिंग?

इस पूरे ड्रामे के पीछे की असल कहानी 29 अप्रैल को हुए पहले दौर के मतदान से जुड़ी हुई है। फाल्टा विधानसभा सीट के सभी 285 पोलिंग बूथों पर उस दिन वोट डाले गए थे, लेकिन मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर धांधली, ईवीएम (EVM) मशीनों पर काली पट्टी (ब्लैक टेप) चिपकाने और मतदाताओं को डराने-धमकाने की गंभीर शिकायतें सामने आई थीं। विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार देते हुए सीधे दिल्ली तक गुहार लगाई थी। इसके बाद, चुनाव आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए 29 अप्रैल को हुए पूरे चुनाव को ही पूरी तरह रद्द कर दिया और आगामी 21 मई को पूरी सीट पर नए सिरे से ‘Fresh Poll’ यानी पुनर्मतदान कराने का ऐतिहासिक फरमान जारी कर दिया।

यूपी के ‘सिंघम’ IPS अजय पाल शर्मा की एंट्री से बदला खेल

फाल्टा में दोबारा निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने एक बड़ा दांव खेला। आयोग ने कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए उत्तर प्रदेश कैडर के 2011 बैच के तेजतर्रार और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आईपीएस अधिकारी डॉ. अजय पाल शर्मा को विशेष पुलिस ऑब्जर्वर बनाकर फाल्टा भेजा। अजय पाल शर्मा की छवि अपराधियों में खौफ और जनता में ‘सिंघम’ वाली रही है। उनके फाल्टा में पैर रखते ही केंद्रीय सुरक्षा बलों (CAPF) ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया और सुरक्षा घेरा बेहद कड़ा कर दिया।

जब आमने-सामने आए आईपीएस और टीएमसी नेता

आईपीएस अजय पाल शर्मा की एंट्री के बाद फाल्टा का सियासी पारा उस वक्त सातवें आसमान पर पहुंच गया, जब उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वोटरों को डराने-धमकाने की शिकायत मिलने पर आईपीएस अजय पाल शर्मा भारी पुलिस बल के साथ सीधे जहांगीर खान के दफ्तर और आवास पर धमक गए थे। कैमरे के सामने आईपीएस शर्मा ने जहांगीर खान के करीबियों और सुरक्षाकर्मियों को बेहद सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा था:

“उसे (जहांगीर को) कह देना कि अपनी हद में रहे, अगर किसी भी तरह की बदमाशी या वोटरों को डराने की कोशिश की तो बहुत बुरी तरह निपटे जाएंगे, बाद में रोना मत।”

राजनीतिक बवाल और अदालती चक्रव्यूह का दबाव

इस कड़क चेतावनी के बाद टीएमसी और आईपीएस अजय पाल शर्मा के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया। टीएमसी नेतृत्व ने इसे असंवैधानिक बताते हुए आरोप लगाया कि आईपीएस शर्मा बीजेपी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस कार्रवाई पर तीखी आपत्ति जताई थी, जबकि बीजेपी ने इस सख्ती का खुलकर समर्थन किया था।

इस भारी विवाद और प्रशासनिक शिकंजे के बीच जहांगीर खान कानूनी तौर पर भी घिर चुके थे। अपनी गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट की शरण ली थी। अदालत ने उन्हें 26 मई तक अंतरिम राहत देते हुए चुनाव खत्म होने तक गिरफ्तारी पर रोक तो लगा दी थी, लेकिन कोर्ट ने यह शर्त भी जोड़ी थी कि वे जांच में पूरा सहयोग करेंगे और इलाके में कोई अशांति नहीं फैलाएंगे। माना जा रहा है कि इसी चौतरफा प्रशासनिक और कानूनी दबाव के चलते आखिरकार उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया।

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