INS निपुण को आज एक समारोह के दौरान भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया। निपुण को हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) ने बनाया है जो कि रक्षा मंत्रालय के अधीन रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSU) है।
HSL द्वारा निर्मित इस दूसरे डाइविंग सपोर्ट वेसल (DSV) की भारतीय नौसेना को डिलीवरी को संभवतः लड़ाकू विमानों, सबमरीन्स या फिर मिसाइलों से जुड़ी घोषणाओं जितनी सुर्खियां नहीं मिलीं, लेकिन इससे भारतीय रक्षा निर्माण की उपलब्धि और अहमियत पर कोई असर नहीं पड़ता।
निपुण भारतीय रक्षा आत्मनिर्भरता की हालिया उपलब्धियों में शायद इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस पोत का डिजाइन और निर्माण न सिर्फ इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRS) के नियमों के अनुरूप किया गया है, बल्कि इसे तय समय के अंदर बना कर नेवी को सौंपा गया है।
‘निपुण’ : जैसा नाम – वैसा काम
‘निपुण‘ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है— किसी विशेष क्षेत्र में दक्ष, सक्षम और पारंगत व्यक्ति। यह जहाज अपने नाम के अनुरूप है। इसे गहरे समुद्र में डाइविंग ऑपरेशन और समुद्र में बचाव अभियानों (Rescue Operations) के लिए ही खासतौर पर डिजायन किया गया है।
HSL की शिप बिल्डिंग में निपुणता का पर्याय है ‘निपुण’
आलोचक किसी भी स्वदेशी प्लेटफॉर्म को डेमोनेस्ट्रेशन प्रोजेक्ट या फिर Proof of Concept कहकर खारिज किया जा सकता है। लेकिन INS निस्तार की डिलीवरी के केवल एक वर्ष बाद निपुण का नौसेना को सौंपा जाना इस धारणा को बदल देता है।
लगभग एक वर्ष के अंतराल पर दो जटिल और अत्याधुनिक तकनीक से लैस जहाजों की डिलीवरी इस बात का संकेत है कि HSL ने केवल एक जटिल प्रोजेक्ट को पूरा नहीं किया, बल्कि उसने निर्माण प्रक्रिया में भी महारत हासिल कर ली है और यही इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी हेडलाइन है।
‘निपुण’ के शामिल होने से क्या बदलेगा ?
डायनेमिक पोजिशनिंग, सैचुरेशन डाइविंग, सबमरीन रेस्क्यू और डीप–सी इंटरवेंशन जैसी क्षमताएं सुनने में एक सूची भर लग सकती हैं, लेकिन इनमें से प्रत्येक एक महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग उपलब्धि है। दुनिया की केवल कुछ ही नौसेनाएं इन सभी क्षमताओं को एक ही स्वदेशी रूप से निर्मित पोत पर एकीकृत कर पाई हैं।
यह जहाज अत्याधुनिक डीप–सी सैचुरेशन डाइविंग उपकरणों से लैस है। इसमें डाइविंग अभियानों के लिए साइड डाइविंग स्टेज मौजूद है, जबकि इसके रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स (ROVs) गोताखोरों की निगरानी और गहरे समुद्र में बचाव अभियानों के लिए बनाए गए हैं।
इसके अलावा यह डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (DSRV) के लिए ‘मदर शिप‘ के रूप में भी कार्य करेगा, जिससे किसी पनडुब्बी दुर्घटना की स्थिति में कर्मियों को सुरक्षित निकाला जा सकेगा।
INS निस्तार से पहले भारत की स्वतंत्र रूप से पनडुब्बी बचाव अभियान चलाने की क्षमता सीमित थी। अब केवल पहला नहीं, बल्कि दूसरा जहाज भी सेवा में आने के साथ यह कमी लगातार दूर होती दिखाई दे रही है।
आत्मनिर्भरता की साइलेंट इकॉनमी
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की चर्चा अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म तक ही सीमित रहती है, लेकिन DSV कार्यक्रम का सबसे स्थायी योगदान शायद इसका 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी होना, और इसकी सप्लाई चेन से जुड़े लगभग 120 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की भागीदारी है।
दर्जनों छोटे निर्माताओं को नौसेना के गुणवत्ता मानकों के अनुरूप तैयार करना, एक जहाज बनाने से कहीं अधिक कठिन और आर्थिक रूप से कहीं अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। अब असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह सप्लाई चेन नेटवर्क और इकोसिस्टम इस प्रोजेक्ट के बाद भी बरकरार रहता है और भविष्य में अन्य रक्षा कार्यक्रमों का हिस्सा बनता है या नहीं। तभी यह स्पष्ट होगा कि आत्मनिर्भर भारत वास्तव में स्थायी औद्योगिक क्षमता विकसित कर रहा है या ये केवल ऐसी अस्थाई सप्लाई चेन में बदल जाएगा, जो सिर्फ ऑर्डर पर काम करती है, और काम पूरा होने पर ठप पड़ जाती है।
HSL अब जटिल चुनौतियों स्वीकार कर रहा है और ये अच्छी बात है
लगभग आठ दशकों के इतिहास वाले मिनीरत्न DPSU के रूप में HSL की पहचान लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम जटिल मरम्मत और जहाज निर्माण कार्यों से जुड़ी रही है।
लेकिन DSV कार्यक्रम, जिसकी दो सफल डिलीवरी लगभग एक वर्ष के अंतराल पर हुई है, इस बात का संकेत है कि HSL अब सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और अत्यधिक जटिल तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। ऐसे प्लेटफॉर्म पहले केवल चुनिंदा विदेशी शिपयार्ड ही तैयार कर पाते थे।
रक्षा योजनाकारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात केवल क्षमता नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता है, और यही HSL की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सावधानी, जो जरूरी है
भारत को भविष्य में ‘Preferred Submarine Rescue Partner’ के रूप में प्रस्तुत करने का दावा केवल दोहराया नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसकी गंभीर समीक्षा भी होनी चाहिए।
सबमरीन रेस्क्यू डिप्लोमेसी केवल जहाजों की डिलीवरी से नहीं बनती। इसके लिए लगातार ऑपरेशनल रेडीनेस, प्रशिक्षित क्रू और अन्य देशों के साथ संयुक्त अभ्यास भी उतना ही आवश्यक हैं।
इस दृष्टि से देखें तो निपुण की डिलीवरी उस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि उसकी दिशा में एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कदम है और खास बात यह है कि यह कदम तय समय पर पूरा किया गया।
इन सब बातों से शायद सनसनीखेज सुर्खियां नहीं बनतीं, लेकिन इसी प्रकार की खामोश कैपेबिलिटी बिल्डिंग वास्तव में यह बताती है कि भारत का रक्षा औद्योगिक आधार किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
