हिंदू समाज से एक सीधा प्रश्न: भव्य मंदिर बना सकते हो, तो उन्हें सरकारी कब्जे से स्वतंत्र क्यों नहीं करा सकते?

हिंदू समाज से एक सीधा प्रश्न: भव्य मंदिर बना सकते हो, तो उन्हें सरकारी कब्जे से स्वतंत्र क्यों नहीं करा सकते?

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चोरी की घटना ने करोड़ों हिंदुओं को दुखी किया है। जाँच चल रही है। सत्य सामने आना चाहिए और जो भी दोषी हो, उसे कठोरतम दंड मिलना चाहिए। आस्था के केंद्रों में अपराध के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। इसमें एक हास्यस्पद बात और सामने आई है कि इस प्रकरण में सबसे ज्यादा हल्ला वो लोग मचा रहे हैं जो चाहते ही नहीं थे कि राम मंदिर बने। राम लला को अवैध कब्जाधारी बताने वाले और राम और कृष्ण को आपस में लड़ा देंगे, उनके ऐसे भाषण आजकल वायरल हो रहे हैं। हिंदू समाज ऐसे रामद्रोहियों की वास्तविकता अच्छे से जानता है।

लेकिन, इस घटना ने एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा कर दिया है, जिसे हिंदू समाज वर्षों से टालता आया है। देश के अनेक बड़े हिंदू मंदिर आज भी सरकारी नियंत्रण में हैं। इन मंदिरों में चढ़ावा हिंदू समाज देता है। दान हिंदू देता है। सोना, चाँदी, भूमि और संपत्ति हिंदू समाज ने अपने पूर्वजों की श्रद्धा से मंदिरों को समर्पित की। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इन मंदिरों के संचालन, उनकी आय और उनकी संपत्तियों पर अंतिम उत्तरदायित्व किसका होना चाहिए?

यदि सेकुलर सरकार का सिद्धांत यह है कि धार्मिक संस्थानों का प्रशासन सरकारी नियंत्रण में होना चाहिए, तो वही व्यवस्था मस्जिदों और चर्चों पर समान रूप से क्यों नहीं लागू होती? और यदि सिद्धांत यह है कि धार्मिक संस्थाओं का संचालन उनके अपने समुदाय द्वारा होना चाहिए तो फिर हिंदू मंदिरों के साथ अलग व्यवस्था क्यों बनी रहे? यह प्रश्न किसी समुदाय के विरोध का नहीं, बल्कि समानता के सिद्धांत का है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान परिस्थितियों में समान मानदंड लागू होने चाहिए। यदि अलग-अलग व्यवस्थाएँ हैं, तो उनका औचित्य भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।

जिस हिंदू समाज ने अपने संसाधनों, अपनी श्रद्धा और अपने परिश्रम से सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया, अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण कराया, देशभर में हजारों ऐसे विशाल मंदिर बनाए जो आज के विज्ञान के लिए आश्चर्य हैं और आज भी बिना सरकारी सहायता के असंख्य धार्मिक, शैक्षिक तथा सेवा संस्थाएँ चला रहा है, क्या वही समाज अपने मंदिरों का ईमानदार और सक्षम प्रबंधन नहीं कर सकता? यदि उत्तर “हाँ” है, तो फिर मंदिरों पर स्थायी सरकारी नियंत्रण का औचित्य क्या है?

एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मंदिरों में जो दान आता है, वह श्रद्धालु अपनी आस्था से देते हैं। अधिकांश दानदाता यह भावना लेकर दान करते हैं कि यह धन मंदिरों के संरक्षण, धार्मिक परंपराओं, गुरुकुलों, गौशालाओं, धर्मार्थ सेवा, शिक्षा, संस्कृति तथा हिंदू समाज के कल्याण में लगे। यदि मंदिर हिंदू समाज की आस्था और संसाधनों से संचालित हैं, तो उनकी आय का प्राथमिक उपयोग भी मंदिरों और उनसे जुड़े धार्मिक, सांस्कृतिक तथा समाजोपयोगी कार्यों के लिए होना चाहिए। यही श्रद्धालुओं की स्वाभाविक अपेक्षा है।

समय-समय पर सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में चोरी, वित्तीय अनियमितताओं, आभूषणों और मूर्तियों के गायब होने, भूमि विवादों या प्रशासनिक हेराफेरी जैसे आरोपों और घटनाओं की खबरें सामने आती रहती हैं। तब हिंदू समाज आंदोलन क्यों नहीं करता, तब मौन क्यों रहता है। हाल ही में जैन समाज ने प्रतिकार करके सरकार को घुटनों पर लाया है। यदि व्यवस्था पर बार-बार प्रश्न उठते हैं, तो उस व्यवस्था की समीक्षा की माँग भी उतनी ही स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा प्रश्न हिंदू समाज से है। जब मंदिर निर्माण का आह्वान होता है, तब करोड़ों लोग आगे आते हैं। जब धार्मिक यात्रा निकालनी होती है, तब लाखों स्वयंसेवक खड़े हो जाते हैं। जब सेवा कार्य करना होता है, तब समाज उदारतापूर्वक दान देता है। लेकिन जब मंदिरों की स्वायत्तता, उनके पारदर्शी प्रबंधन और श्रद्धालुओं के अधिकारों की बात आती है, तब वही समाज मौन क्यों हो जाता है? क्या केवल सोशल मीडिया पर दुख व्यक्त कर देना पर्याप्त है? क्या केवल चोरी की निंदा कर देना ही धर्मरक्षा है? या फिर धर्मरक्षा का अर्थ यह भी है कि मंदिरों के लिए ऐसी व्यवस्था की माँग की जाए, जो पारदर्शी, उत्तरदायी और श्रद्धालुओं के विश्वास के अनुरूप हो?

अधिकार माँगे बिना नहीं मिलते। यदि हिंदू समाज को विश्वास है कि वह अपने मंदिरों का बेहतर प्रबंधन कर सकता है, तो उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यमों से मंदिरों की स्वायत्तता, पारदर्शी लेखा व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की माँग भी करनी चाहिए। आज आवश्यकता केवल यह कहने की नहीं है कि “मंदिर में चोरी हो गई।” आवश्यकता यह पूछने की है कि मंदिरों का प्रबंधन कैसा हो, मंदिरों के दान का उपयोग किसके लिए हो और सभी धार्मिक संस्थाओं के प्रति राज्य की नीति समान और न्यायपूर्ण क्यों न हो।

यदि हिंदू समाज बिना किसी सरकारी सहयोग के भव्य मंदिर बना सकता है, उनका संरक्षण कर सकता है, उनकी परंपराओं को जीवित रख सकता है और करोड़ों रुपये का दान दे सकता है, तो वह उनके स्वतंत्र, पारदर्शी और उत्तरदायी प्रबंधन की माँग के लिए भी संगठित क्यों नहीं हो सकता है? वसुधैव कुटुम्बकम जिस हिंदू समाज का ध्येय वाक्य है और मंदिर इसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं, इन्ही से विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा, जितना जल्दी हिंदू समाज इस बात को समझ लेगा उतना अच्छा होगा।

समय आ गया है कि हिंदू समाज केवल मंदिर बनाने वाला समाज न रहे, बल्कि मंदिरों की स्वायत्तता, उनके दान के पारदर्शी उपयोग और समान नीति की माँग करने वाला जागरूक समाज भी बने। यही चुनौती है। यही समय की पुकार है।

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