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कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता : आखिर कब तक?

‘हास्य’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर बढ़ती अश्लीलता और फूहड़ता पर समाज को करना होगा आत्ममंथन।

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
29 June 2026
in चर्चित, मत
कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता

कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता परोसने के मामले लगातार बढ़े हैं

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अंग्रेजी भाषा का एक शब्द “कॉमेडी”, कदाचित जिसका अर्थ ‘हास्य की वह विधा है, जिसका उद्देश्य स्वस्थ मनोरंजन और समाज को हँसी के माध्यम से सकारात्मक संदेश देना है’। लेकिन इन दिनों में भारत में कॉमेडी या स्टैंड–अप कॉमेडी और कॉमेडी शो के नाम पर डिजिटल मनोरंजन के क्षेत्र में कुछ ऐसी गंभीर और फूहड़ घटनाएँ सामने आई हैं, जिनके बारे में जानकर यह कहना पड़ेगा कि बस अब बहुत हुआ ! सरकार और सरकारी तंत्र से लेकर आम आदमी को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

यह भी सच है कि सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब जैसे माध्यमों ने अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए हैं। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है, क्योंकि हास्य और व्यंग्य किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। वे समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं, सत्ता से प्रश्न पूछते हैं और लोगों को हँसाते हुए सोचने का अवसर देते हैं। लेकिन जब हास्य की सीमाएँ टूटकर अश्लीलता, अपमान, व्यक्तिगत कटाक्ष और संवेदनहीनता में बदलने लगती हैं, तब यह केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन जाता है।

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पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कॉमेडी के नाम पर माता–पिता, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक भावनाओं, महिलाओं, दिव्यांग व्यक्तियों और यहाँ तक कि मृत्यु जैसे संवेदनशील विषयों और देहदान करके अस्पतालों में दान किये शवों पर भी फूहड़ मजाक बनाया गया है। इन कार्यक्रमों की भाषा इतनी असभ्य और अश्लील होती है कि क्या कहने !

हाल ही में कुछ डिजिटल कार्यक्रमों और पॉडकास्टों और कॉमेडी शो में जिस तरह से अशोभनीय भाषा और पारिवारिक संबंधों पर टिप्पणियाँ की गई हैं, उनको देखकर प्रश्न उठते हैं कि क्या सस्ती लोकप्रियता और व्यूज प्राप्त करने के लिए और पैसा कमाने के लिए किसी भी सीमा तक जाना उचित है? क्या मनोरंजन के नाम पर हर विषय को मजाक का हिस्सा बनाया जा सकता है?

यहाँ मूल प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं है। कलाकारों और कॉमेडियनों को भी समाज पर टिप्पणी करने और व्यंग्य प्रस्तुत करने का अधिकार है। लेकिन हर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। जब अभिव्यक्ति दूसरों की गरिमा को आहत करने लगे, जब हास्य केवल चौंकाने और विवाद पैदा करने का साधन बन जाए, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि कहीं हम मनोरंजन और अश्लीलता के बीच की रेखा तो नहीं मिटा रहे हैं।

आज की डिजिटल संस्कृति में एक बड़ी समस्या ‘वायरल होने की दौड़’ है। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म अक्सर उसी सामग्री को अधिक बढ़ावा देते हैं जो लोगों को चौंकाती है, विवाद पैदा करती है या तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप कुछ कंटेंट निर्माता यह मानने लगते हैं कि जितनी अधिक उत्तेजक भाषा होगी, उतनी अधिक लोकप्रियता मिलेगी। धीरे–धीरे हास्य का स्तर विचारोत्तेजक व्यंग्य से हटकर द्विअर्थी संवादों, गाली–गलौज और निजी संबंधों पर अश्लील टिप्पणियों तक पहुँच जाता है। दुर्भाग्य से दर्शकों का एक वर्ग भी ऐसे कंटेंट को प्रोत्साहित करता है, जिससे यह प्रवृत्ति और मजबूत होती है।

हालाँकि, इस स्थिति के लिए केवल कलाकारों या युवाओं को दोष देना उचित नहीं होगा। समाज, परिवार, शिक्षा व्यवस्था और हम सभी कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार हैं। किसी भी पीढ़ी का आचरण शून्य में विकसित नहीं होता। वह अपने परिवेश, परिवार, शिक्षा और सामाजिक मूल्यों से प्रभावित होती है। यदि आज कुछ युवा अश्लील या असंवेदनशील सामग्री को ‘सामान्य’ मानने लगे हैं, तो इसके पीछे केवल उनकी व्यक्तिगत सोच नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिस्थितियाँ भी हैं।

माता–पिता अक्सर अपने बच्चों को सर्वोत्तम भौतिक सुविधाएँ देने की दौड़ में लगे रहते हैं। अच्छी शिक्षा, महंगे स्कूल, विदेशी विश्वविद्यालय, आधुनिक गैजेट्स और आरामदायक जीवनशैली को सफलता का प्रतीक मान लिया गया है। यह सब महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इसके साथ–साथ संस्कार, संवेदनशीलता, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। यदि बच्चे केवल सफलता, धन और लोकप्रियता को ही जीवन का लक्ष्य समझेंगे, तो वे वही साधन अपनाएंगे जो उन्हें जल्दी प्रसिद्धि दिला सकें, चाहे वे साधन कितने भी विवादास्पद क्यों न हों !

एक समय था जब परिवारों में संवाद की परंपरा मजबूत थी। संयुक्त परिवारों में बच्चे बड़ों के अनुभवों से सीखते थे। घर में नैतिक मूल्यों, सामाजिक व्यवहार और जीवन के उद्देश्य पर चर्चा होती थी। आज तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन कई बार परिवार के सदस्यों के बीच संवाद को सीमित भी कर दिया है। एक ही घर में रहते हुए लोग मोबाइल स्क्रीन के माध्यम से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, जबकि भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में बच्चों और युवाओं के लिए सोशल मीडिया ही कई बार प्राथमिक शिक्षक बन जाता है।

यह भी स्वीकार करना होगा कि समाज ने कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर लंबे समय तक खुली और संतुलित चर्चा से परहेज किया है। जीवन मूल्य, रिश्तों की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य, जिम्मेदार नागरिकता और यौन शिक्षा जैसे विषयों पर परिवार और विद्यालय अक्सर पर्याप्त संवाद नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप युवा जानकारी और मार्गदर्शन के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का एक बड़ा हिस्सा सकारात्मक और उपयोगी होता है, लेकिन कई बार वे ऐसे स्रोतों तक भी पहुंच जाते हैं जो मनोरंजन को केवल उत्तेजना और अश्लीलता के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

समाधान सेंसरशिप या प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण में है। कलाकारों को अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि उनके शब्द लाखों लोगों तक पहुंचते हैं और समाज पर प्रभाव डालते हैं। दर्शकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जिस प्रकार बाजार में वही उत्पाद अधिक बिकता है जिसकी माँग होती है, उसी प्रकार डिजिटल मंचों पर वही सामग्री अधिक दिखाई जाती है जिसे लोग अधिक देखते हैं। यदि समाज स्वस्थ हास्य, सार्थक व्यंग्य और रचनात्मक मनोरंजन को प्रोत्साहित करेगा, तो कंटेंट की दिशा भी उसी ओर बदलेगी।

मेरा मानना है कि आने वाली पीढ़ी वही लौटाएगी जो हमने उसे दिया है। यदि हम केवल भौतिक सफलता को महत्त्व देंगे, तो वे भी जीवन को उसी दृष्टि से देखेंगे। यदि हम उन्हें संवेदनशीलता, सम्मान, संस्कार और मानवीय मूल्यों का महत्व सिखाएंगे, तो समाज भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। बच्चों को केवल यह नहीं सिखाना है कि सफल कैसे बनना है, बल्कि यह भी सिखाना है कि अच्छा मनुष्य कैसे बनना है।

आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति, कलाकार या युवा को दोष देने की नहीं है। आवश्यकता ‘आत्ममंथन’ की है। हमें यह विचार करना होगा कि हम अपने परिवारों, समाज और आने वाली पीढ़ियों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ लोकप्रियता के लिए किसी भी सीमा को पार करना स्वीकार्य हो या ऐसा समाज जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी बनी रहे?

हास्य होना चाहिए, व्यंग्य भी होना चाहिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहनी चाहिए। लेकिन साथ ही मानवीय गरिमा, सामाजिक मर्यादा और संवेदनशीलता भी बनी रहनी चाहिए। यही संतुलन किसी भी सभ्य, जागरूक और संस्कारित समाज की वास्तविक पहचान है। यही समय की माँग है और यही हमारे सामूहिक भविष्य की आवश्यकता भी।

Tags: अभिव्यक्ति की आजादीअश्लीलताओटीटी कंटेंटकॉमेडीकॉमेडी विवादडार्क कॉमेडीडिजिटल कंटेंटभारतीय संस्कृतिरणवीर इलाहाबादियारोस्ट कॉमेडीवायरल विवादसमय रैनासामाजिक मूल्यसोशल मीडियास्टैंड अप कॉमेडी
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