CCTV के अंदर छिपा चीन का ‘सिक्योरिटी रिस्क’: ब्रिटेन में खुलासा, भारत में कितनी बड़ी चुनौती?

ब्रिटेन के K3 Scout ड्रोन में लगे कैमरों के चीनी कलपुर्जों से डेटा ट्रांसमिशन का मामला सामने आने के बाद CCTV की पूरी सप्लाई चेन सवालों के घेरे में है। भारत में चीनी कैमरों और चिपसेट की मौजूदगी से लेकर सरकार के नए सुरक्षा नियमों तक, समझिए पूरा मामला।

Chinese CCTV RISK

हाल ही में ब्रिटेन की रॉयल नेवी के अत्याधुनिक K3 Scout ड्रोन्स में लगे कैमरों में चीनी कलपुर्जों का पता चला है, जो महीनों से चीन में एक आईपी एड्रेस पर हार्टबीट सिग्नल्सऔर लोकेशन डेटा भेज रहे थे। ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ में छपे इस खुलासे ने न केवल पश्चिमी देशों में, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी खतरे की घंटी बजा दी है। आइए समझते हैं कि चीन निर्मित कैमरों और चिपसेट पर यह वैश्विक हड़कंप क्यों मचा है, भारत में इसका कितना बड़ा जोखिम है और देश इससे निपटने के लिए क्या कदम उठा रहा है।

ब्रिटेन में क्या हुआ और यह भारत के लिए चेतावनी क्यों है?

ब्रिटेन की नौसेना ने करीब 1.2 करोड़ पाउंड की लागत से प्रोजेक्ट बीहाइवके तहत K3 स्काउट ड्रोन्स खरीदे थे। रूटीन साइबर सिक्योरिटी ऑडिट में सामने आया कि थर्डपार्टी सप्लायर के कैमरों में ऐसे चीनी स्पेयर पार्ट्स लगे थे, जो नौसेना की संवेदनशील गतिविधियों (जैसे स्पेशल बोट सर्विस-SBS मुख्यालय के पास ट्रेनिंग) का डेटा चीन के सर्वर्स पर ट्रांसफर कर रहे थे।

ये कैमरे अमरीकी ‘NDAA Compliance’ मानकों के तहत खरीदे गए थे, लेकिन नियम केवल Hikvision, Dahua जैसे मुख्य सिर्फ निर्माता कंपनियों को बैन करते थे। जबकि किसी सीसीटीवी के अंदर छोटे छोटे मगर बेहद जरुरी स्पेयर पार्ट्स सस्ती दामों पर चीनी कंपनियां ही बना रही थी। इसी वजह से चीनी कंपनियों की  सीसीटीवी सप्लाई चेन में घुसपैठ बनी रही।

भारत में चीनी सीसीटीवी कैमरों की कितनी गहरी पैठ है?

भारत का सीसीटीवी बाजार लगभग $4.4 बिलियन (करीब 36,000 करोड़ रुपये) का है। इसमें पिछले कुछ वर्षों तक चीनी कंपनियों का लगभग एकतरफा दबदबा रहा है।हिकविजन (Hikvision) और डाहुआ (Dahua) जैसी चीनी सरकारी समर्थन वाली कंपनियों की भारत के सीसीटीवी हार्डवेयर बाजार में 30% से 33% की सीधी हिस्सेदारी रही है। भारत में लगे 70% से 80% नेटवर्क/आईपी कैमरों Huawei की सहायक कंपनी हाईसिलिकॉन (HiSilicon) के सिस्टमऑनचिप (SoCs) लगे हुए थे, जो वीडियो प्रोसेसिंग और नेटवर्क फर्मवेयर को संभालते हैं। 2016 से 2022 के बीच भारत के लगभग 100 स्मार्ट सिटी टेंडर्स में सस्ते दामों की वजह से 60% से अधिक चीनी हार्डवेयर की एंट्री हो गई।

भारत में सीसीटीवी से जासूसी के कौनकौन से मामले आए हैं?

चीनी कैमरों और चिपसेट के जरिए सुरक्षा में सेंधमारी के कई प्रत्यक्ष उदाहरण भारत में सामने आ चुके हैं। साइबर सुरक्षा टेलीमेट्री के अनुसार, भारत में 73,000 से अधिक हिकविजन कैमरे इंटरनेट पर सीधे बिना पैच के एक्सपोज्ड पाए गए, जो सीधे हैकिंग या डेटा चोरी के खतरे में थे।

इसी साल पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मूकश्मीर और हिमाचल प्रदेश में संवेदनशील सैन्य ठिकानों और छावनियों जैसे अंबाला, पठानकोट, कपूरथला, कठुआ के बाहर 4 जी सिम से चलने वाले सोलर चीनी सीसीटीवी कैमरे चुपचाप लगाए गए। इन कैमरों के जरिए भारतीय सेना के काफिलों और सैन्य गतिविधियों की लाइव फुटेज चीनी सर्वर्स के जरिए पाकिस्तान स्थित आईएसआई हैंडलर्स को भेजी जा रही थी।

दिल्ली के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा शहर में लगाए गए 2.7 लाख से अधिक सीसीटीवी कैमरों में से पहले चरण (2020–2022) में लगे करीब 1.4 लाख कैमरे चीनी कंपनी हिकविजन से खरीदे गए थे। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे को देखते हुए सरकार अब इन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाने और स्वदेशी या गैरचीनी कैमरों से बदलने की योजना पर काम कर रही है।

आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत सरकार का क्या एक्शन प्लान है?

भारत ने चीनी हार्डवेयर और फर्मवेयर पर अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई है। इस साल एक अप्रैल से भारत सरकार ने नए नियम जारी किए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) के नए नियमों के तहत, बिना STQC ऑडिट और OWASP सुरक्षा मानकों को पूरा किए कोई भी इंटरनेटकनेक्टेड सीसीटीवी कैमरा भारत में नहीं बेचा जा सकता। इसके अलावा भारत सरकार ने चीनी मूल के चिपसेट (SoC) और बंदस्रोतों वाले चीनी फर्मवेयर वाले कैमरों को STQC सर्टिफिकेशन देने से साफ इनकार कर दिया है।

मगर चीनी सीसीटीवी को बैन करने के साथ साथ जरुरी है कि सप्लाई चेन भी बदली जाए सीपी प्लस (CP Plus),स्पार्श, मैट्रिक्स और डिक्सन जैसी भारतीय कंपनियों ने चीनी पार्टस को छोड़कर ताइवान (Novatek, Realtek) और अमरीकी (Ambarella) के चिपसेट का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

कैसे बदला भारतीय सीसीटीवी मार्केट ?

कड़े नियमों और घरेलू विनिर्माण के प्रोत्साहन से 2026 तक भारत के सीसीटीवी बाजार में गैरचीनी और स्वदेशी ब्रांड्स का नियंत्रण बढ़कर 80% से अधिक हो गया है। मगर इसकी एक कीमत भी चुकानी पड़ रही है। चीनी चिपसेट के बजाय सुरक्षित अमरीकी या ताइवानी चिपसेट और भारतीय फर्मवेयर का उपयोग करने से सीसीटीवी कैमरों की निर्माण लागत में 15% से 20% का इजाफा हुआ है।

डिजिटल सुरक्षा ही अब राष्ट्रीय सुरक्षा है। जिस तरह ब्रिटेन में छोटे स्पेयर पार्ट्स के जरिए जासूसी का मामला सामने आया, उसने साबित कर दिया है कि केवल कैमरे का ब्रांड देखना काफी नहीं है; उसके अंदर लगी चिप और कोड की हर परत का सुरक्षित होना अनिवार्य है।

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