राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के वैश्विक संपर्क अभियान के तहत सरसंघचालक मोहन भागवत वैश्विक प्रवास पर हैं। इस अभियान के तहत उन्होंने अमेरिका और कनाडा का दौरा किया और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भाग लिया। इस दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क और फिर टोरंटो में लोगों को संबोधित किया। इन संबोधनों में मोहन भागवत की आवाज में एक ऐसे हिंदुत्व का स्पंदन हुआ, जिसे केवल भारत की राजनीतिक सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। यह हिंदुत्व अपनी जड़ों से जुड़ने का आग्रह करता है, लेकिन अपनी दृष्टि को केवल स्वयं तक सीमित नहीं करता। यह अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए दूसरे की पहचान के सम्मान की बात करता है। यही कारण है कि न्यूयॉर्क और कनाडा में उनके संबोधनों का केंद्रीय भाव मानवता की एकता और विविधता के सहअस्तित्व के रूप में सामने आया।
न्यूयॉर्क के ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में उन्होंने हिंदू जीवनदृष्टि को समझाने के लिए मानवता की एकता को केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। उनके अनुसार सत्य एक है, उसे समझने और व्यक्त करने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विविधता प्रकृति का नियम है, जबकि उसके भीतर की एकता मूल सत्य है।
यह बात सामान्य लग सकती है, लेकिन हिंदुत्व के वैश्विक विमर्श में इसका विशेष महत्त्व है। पश्चिमी राजनीतिक विमर्श में ‘हिंदुत्व’ शब्द को अक्सर राजनीतिक चश्में से देखा जाता रहा है।
मोहन जी ने न्यूयॉर्क के मंच से उसे एक अलग वैचारिक धरातल पर रखने का प्रयास किया। उनके लिए हिंदुत्व का अर्थ किसी एक पूजा पद्धति, भाषा अथवा जीवन शैली तक सीमित नहीं है। टोरंटो में उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू की पहचान किसी विशेष भाषा, पूजा पद्धति या जीवन शैली से निर्धारित नहीं होती। हिंदू दृष्टि विविधताओं को स्वीकार करती है और उनके भीतर एकता को देखती है। उनके अनुसार स्वयं को हिंदू कहने के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जा सकते हैं और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा समान है।
यह कथन हिंदुत्व की उस व्याख्या को सामने रखता है जिसमें ‘अपना’ और ‘पराया’ का विभाजन अंतिम सत्य नहीं है। अपनी पहचान को बचाए रखना और दूसरे की पहचान का सम्मान करना परस्पर विरोधी नहीं हैं। बल्कि
मोहन जी के संदेश में दोनों एक साथ चलते दिखाई देते हैं। उनकी बात का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि विविधता को मिटाना नहीं है, उसे स्वीकार करना है। दुनिया में मनुष्य अलग-अलग दिखाई देते हैं, उनकी भाषाएँ अलग हैं, उनकी पूजा पद्धतियाँ अलग हैं, उनके संस्कार अलग हैं, लेकिन इस बाहरी विविधता के पीछे मनुष्य की एकता है। यही विचार भारत की प्राचीन सभ्यतागत चेतना के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से जुड़ता है। न्यूयॉर्क में जहाँ ‘एक विश्व, एक मानवता’ का संदेश सामने आया, वहीं कनाडा में ‘हिंदू विश्व बंधु’ का स्वर सुनाई दिया।
मोहन जी का संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने हिंदू समाज के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी भी रखी। यदि हिंदू समाज स्वयं को जागृत, संगठित और अपनी सभ्यतागत चेतना से परिचित करता है, तो उसका परिणाम केवल हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि व्यापक मानवता के लिए होना चाहिए। कनाडा में मोहन जी ने भारत की परंपरा को दूसरों की सहायता करने और मानवता की सेवा से जोड़ा। उन्होंने भारत को ऐसी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जिसकी दृष्टि दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करने की नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण में योगदान देने की रही है। उन्होंने भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने की बात को भी महाशक्ति बनने की आकांक्षा से अलग रखा।
यहाँ ‘विश्वगुरु’ शब्द को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखना इस विचार की व्यापकता को सीमित कर देगा। यदि भारत को विश्व को कुछ देना है तो वह केवल आर्थिक मॉडल या तकनीकी उपलब्धियाँ नहीं हो सकतीं। भारत के पास एक ऐसी सभ्यतागत दृष्टि भी है, जो मनुष्य को प्रकृति से अलग नहीं मानती, विविधता को संघर्ष का कारण नहीं मानती और जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं मापती।
मोहन जी के कनाडा संबोधन में यही भाव उभरता है कि भारत का उदय यदि केवल शक्ति के रूप में होता है तो वह अधूरा होगा। भारत का उदय तभी सार्थक होगा जब उसके साथ मानवता अधिक एकजुट और अधिक स्वतंत्र हो।
इस दृष्टि से हिंदुत्व का वैश्विक संदेश विरोधाभास की जगह ‘समन्वय’ का है अर्थात् पहचान भी रहे और समावेश भी हो। परंपरा भी रहे और आधुनिकता से संवाद भी हो। राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी हो और विश्व के प्रति उत्तरदायित्व भी।
वास्तव में विदेश में रहने वाला भारतीय दो संस्कृतियों के बीच नहीं, बल्कि कई स्तरों पर अपनी पहचान का निर्माण करता है। उसकी जन्मभूमि भारत है, उसकी कर्मभूमि कोई दूसरा देश हो सकता है और उसका सामाजिक जीवन उस देश की व्यवस्था तथा संस्कृति से जुड़ा होता है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या अपनी जड़ों से जुड़े रहना और अपने वर्तमान समाज के प्रति निष्ठावान रहना एक साथ संभव है? मोहन जी के संदेश का उत्तर स्पष्ट रूप से ‘हाँ’ में दिखाई देता है। अपनी सभ्यतागत पहचान को बनाए रखना दूसरे समाज से दूरी बनाने के समान नहीं है। बल्कि अपनी पहचान में आत्मविश्वास व्यक्ति को दूसरे की पहचान का सम्मान करना भी सिखा सकता है। यही कारण है कि उनके संदेश में ‘हिंदू जागरण’ का अर्थ किसी दूसरे के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना और समाज के प्रति अपने दायित्व को समझना है।
न्यूयॉर्क और कनाडा की यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष शायद यही है कि यहाँ हिंदुत्व की चर्चा भारत से बाहर, उन समाजों के बीच हुई जहाँ अनेक रिलिजन, संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ साथ रहती हैं। इसलिए वहाँ हिंदुत्व की कोई भी व्याख्या केवल भारतीय संदर्भ तक सीमित नहीं रह सकती।
मोहन जी ने जिस हिंदुत्व को प्रस्तुत किया, उसमें विविधता के लिए स्थान है। उसमें मानव गरिमा के लिए स्थान है। उसमें सेवा का भाव है। उसमें अपनी सभ्यतागत पहचान के प्रति गौरव है और साथ ही दूसरे के अस्तित्व के प्रति सम्मान भी है। न्यूयॉर्क में उन्होंने जिस ‘एक मानवता’ की बात की, कनाडा में वही विचार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और सेवा के रूप में आगे बढ़ता दिखाई दिया।
इसलिए न्यूयॉर्क से कनाडा तक मोहन जी की यात्रा को केवल एक संगठन के प्रमुख की विदेश यात्रा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस वैचारिक प्रश्न को वैश्विक मंच पर रखने का अवसर भी था कि क्या अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखते हुए पूरी मानवता को एक परिवार माना जा सकता है? और मोहन जी का उत्तर है कि यही वास्तविक हिंदू दृष्टि की विशेषता है।
इसी अर्थ में मोहन जी के शब्दों में न्यूयॉर्क से कनाडा तक हिंदुत्व का वह स्पंदन सुनाई दिया, जो कहता है कि अपनी जड़ों को पहचानो, अपनी पहचान पर गर्व करो, विविधता का सम्मान करो और अपनी शक्ति का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, समस्त मानवता के कल्याण के लिए करो। भारत से हजारों किलोमीटर दूर, पश्चिमी दुनिया के दो बड़े देशों में गूंजी ‘हिंदू जागेगा तो विश्व जागेगा’ की यह गूंज अंततः भारत की उसी प्राचीन चेतना की ओर लौटती है, जहाँ संसार को अलग-अलग खेमों में नहीं, बल्कि एक विस्तृत परिवार के रूप में देखने की कल्पना की गई थी। यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भारतीय चिंतन है और यही सर्वे भवन्तु सुखिनः का भाव।
