1 अप्रैल 2025 को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने श्रीनगर के SKICC से महिलाओं के लिए निःशुल्क बस यात्रा को हरी झंडी दिखाई। उस दिन से जम्मू-कश्मीर की महिलाएं J&K Road Transport Corporation की बसों और Smart City की ई-बसों में बिना टिकट यात्रा करती हैं। स्कूल जाने वाली छात्राएं भी यही सुविधा पाती हैं।
यह निर्णय एक बड़े परिवर्तन का प्रतीक है। जम्मू-कश्मीर अपनी बेटियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, इकोनॉमिक सेल्फ-रिलायंस और राजनीतिक भागीदारी, चारों क्षेत्रों में आगे बढ़ा रहा है। नियंत्रण रेखा के उस पार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) की महिलाएं आज भी इन मूलभूत अधिकारों के लिए जूझती हैं।
घर, भूमि और बैंक खाता अपने नाम
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) ने 2019-20 में पाया कि जम्मू-कश्मीर की 57.3 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर घर या भूमि है। 2015-16 में यह अनुपात केवल 33.1 प्रतिशत था। स्वयं बैंक खाता चलाने वाली महिलाओं का अनुपात 60 से बढ़कर 84.9 प्रतिशत पहुंचा, और 75.2 प्रतिशत महिलाएं अपना मोबाइल फोन रखती हैं। दस वर्ष या उससे अधिक की स्कूली शिक्षा पाने वाली महिलाओं का अनुपात भी 37.1 से बढ़कर 51.3 प्रतिशत हो गया।
गांवों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के सहारे आत्मनिर्भर बन रही हैं। प्रदेश में DAY-NRLM के अंतर्गत 96,637 महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं। मार्च 2026 तक 2,52,867 महिलाएं ‘Lakhpati Didi’ बन चुकी थीं, अर्थात उनके परिवार हर वर्ष कम से कम एक लाख रुपये कमाते हैं।
सुरक्षित मातृत्व, सुधरता सेक्स रेशियो
NFHS-5 के समय जम्मू-कश्मीर में 92.4 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में हुए, और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों ने 95.1 प्रतिशत प्रसव कराए। जन्म के समय सेक्स रेशियो 923 से सुधरकर 976 पहुंचा, अर्थात अब हर 1,000 लड़कों पर 976 लड़कियां जन्म लेती हैं। दिसंबर 2020 से AB-PMJAY SEHAT योजना प्रदेश के हर परिवार को प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का निःशुल्क उपचार देती है।
मतदान में पुरुषों से आगे
2024 के विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की महिलाओं ने लोकतंत्र में अपनी शक्ति दिखाई। पहले दो चरणों में 50 में से 17 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। तीसरे चरण में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने मत डाला, जबकि पुरुषों का मतदान 69 प्रतिशत के आसपास रहा।
पीओजेके: न शिक्षा, न काम
पीओजेके की अपनी सांख्यिकीय पुस्तिका वहां की महिलाओं की उपेक्षा उजागर करती है। 2019-20 में वहां केवल 67 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थीं, जबकि पुरुषों में यह दर 86 प्रतिशत थी। उसी वर्ष जम्मू-कश्मीर की 77.3 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थीं। पीओजेके में 13 से 14 वर्ष की 19.8 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जातीं।
काम खोजने वाली महिलाओं में से 19.1 प्रतिशत को काम नहीं मिलता, जबकि पुरुषों में यह दर 7.5 प्रतिशत है। जिन महिलाओं को काम मिलता भी है, उनमें से 64.1 प्रतिशत खेतों में परिश्रम करती हैं और केवल 0.8 प्रतिशत उद्योगों तक पहुंच पाती हैं। 2024 में वहां के सरकारी अस्पतालों में 104 माताओं ने प्रसव से जुड़ी जटिलताओं में प्राण गंवाए, और 43.89 लाख लोगों के पूरे क्षेत्र में केवल 711 नर्सें काम करती हैं।
Freedom House पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान को सभी वर्गों से समान व्यवहार की कसौटी पर 4 में से शून्य अंक देता है, और घरेलू हिंसा से सुरक्षा समेत व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर केवल एक अंक। जिस पाकिस्तान के अधीन यह क्षेत्र है, उसके मानवाधिकार मंत्री आजम नजीर तरार ने स्वयं National Assembly में स्वीकार किया कि 2021 से 2024 के बीच वहां 7,500 से अधिक महिलाओं की हत्या हुई, जिनमें 1,553 हत्याएं ‘सम्मान’ के नाम पर हुईं।
गिलगित-बाल्टिस्तान: जलते स्कूल
गिलगित-बाल्टिस्तान के दियामेर क्षेत्र में साक्षरता दर केवल 30.95 प्रतिशत है, और वहां का Gender Parity Index 34.5 पर अटका है, जो पूरे क्षेत्र में सबसे नीचे है। अगस्त 2018 में लड़कियों की शिक्षा के विरोधी कट्टरपंथियों ने चिलास, दारेल और तांगीर में एक दर्जन से अधिक स्कूलों को आग लगा दी। उनमें से एक बालिका विद्यालय को उपद्रवी पहले भी कम से कम पांच बार जला चुके थे।
दो छोर, दो दिशाएं
श्रीनगर की छात्रा आज निःशुल्क बस में कॉलेज जाती है, अपने नाम का बैंक खाता चलाती है और अपने मत से सरकार चुनती है। दियामेर की बच्ची आज भी इस चिंता में सोती है कि उसका स्कूल अगली सुबह तक बचेगा या नहीं। भारत ने जम्मू-कश्मीर की बेटियों को अवसर, सुरक्षा और सम्मान दिया, जबकि पाकिस्तान ने अपने अधिकृत क्षेत्र की बेटियों को उपेक्षा और असुरक्षा सौंपी। किसी समाज की प्रगति का सबसे सच्चा मापदंड उसकी महिलाएं होती हैं, और इस मापदंड पर नियंत्रण रेखा के दोनों छोरों का अंतर किसी से छिपा नहीं है।


































