घर: संस्कारों की पहली पाठशाला और राष्ट्र निर्माण का आधार

जब-जब किसी बात को आचरण में उतारकार समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की बात आती है, तब-तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र सेविका समिति के नाम उभरकर सामने आते हैं।

यह हम सबने सुना है कि ‘घर’ पहली पाठशाला होती है और माता प्रथम ‘गुरु’ होती है। पर क्या कभी हमने विचार किया है कि वास्तव में ‘घर’ होता क्या है? क्या घर रेट, मिटटी, सीमेंट, लोहा, टाइल्स आदि से मिलकर बनी एक विशेष डिजाईन की इमारत या भवन या ‘ढाँचा’ होता है, जिसकी एक विशेष लोकेशन होती है? आखिर एक ‘घर’ बनता कैसे है? एक इमारत या ढाँचा ‘घर’ कैसे बनता है या बना रह सकता है? यदि हम केवल इस ढाँचे या इमारत को घर मानते हैं तो कहीं न कहीं हमारी सोच खंडित है।

वास्तव में ‘घर’ का निर्माण होता है उसमें रहने वाले लोगों के आचरण से। घर से ही ‘घराना’ शब्द बनता है और जैसे ही किसी घराने का नाम लिया जाता है, तुरन्त उस घराने के लोगों के आचरण, विचार या गुण दोष आदि सब सामने आने लगते हैं। ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की साकार व्यवस्था है का नाम है ‘घर-परिवार’। घर-परिवार या कुटुंब केवल चार दीवारें नहीं होती है, बल्कि इसमें एक दूसरे की चिंता करने वाले, एक दूसरे की देखभाल करने वाले, गलतियाँ सुधारने वाले, एक दूसरे की उन्नति चाहने वाले, सुख-दुःख में हमेशा साथ रहने वाले, आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले और सहयोग करने वाले, परस्पर स्नेही लोग रहते हैं ।

लेकिन, इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि तथाकथित आधुनिकता के नाम पर आजकल लोगों के लिए ‘घर’ केवल भोजन और निद्रा लेने के ठिकाने बनते जा रहे हैं। हर व्यक्ति मशीन बना हुआ है, किसी के पास समय नहीं है और अगर समय है भी तो मोबाइल फोन ने उसे जकड़ा हुआ है। आज की युवा पीढ़ी तो घर में रहना ही नहीं चाहती ! अनेक गाँव-देहात के इलाकों में आज वृद्धजन ही दिखते हैं, क्योंकि सभी युवा कमाने या पढाई के लिए शहरों में गए हुए है और जहाँ तक शहरों में रहने वाले लोगों की बात है तो अधिकाँश का जीवन केवल और केवल धन केन्द्रित है या होता जा रहा है। जहाँ देखो वहाँ भागदौड़, जहाँ देखो वहाँ लाइन लगी हुई है। लोगों के जीवन में ठहराव नाम की चीज ही नहीं है।

वास्तव में, यह एक प्रकार से शोषण जैसा लगता है और इसी ‘शोषण की कुसंस्कृति’ के कारण आज लोगों का जीवन ही ‘संघर्ष’ या भागदौड़ बन गया है। हर जगह उतावलापन, जल्दबाजी, बैचैनी, तनाव, रिश्तों में खटास, नशा, व्यभिचार, अश्लीलता का बोलबाला है। अब इसे विडंबना ही तो कहेंगे कि लोगों के पास तीन घंटे की मूवी, आठ घंटे का मैच और नॉनस्टॉप रील्स देखने का समय और मन तो है, लेकिन बच्चों के साथ बैठने का समय नहीं है और बच्चों के पास माता-पिता के लिए भी समय नहीं है। क्या इस बात को नकारा जा सकता है कि आजकल माता-पिता का दायित्व निर्वहन भी ‘आउटसोर्स’ होने लगा है?

समस्याएँ तो सब गिनाते हैं, लोग समाधान की बात भी करते हैं, लेकिन समस्या यथावत बनी रहती है या और विकराल रूप धारण कर लेती है, क्योंकि समाधान केवल बातों में ही रहता है, आचरण में नहीं उतरता। जब-जब किसी बात को आचरण में उतारकार समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की बात आती है, तब-तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र सेविका समिति के नाम उभरकर सामने आते हैं।

‘पंच परिवर्तन’ अभियान के साथ संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। अभी हाल ही दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित व्याख्यान माला में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘परिवार प्रबोधन’ का विषय उठाया। शब्दों पर ध्यान दीजिये ‘परिवार प्रबोधन’ !  क्या यह एक विडंबना नहीं है कि ‘वसुंधरा को परिवार’ मानने वाले इस देश में अब इस बात के लिए अभियान चलाने पड़ रहे हैं कि अपने घर-परिवार वालों को समय दो, उनके साथ बैठो, बात करो। क्या यह विडंबना नहीं है कि ‘विश्व का कल्याण हो’ ऐसा उद्घोष जिस देश में रोज होता है, उस देश में अपने ही माता-पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़ा जा रहा है? उनकी हत्या की जाने लगी है।

बच्चों या युवा पीढ़ी को लेकर आजकल एक उलाहना सुनने को मिलता है कि आजकल के बच्चे संस्कारी नहीं है। प्रश्न ये उठता है कि संस्कार मिलते कहाँ हैं? कौन देगा? क्या उन स्कूलों और कॉलेजों में संस्कार मिलेंगे जहाँ फ्रेशर और फेयरवेल पार्टियों में अध्यापक और बच्चे डीजे पर एक साथ फूहड़ गानों पर नाचते हैं? एक साथ शराब पीने वाली घटनाएँ भी सामने आने लगी हैं?

दूसरा प्रश्न उठता है कि यदि स्कूल कॉलेज संस्कार सृजन नहीं कर सकते तो कहाँ होंगे और कौन करेगा ? इसका सीधा सा उत्तर है-‘घर-परिवार में’ और घर-परिवार में भी संस्कार सृजन तब होगा जब घर के सभी छोटे-बड़े सदस्य बैठकर आपस में बातचीत करेंगे, संवाद करेंगे। अपने परिवार का इतिहास जानेंगे, परम्पराओं के बारे में जानेंगे, सीखेंगे, अपने समाज और देश की संस्कृति के बारे में जागरूक होंगे। परिवार-प्रबोधन या कुटुंब-प्रबोधन का मतलब ही है घर के सभी सदस्यों के साथ बैठकर बातचीत करना, उनके साथ बैठकर भोजन करना, एक दूसरे की समस्या सुनना और बताना, फिर मिलकर उसका समाधान करना। पारिवारिक बातचीत और पारिवारिक मूल्यों के घटने के कारण ही अधिकाँश समस्याएँ समाज में हैं। जैसे-जैसे पारिवारिक बातचीत और मूल्य बढ़ेंगे ये सारी समस्याएं समाप्त होने लगेंगी। समाज में हर कोई चाहता है कि उसका परिवार खुशहाल और संस्कारी हो। समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है, इसलिए परिवार-प्रबोधन अत्यंत आवश्यक है।

बातचीत अथवा संवाद से बड़े-बड़े युद्ध टल सकते हैं, बातचीत में बहुत ताकत होती है। खराब बातचीत और व्यवहार यदि तलाक, लडाई और आत्महत्या करा सकता है तो अच्छी बातचीत और व्यवहार इन्हें रोक भी सकता है। पारिवारिक मूल्य सिखाने या बढ़ाने हेतु परिवार-प्रबोधन अत्यंत आवश्यक है। भारत को दुनिया का सिरमौर बनना है तो पहले अपनी भावी पीढ़ी को सम्भालना होगा। उन्हें अच्छा नागरिक बनाना होगा। आज का युवा एक अच्छा नागरिक तब बनेगा जब उसे अपने घर परिवार की परंपरा, रिश्ते नातों का बोध होगा, उसे अपने पारिवारिक दायित्वों का बोध होगा।

‘दुनिया’ को जीतने से पहले ‘घर’ को जीतना आवश्यक है। घर को जीतने का मतलब है सभी सदस्यों में निस्वार्थ रूप से अपनेपन का भाव हो, सभी एक हो, सभी में एकता हो, सभी सदस्य भोजन, भजन और भ्रमण एक साथ करते हों। सभी की भाषा, वेशभूषा और विचार अपनी विराट संस्कृति से प्रेरित हों। सभी भारत को भारत की दृष्टि से देखने वाले हों। ऐसा बहुत कुछ।  

अपने घर परिवार से कटा हुआ, खोखली आधुनिकता, यो-यो कल्चर, स्वार्थ और नशे में डूबा हुआ कुसंस्कारी युवा घर-परिवार के लिए तो खतरा है ही, बल्कि देश और समाज के लिए भी खतरा है। जब घर के लोग आपस में बैठकर बात करने लगेंगे, तब पता चलेगा कि घर केवल इमारत, रहने का ठिकाना, भोजन पाने की जगह और सोने की जगह नहीं है, बल्कि यह उस जगह में रहने वालों को श्रेष्ठ बनाने वाला एक “संस्कार केंद्र” है। जब लोगों को घर का वास्तविक महत्त्व समझ आ जाएगा, तब ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता….’ का मतलब भी समझ आएगा और फिर किसी माँ की उसके पुत्र के हाथों हत्या नहीं होगी और माता-पिता वृद्धाश्रमों में भी नहीं जायेंगे और न ही अवसाद के कारण युवा आत्महत्या करेंगे !  

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