Haryana Power Crisis : हरियाणा के गुरुग्राम में बिजली संकट ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है कि क्या एक ही इलाके में सरकारी और निजी कंपनियां सही तरीके बिजली सप्लाई कर सकती हैं? हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (HERC) की ओर से गुरुग्राम और नूंह के लिए निजी कंपनी Eleven Power Private Limited को 25 साल का समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस दिए जाने के फैसले ने विवाद खड़ा कर दिया है। बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों के संगठनों ने इसका विरोध करते हुए आंदोलन किया। इस दौरान कर्मचारियों की हड़ताल और फील्ड स्टाफ की अनुपलब्धता से बिजली की खराबियों को ठीक करने में देरी हुई और कई इलाकों में आपूर्ति प्रभावित हुई।
विवाद केवल निजी कंपनी को लाइसेंस देने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में सरकारी बिजली वितरण कंपनियों की कमाई, कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा, ग्रामीण उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी और बिजली बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसे सवाल हैं। सरकार और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVN) ने भी लाइसेंस का विरोध किया है और इसे चुनौती देने की बात कही है। ऐसे में समझना जरूरी है कि पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल क्या है, यह कैसे काम करता है और इससे आम उपभोक्ता को क्या फायदा या नुकसान हो सकता है।
पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल क्या है?
पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल यानी समानांतर बिजली वितरण व्यवस्था में एक ही भौगोलिक क्षेत्र में एक से ज्यादा बिजली वितरण कंपनियों को लाइसेंस दिया जा सकता है। इसका मकसद बिजली वितरण में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और उपभोक्ताओं को कंपनी चुनने का विकल्प देना है।
भारत में इसकी कानूनी व्यवस्था बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 14 में है। राज्य विद्युत नियामक आयोग मौजूदा बिजली वितरण कंपनी के क्षेत्र में दूसरी कंपनी को भी लाइसेंस दे सकता है, बशर्ते वह कानूनी और तकनीकी शर्तें पूरी करे।
अभी गुरुग्राम और नूंह में दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVN) बिजली सप्लाई करता है। HERC के 19 अक्टूबर 2026 के आदेश के बाद Eleven Power Private Limited को भी इन जिलों में 25 साल के लिए वितरण लाइसेंस मिला है। इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी कंपनी को तत्काल हटा दिया गया है। नई कंपनी का नेटवर्क जहां तैयार होगा और उपभोक्ता स्थानांतरण की प्रक्रिया को नियामक की मंजूरी मिलेगी, वहां ग्राहक दोनों में से बिजली वितरक चुन सकेंगे।
हरियाणा में यह व्यवस्था क्यों लाई जा रही है?
Eleven Power ने अपनी याचिका में तकनीक आधारित बिजली वितरण व्यवस्था विकसित करने और नवीकरणीय ऊर्जा पर अधिक निर्भरता का प्रस्ताव रखा था। कंपनी ने पांच वर्षों में करीब ₹4,717 करोड़ निवेश करने की योजना बताई है। इसमें भूमिगत बिजली केबल, सबस्टेशन और वितरण नेटवर्क के विकास पर बड़ा खर्च शामिल है।
इस फैसले के पीछे मौजूदा व्यवस्था की चुनौतियां भी हैं। अक्टूबर 2025 तक DHBVN के पास नए मीटर लगाने और स्वीकृत बिजली लोड बढ़ाने से जुड़े 1,08,590 आवेदन लंबित होने की बात सामने आई थी। निजी कंपनी का प्रवेश इस तरह की सेवाओं में तेजी लाने और वितरण व्यवस्था में निवेश बढ़ाने की उम्मीद से भी जुड़ा है। हालांकि लाइसेंस मिलने भर से यह साबित नहीं होता कि बिजली कटौती कम हो जाएगी या उपभोक्ताओं के बिल घट जाएंगे। इसके लिए वास्तविक प्रदर्शन और नियामक निगरानी अहम होंगे।
फिर बिजली कर्मचारी विरोध क्यों कर रहे हैं?
हरियाणा बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों के संगठनों का तर्क है कि यह फैसला सरकारी बिजली व्यवस्था के निजीकरण की दिशा में एक कदम है। उनका कहना है कि गुरुग्राम जैसे औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्र से सरकारी वितरण कंपनी को अच्छी कमाई होती है। यदि निजी कंपनी मुख्य रूप से अधिक भुगतान करने वाले शहरी, औद्योगिक और व्यावसायिक ग्राहकों को अपने साथ जोड़ लेती है, तो सरकारी कंपनी की आय घट सकती है।
इसे चेरी-पिकिंग कहा जाता है—यानी निजी कंपनी ऐसे ग्राहक चुनने की कोशिश करे जिनसे अधिक राजस्व मिल सकता है, जबकि कम टैरिफ वाले ग्रामीण और कृषि उपभोक्ताओं की सेवा का आर्थिक बोझ सरकारी कंपनी पर बना रहे।
कर्मचारियों को यह आशंका भी है कि निजी कंपनी के आने से भविष्य में नौकरियों, सेवा शर्तों और सरकारी बिजली निगमों की भूमिका पर असर पड़ सकता है। ये कर्मचारी संगठनों की आशंकाएं हैं हालांकि लाइसेंस मिलने से अपने आप कर्मचारियों की छंटनी या सरकारी कंपनी का निजीकरण नहीं हो जाता।
बिजली गुल क्यों हुई?
हरियाणा बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने 22 से 24 अक्टूबर तक तीन दिन की राज्यव्यापी हड़ताल की घोषणा की। 23 अक्टूबर की रिपोर्टों के मुताबिक, लगभग 40 हजार कर्मचारी इसमें शामिल हुए। फील्ड स्टाफ की अनुपस्थिति से स्थानीय फॉल्ट ठीक करने में देरी हुई और कई आवासीय तथा औद्योगिक इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हुई। इसका असर पानी की आपूर्ति, दफ्तरों के काम और औद्योगिक गतिविधियों पर भी पड़ा।
राज्य सरकार ने जरूरी सेवाएं जारी रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं सक्रिय कीं और कर्मचारियों की छुट्टियों पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए। इस तरह उपभोक्ताओं को बिजली संकट का सामना नियामक के फैसले और उसके विरोध में हुए श्रमिक आंदोलन के बीच पैदा हुई स्थिति के कारण करना पड़ा।
सरकार और DHBVN का क्या रुख है?
हरियाणा सरकार और DHBVN ने HERC के आदेश का विरोध किया है। राज्य सरकार ने कहा है कि वह इस फैसले को बिजली क्षेत्र के अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) में चुनौती देगी और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक जाएगी। सरकार ने आदेश के क्रियान्वयन पर रोक की मांग करने की भी बात कही है।
यहां यह समझना जरूरी है कि HERC एक स्वतंत्र वैधानिक नियामक संस्था है। लाइसेंस उसी ने जारी किया है, न कि DHBVN ने। अब कानूनी चुनौती में यह तय होना बाकी है कि लाइसेंस देने का फैसला लागू रह पाएगा या उसमें कोई बदलाव होगा।
क्या दूसरे राज्यों में भी ऐसा मॉडल है?
मुंबई, महाराष्ट्र : मुंबई के कुछ इलाकों में Tata Power और Adani Electricity Mumbai जैसी कंपनियां बिजली वितरण करती हैं। यह समानांतर वितरण का प्रमुख उदाहरण है, हालांकि कंपनियों के लाइसेंस क्षेत्र और नेटवर्क की व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं।
दिल्ली : दिल्ली में बिजली वितरण का निजीकरण किया गया था। अलग-अलग क्षेत्रों में BSES की कंपनियां और Tata Power Delhi Distribution बिजली सप्लाई करती हैं। यह गुरुग्राम के मॉडल से अलग है, क्योंकि वहां प्रत्येक निर्धारित क्षेत्र में संबंधित कंपनी का वितरण क्षेत्राधिकार है।
उपभोक्ताओं को क्या फायदा और नुकसान हो सकता है?
पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल का सबसे बड़ा संभावित फायदा यह है कि उपभोक्ता के पास बिजली कंपनी चुनने का विकल्प हो सकता है। कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा से बेहतर ग्राहक सेवा, तेज शिकायत निवारण, स्मार्ट मीटरिंग और नेटवर्क में निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।
लेकिन इसके जोखिम भी हैं। अगर अधिक भुगतान करने वाले ग्राहक निजी कंपनी की ओर चले जाते हैं, तो सरकारी वितरण निगम के राजस्व पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में कृषि और ग्रामीण उपभोक्ताओं को मिलने वाली क्रॉस-सब्सिडी की व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि टैरिफ, नेटवर्क शुल्क, क्रॉस-सब्सिडी और उपभोक्ता स्थानांतरण के नियम कैसे लागू किए जाते हैं।
एक और अहम बात यह है कि निजी कंपनी आने से बिजली अपने आप सस्ती नहीं हो जाती। बिजली की दरें नियामकीय व्यवस्था के तहत तय होती हैं। प्रतिस्पर्धा से सेवा बेहतर हो सकती है, लेकिन बिल घटने की गारंटी नहीं है।
आगे क्या होगा?
Eleven Power को लाइसेंस मिल चुका है, लेकिन उपभोक्ता तुरंत कंपनी बदल नहीं सकते। कंपनी को 60 दिनों के भीतर उपभोक्ता स्थानांतरण की प्रक्रिया से संबंधित योजना मंजूरी के लिए पेश करनी है। उसकी प्रस्तावित सप्लाई 2027-28 से शुरू होने की उम्मीद है, जबकि नेटवर्क का विकास चरणबद्ध तरीके से किया जाना है।

































