₹5 का फिनाइल ₹33,000 में! MP में सरकारी खरीद पर सवाल, AI से पकड़ी जा सकती है गड़बड़ी

₹306 की LED ₹11,800 में, 200 बल्बों पर ₹60 लाख खर्च! सरकारी खरीद में कैसे रुकेगी मनमानी?

मध्य प्रदेश में सरकारी खरीद के दामों ने चौंकाया। एक ही तरह की जरूरतों के लिए अलग-अलग नगर निकायों में कीमतों का भारी अंतर सामने आया। सवाल सिर्फ महंगी खरीद का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो भुगतान से पहले इन अंतरों को पकड़ नहीं पाया।

₹5 लीटर का फिनाइल ₹33,000 लीटर में। करीब ₹306 की LED लाइट भोपाल में ₹11,800 में। 200 LED बल्बों की खरीद पर ₹60 लाख खर्च होने का उदाहरण। और कचरा उठाने वाली गाड़ी, जिसकी कीमत एक नगर निकाय में ₹2 लाख बताई गई, दूसरे में ₹6 लाख तक पहुंच गई।

ये आंकड़े मध्य प्रदेश के नगर निकायों में सरकारी खरीद को लेकर अधिकारियों के सामने पेश किए गए एक प्रेजेंटेशन में सामने आए। सोशल मीडिया पर वायरल बैठक के वीडियो में वरिष्ठ अधिकारी इन कीमतों पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं।

मध्य प्रदेश के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि सरकार को पता है कि वे क्या खरीद रहे हैं और किस कीमत पर खरीद रहे हैं। मध्य प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPSEDC) के अतिरिक्त प्रबंध निदेशक अंशुमान राज के प्रेजेंटेशन में खरीद की कीमतों में भारी अंतर के उदाहरण दिए गए।

यह किसी विपक्षी नेता का आरोप भर नहीं है। सरकारी व्यवस्था के भीतर ही इन आंकड़ों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। अब असली सवाल है कि जब सरकार के पास खरीद का डेटा मौजूद है, तो भुगतान से पहले ऐसी विसंगतियों की जांच क्यों नहीं हुई? और अगर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

₹5 का फिनाइल, ₹33,000 की कीमत: आखिर खरीद कैसे हुई?

प्रेजेंटेशन में अलग-अलग नगर निकायों की खरीद के जो उदाहरण दिए गए, वे सरकारी खरीद प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल उठाते हैं।

इन आंकड़ों की स्वतंत्र जांच और मूल खरीद दस्तावेजों से पुष्टि जरूरी है। केवल कीमतों का अंतर भ्रष्टाचार साबित नहीं करता। सामान की गुणवत्ता, क्षमता, इंस्टॉलेशन, परिवहन, रखरखाव और टेंडर की शर्तों से भी कीमत बदल सकती है।

लेकिन जब अंतर इतना बड़ा हो, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हर खरीद का ऑडिट कराए। यह पता लगाया जाए कि कीमत में अंतर का कोई वैध कारण था या सरकारी धन खर्च करने में गंभीर लापरवाही हुई।

सरकारी सिस्टम में गड़बड़ी थी, तो मंजूरी किसने दी?

इस मामले की गंभीरता केवल असामान्य कीमतों में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया में है जिसके तहत ये खरीद हुईं।

किसी सरकारी खरीद में आमतौर पर जरूरत तय होती है, बजट स्वीकृत किया जाता है, टेंडर या खरीद प्रक्रिया अपनाई जाती है, सामान की आपूर्ति की पुष्टि होती है और फिर भुगतान किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर जांच की व्यवस्था होती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि समान या तुलनीय सामान अलग-अलग जगहों पर बेहद अलग कीमतों में खरीदा गया, तो शुरुआती अनुमान किसने तैयार किए? टेंडर किसने मंजूर किए? सामान की गुणवत्ता और आपूर्ति किसने सत्यापित की? और भुगतान की अनुमति किस अधिकारी ने दी?

अपर मुख्य सचिव संजय दुबे की चेतावनी बताती है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। लेकिन चेतावनी और कार्रवाई में अंतर होता है। असली परीक्षा यह होगी कि जांच के बाद जिम्मेदारी तय होती है या नहीं।

अगर किसी खरीद में अनियमितता साबित होती है, तो कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। खरीद को मंजूरी देने, गुणवत्ता की पुष्टि करने और भुगतान स्वीकृत करने वाले संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। यदि विक्रेता की मिलीभगत सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

जब डेटा गड़बड़ी पकड़ सकता है, तो AI का इस्तेमाल पहले क्यों नहीं?

यहीं यह मामला मध्य प्रदेश से आगे बढ़कर सरकारी व्यवस्था में तकनीक के इस्तेमाल का बड़ा सवाल खड़ा करता है। कल्पना कीजिए कि हर सरकारी खरीद का प्रस्ताव मंजूरी से पहले एक ऐसे डिजिटल सिस्टम से गुजरे, जो उसी सामान की पिछली सरकारी खरीद, दूसरे विभागों की कीमतों और बाजार के तुलनीय दामों से उसका मिलान करे।

इसी तरह, यह सिस्टम एक ही विक्रेता को बार-बार दिए जा रहे ठेकों, छोटे-छोटे हिस्सों में बांटे गए अनुबंधों, असामान्य खरीद पैटर्न और खरीदे गए लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रहे उपकरणों की पहचान में मदद कर सकता है।

सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि गड़बड़ी का संकेत भुगतान के बाद नहीं, भुगतान से पहले मिल सके।

हालांकि, AI अपने आप भ्रष्टाचार का फैसला नहीं कर सकता। यदि एक नगर निकाय की LED लाइट में इंस्टॉलेशन, लंबी वारंटी और अतिरिक्त उपकरण शामिल हैं, जबकि दूसरे की खरीद केवल बल्ब की है, तो दोनों कीमतों की सीधी तुलना गलत हो सकती है। इसलिए तकनीकी विशेषताओं और विश्वसनीय डेटा के आधार पर तुलना जरूरी है।

AI संदिग्ध खरीद को चिह्नित कर सकता है। उसके बाद अधिकारी, ऑडिटर और जांच एजेंसियां यह तय करेंगी कि अंतर उचित था, लापरवाही हुई या भ्रष्टाचार।

क्या सरकारी खरीद में इंसानी विवेक की जगह मशीन ले सकती है?

सरकारी कामकाज में AI का इस्तेमाल बढ़ाने का अर्थ यह नहीं है कि अधिकारियों की जरूरत खत्म हो जाएगी। खरीद प्रक्रिया में स्थानीय परिस्थितियों को समझना, सामान की गुणवत्ता जांचना, नियमों की व्याख्या करना और जवाबदेही तय करना आज भी इंसानी निर्णय पर निर्भर करता है।

लेकिन हर खरीद में कीमतों का मिलान, दस्तावेजों की जांच, बजट की निगरानी और असामान्य खर्च की पहचान जैसे दोहराए जाने वाले काम तकनीक की मदद से अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं।

इसके लिए सरकार को कुछ बुनियादी सुधार करने होंगे। सभी नगर निकायों की खरीद का डेटा एक समान प्रारूप में उपलब्ध कराया जाए। सामान की तकनीकी विशेषताएं स्पष्ट हों। बड़े मूल्य-अंतर पर स्वतः जांच शुरू हो। भुगतान के साथ खरीद और आपूर्ति के रिकॉर्ड डिजिटल रूप में जुड़े हों। और जांच के नतीजों के आधार पर जिम्मेदारी तय करने की समयसीमा निर्धारित हो।

साथ ही, AI सिस्टम के गलत निष्कर्ष, अधूरे डेटा और जानबूझकर सिस्टम को चकमा देने की कोशिशों से बचने के लिए स्वतंत्र ऑडिट भी जरूरी है।

₹250 करोड़ की संभावित बचत का दावा: अब हिसाब सार्वजनिक हो

प्रेजेंटेशन में यह अनुमान भी बताया गया कि सबसे कम कीमत के बजाय औसत कीमत पर खरीद करने से करीब ₹250 करोड़ की बचत हो सकती थी। इस आंकड़े की पुष्टि के लिए मूल खरीद डेटा, तुलना का आधार और गणना की पद्धति सार्वजनिक होनी चाहिए।

फिर भी, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि अगर कीमतों में अंतर की वजह से सरकारी धन का अनुचित खर्च हुआ है, तो क्या उसकी भरपाई होगी? क्या संबंधित ठेकों का स्वतंत्र ऑडिट होगा? क्या दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और विक्रेताओं पर कार्रवाई होगी? और क्या सरकार जांच के निष्कर्ष जनता के सामने रखेगी?

करदाताओं के पैसे से होने वाली खरीद में पारदर्शिता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है। ₹5 और ₹33,000 के बीच का अंतर सिर्फ कीमत का अंतर नहीं है। यह सरकारी खरीद व्यवस्था की जवाबदेही की परीक्षा है।

अगर डेटा आज इन विसंगतियों को सामने ला सकता है, तो तकनीक कल उन्हें रोकने में मदद क्यों नहीं कर सकती? और जब सरकार को खुद गड़बड़ी के संकेत मिल रहे हैं, तो सबसे अहम सवाल यही है—गलत खरीद के लिए जिम्मेदार कौन है और कार्रवाई कब होगी?

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