भारतीय नौसेना ने चार बड़े युद्धपोत बनाने की लंबे समय से अटकी योजना को आगे बढ़ा दिया है। नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने सोमवार को बताया कि पिछले सप्ताह चुने गए भारतीय शिपयार्ड को चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (LPD) बनाने के लिए प्रस्ताव अनुरोध (RFP) जारी किया गया है। इसके तहत कंपनियों को तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव जमा करने होंगे। इससे परियोजना खरीद प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गई है।
इस परियोजना पर करीब 50,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। हर युद्धपोत का वजन 30,000 टन से अधिक और लंबाई करीब 220 मीटर होगी। आकार के लिहाज से ये INS विक्रांत के बाद भारत में बनाए जाने वाले सबसे बड़े युद्धपोतों में शामिल होंगे। INS विक्रांत का वजन करीब 45,000 टन है।
हालांकि, RFP जारी होने का मतलब यह नहीं है कि निर्माण का ठेका दे दिया गया है। पहले कंपनियों से मिले प्रस्तावों का मूल्यांकन होगा। इसके बाद शिपयार्ड का चयन और निर्माण का ठेका दिया जाएगा। जहाजों के डिजाइन, निर्माण और सभी जरूरी प्रणालियों को तैयार करने में कई साल लग सकते हैं।
क्या होता है लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक?
लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक यानी LPD एक ऐसा युद्धपोत है, जिसका इस्तेमाल समुद्र के रास्ते सैनिकों, हथियारों और सैन्य वाहनों को जमीन तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। इसकी मदद से बिना किसी बंदरगाह पर पहुंचे सैनिकों को समुद्र से सीधे तट तक उतारा जा सकता है।
इन युद्धपोतों में तीन प्रमुख सुविधाएं होती हैं।
पहली, विशेष डॉक: जहाज के पिछले हिस्से में पानी भरने वाला एक बड़ा कक्ष होता है। इसमें पानी भरने के बाद छोटी लैंडिंग बोट और होवरक्राफ्ट बाहर निकल सकते हैं। इनके जरिए सैनिकों, वाहनों और सैन्य उपकरणों को समुद्र से किनारे तक पहुंचाया जाता है।
दूसरी, हेलीकॉप्टर की सुविधा: जहाज पर हेलीकॉप्टर उतारने और उड़ान भरने के लिए डेक होता है। इनमें हेलीकॉप्टर रखने की जगह भी होती है। हेलीकॉप्टर सैनिकों और सामान को तट तक पहुंचा सकते हैं।
तीसरी, सैनिकों और वाहनों के लिए जगह: इन जहाजों के अंदर सैनिकों के रहने, सैन्य वाहन रखने, हथियारों और जरूरी सामान को सुरक्षित रखने की व्यवस्था होती है। जरूरत पड़ने पर इनमें अस्पताल जैसी चिकित्सा सुविधाएं भी दी जा सकती हैं।
इन सुविधाओं के कारण LPD समुद्र से सैन्य अभियान चलाने के साथ-साथ राहत और बचाव कार्यों में भी उपयोगी होते हैं।
नए युद्धपोतों में कितने सैनिक और हेलीकॉप्टर होंगे?
नौसेना की योजना के अनुसार, हर LPD पर करीब 60 अधिकारी और 525 नौसैनिक तैनात होंगे। इसके अलावा, एक जहाज पर पूरी सैन्य तैयारी के साथ करीब 900 थलसेना के जवानों को ले जाने की क्षमता होगी।
इन जहाजों पर टैंक, सैन्य वाहन, तोपें और दूसरे जरूरी उपकरण भी रखे जा सकेंगे। सैनिकों और सैन्य सामान को तट तक पहुंचाने के लिए विशेष लैंडिंग बोट उपलब्ध होंगी।
योजना में दो भारी सामान उठाने वाले हेलीकॉप्टर और विशेष अभियान चलाने के लिए 12 हेलीकॉप्टर रखने की व्यवस्था भी शामिल है। जहाजों पर मरम्मत के लिए वर्कशॉप जैसी सुविधाएं भी होंगी, जिससे समुद्र में दूसरे युद्धपोतों की सहायता की जा सकेगी।
समुद्र से जमीन पर सैन्य अभियान कैसे चलाया जाता है?
समुद्र से जमीन पर सैनिक उतारकर अभियान चलाने को एम्फीबियस वॉरफेयर कहा जाता है। इसमें नौसेना और थलसेना मिलकर काम करती हैं।
ऐसे अभियान में युद्धपोत सैनिकों और सैन्य उपकरणों को समुद्र के रास्ते निर्धारित स्थान तक ले जाते हैं। इसके बाद छोटी लैंडिंग बोट और होवरक्राफ्ट सैनिकों तथा वाहनों को तट तक पहुंचाते हैं। वहीं, हेलीकॉप्टर सैनिकों को उन जगहों तक ले जा सकते हैं, जहां सीधे पहुंचना मुश्किल होता है।
इस तरह एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर सैनिक उतारे जा सकते हैं। इससे सैन्य बलों को तेजी से कार्रवाई करने में मदद मिलती है।
हालांकि, इन जहाजों का इस्तेमाल सिर्फ युद्ध के लिए नहीं होता। चक्रवात, भूकंप और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत सामग्री पहुंचाने, संकटग्रस्त इलाकों से नागरिकों को निकालने और चिकित्सा सहायता देने में भी इनकी अहम भूमिका होती है।
फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कितने ऐसे जहाज हैं?
फिलहाल भारतीय नौसेना के पास INS जलाश्व एक प्रमुख लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक है। भारत ने इसे 2007 में अमेरिका से खरीदा था। यह पहले अमेरिकी नौसेना में USS Trenton के नाम से सेवा दे चुका है।
INS जलाश्व के अलावा नौसेना के पास सैनिकों और सैन्य उपकरणों को तट तक पहुंचाने वाले छोटे लैंडिंग जहाज भी हैं। नए चार LPD बनने से नौसेना की समुद्र के रास्ते सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों को ले जाने की क्षमता बढ़ेगी।
इन जहाजों से भारत को अपने द्वीपीय क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत करने, मित्र देशों की सहायता करने और विदेशों में संकट के दौरान भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने में मदद मिल सकती है।
चीन की नौसैनिक ताकत भी एक बड़ी वजह
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक ताकत को भी इस परियोजना के पीछे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कारण माना जा रहा है। चीन के पास Type 071 लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक और Type 075 एम्फीबियस असॉल्ट शिप जैसे कई बड़े युद्धपोत हैं।
ऐसे में भारत के लिए अपनी समुद्री क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण है। नए LPD भारतीय नौसेना को हिंद महासागर में दूर तक सैन्य बल पहुंचाने, द्वीपों की सुरक्षा करने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों में राहत अभियान चलाने की अतिरिक्त क्षमता देंगे।
2008 से चल रही है परियोजना
इन युद्धपोतों को बनाने की योजना नई नहीं है। भारतीय नौसेना ने 2008 में इनके लिए अपनी जरूरतें तय की थीं। इसके बाद 2013 में चार LPD बनाने के लिए करीब 2.6 अरब डॉलर का टेंडर जारी किया गया था।
उस समय लार्सन एंड टुब्रो, पिपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग और ABG शिपयार्ड को प्रस्ताव देने के लिए कहा गया था। हालांकि, परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी और अक्टूबर 2020 में नौसेना ने पुराना टेंडर रद्द कर दिया।
इसके बाद 2021 में नई प्रक्रिया शुरू की गई। भारतीय शिपयार्ड को विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी करके जहाज बनाने का विकल्प दिया गया। शुरुआती योजनाओं में जहाजों का वजन करीब 20,000 टन रखने की बात थी, लेकिन अब इनका प्रस्तावित वजन 30,000 टन से अधिक हो गया है।
अब आगे क्या होगा?
अब नौसेना को शिपयार्ड से तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव मिलने के बाद उनका मूल्यांकन करना है। इसके बाद निर्माण के लिए कंपनी या कंपनियों का चयन किया जाएगा और ठेका दिया जाएगा।
वाइस एडमिरल अजय कोचर के मुताबिक, नौसेना के लिए 78 अन्य प्लेटफॉर्म और 120 फास्ट इंटरसेप्टर बोट खरीदने की शुरुआती मंजूरी भी दी गई है। इन परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत करीब 2.41 लाख करोड़ रुपये बताई गई है। इनकी खरीद प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में है।
फिलहाल चार नए LPD युद्धपोत निर्माण से पहले की प्रक्रिया में हैं। यदि परियोजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो भविष्य में ये जहाज भारतीय नौसेना की सैन्य क्षमता और समुद्र के रास्ते राहत एवं बचाव अभियान चलाने की ताकत बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

































