लता मंगेशकर घृणा से भरे फिल्म उद्योग में आगे भी बढीं और वीर सावरकर का गुणगान भी किया
‘नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है’ ‘अजीब दास्तान है यह, कहाँ शुरू कहाँ खत्म, यह मंज़िलें हैं कौन सी, न वो समझ सकें न हम!’ कुछ ऐसे ही कर्णप्रिय गीतों से...
























