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राहुल चला मोदी की चाल और अपनी चाल भी भूल बैठा

Nitesh Kumar Harne द्वारा Nitesh Kumar Harne
27 September 2017
in मत
राहुल गाँधी गुजरात
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आगामी गुजरात चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तीन दिनों के गुजरात दौरे पर हैं । राहुल गांधी सबसे पहले द्वारका में श्री कृष्ण मंदिर गए और माथा टेका । द्वारकाधीश के दर्शन के बाद पुरोहित ने दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के हस्ताक्षरयुक्त संदेश दिखाए । इन संदेशों के साथ कांग्रेस की ओर से ट्वीट किया गया कि राहुल गांधी ने उसी परंपरा की आगे बढ़ाया है । आखिर किस परंपरा की बात कर रही है कांग्रेस? वही परंपरा जिस परम्पराके तहत कांग्रेस ने हिन्दुओं के इष्ट देवताओं का समय समय पर मजाक बनाया है या उस परंपरा की जिसमे इन्होने भगवान् श्रीराम के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर दिया था । या उस परंपरा की जिसमे हिन्दू धर्म को बदनाम करना ही एकमात्र लक्ष्य होता था । आखिर कांग्रेस खुद ये फैसला कर ले की जब उन्होंने राम-कृष्ण का अस्तित्व ही नहीं माना कभी तो फिर ये मंदिर की साधना सिर्फ चुनाव को साधने का ढकोसला भर है ।

द्वारकाधीश के सहारे हिन्दू वोट को साधने की कोशिश :

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“कौवा चला हंस की चाल और अपनी चाल भी भूल बैठा” मोदी के विकास की गंगा को भगवाकरण की राजीनीति समझ कर आज राहुल गाँधी तुष्टिकरण की अपने परम कर्त्तव्य से समय निकाल कर मंदिरों में माथा टेकते घूम रहे है । दर असल ये मोदी के भारत के विश्वगुरु बनने की कल्पना मात्र है । आज राहुल गाँधी ये भली भांति समझ रहे है की वो जमाना भी गया जब सभी पार्टी मुस्लिम वोट लेने की होड़ मचाती थी । वो दौर और था अब दसको से उपेक्षित हिन्दुओं का गुस्सा कांग्रेस को इस कदर महंगा पड़ रहा ही की कभी भगवा को आतंक करार देनेवाली कांग्रेस के युवराज को आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसी भगवा के तले सर झुकाना पड़ रहा है । राहुल ये भली भांति जान रहे है आनेवाले समय में सिर्फ एक धर्म विशेष के वोट लेकर चुनाव नहीं जीता जायेगा इसलिए मंदिर में माथा टेक हिन्दू ह्रदय में जगा बना अपनी राजनीती साधने का कम किया जा रहा है ।

तीन वर्ष पहले तक देखे तो यही राहुल गाँधी थे जिन्होंने कहा था “जो मंदिर जाता है वो लड़कियां छेड़ता है”, आज वही राहुल मंदिर-मंदिर शीश झुका रहे है । द्वारकाधीश मंदिर में पूजा अर्चना कर इसे अपनी परंपरा बता रहे है । कांग्रेस सब भूल जाती है लेकिन जनता अब भुलाये नहीं भूलती । जब द्वारकाधीश मंदिर में पुरोहित दादी इंदिरा और पिता के सन्देश दिखाते है तो भगवा आतंक की रचयिता कांग्रेस पार्टी क्षण भर देर न करते हुए इसे अपनी परंपरा बता देती है और उसे तनिक मात्र भी डर नही होता है उस समाज का जिस के तृष्टिकरण के लिए उसने कभी देश को ताक पर रख दिया था । द्वारकाधीश के अस्तित्व को नकारनेवाले आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए द्वारकाधीश को नतमस्तक है । यह पूजा कितनी फलदायी होगी कोई नही जानता, इससे पहले राहुल ने काशी-विश्वनाथ से विजय का आशीष माँगा था लेकिन बाबा की कृपा मोदी पर बरसी और ऐसी बरसी की दशको बाद किसी पार्टी ने अपने दम पर बहुमत प्राप्त किया । इतने आसानी से अगर हिन्दू वोट मिल गए होते तो शायद अडवानी आज मार्गदर्शक मंडल की शोभा नहीं बढ़ा रहे होते राहुल को यह भी समझना बाकी है । वैसे भी द्वारकाधीश तो निर्मोही – छलिया है ।

राहुल गुजरातियों को सिखायेगे GST के नुकसान :

राहुल गांधी ने आज मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जीएसटी से लाखों लोगों का कारोबार ठप हो गया, GST से देश में एक टैक्स नहीं 5 अलग-अलग टैक्स हैं । युवा देश के लिए काम करना चाहता है, लेकिन एनडीए सरकार रोजगार नहीं दे पा रही है । किसानों को उनकी फसल की सही कीमत नहीं मिल पा रही है । मोदी सरकार ने नोटबंदी करके किसानों की कमर तोड़ दी है । राहुल गाँधी ये बात समझ ही नही पा रहे है की जिस GST, और नोटबंदी को वे बार बार मुद्दा बना रहे है दरअसल इसी मुद्दों के सहारे शाह-मोदी लोगो के दिलों में उतरते जा रहे है क्यूंकि जनता भी यह समझ रही है चाहे यह दोनों योजनाओ से कितनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा हो लेकिन यह देश को दूरगामी परिणाम जरुर देंगे । यही दोनों मास्टरस्ट्रोक के सहारे मोदी अपना चुनाव विजय रथ आगे बढ़ा रहे है और चुनाव दर चुनाव जित बीजेपी की झोली में डाल रहे है ।

राहुल है की समझने को तैयार ही नही है की दरअसल जीतना वो GST और नोटबंदी चिल्लायेगे वे उतना ही बीजेपी को फायदा पहुचाते जायेगे । राहुल बाकि राज्यों की तरह गुजरात में भी वही नाकाम कोशिश कर रहे है । राहुल उन गुजरातियों को उद्योग-व्यापर और GST के नुकसान समझा रहे है जिन गुजरातियों का देश के उद्योगधन्दो में बड़ा योगदान है । जिन गुजरातियों ने पुरे देश के बाजार की नब्ज पकड़ राखी है वे अब राहुल गाँधी से सीखेगे की GST देश के लिए अच्छा है या ख़राब । मुझे नहीं लगता इतने बुरे दिन है गुजरात के की उन्हें राहुल गाँधी से उद्योगधन्दो की समझ लेनी पड़ें।

राहुल को महँगी पड़ेगी हार्दिक पटेल की दोस्ती :

पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन से सुर्ख़ियों में आये हार्दिक पटेल ने ट्वीट करके राहुल गांधी का स्वागत किया है। अब तक आम आदमी पार्टी के साथ दिखते रहे हार्दिक के इस ट्वीट ने नई अटकलों को जन्म दे दिया । सभी तारों को तारों से जोड़ते जाइये तो आप भी समझ जायेगे की माजरा क्या है? कुछ महीनों पहले यही हार्दिक पटेल पाटीदार समाज को लेकर गुजरात में आन्दोलन कर रहा था जिस आन्दोलन में खूब आगजनी हुई और सरकारी खजाने का जमकर नुक्सान किया गया था । कारन मात्र इतना नहीं था की पाटीदार समाज को आरक्षण चाहिए बल्कि कारण यह था मोदी को रोकंने के लिए गुजरात में टूट चुकी कांग्रेस को किसी मजबूत कड़ी का सहारा चाहिए था । वरना कांग्रेस भी जानती है जो मोदी विकास मात्र तिन वर्षो में देश पर इस कदर हावी हो सकता है उसने 14 वर्षो में गुजरात में क्या नहीं किया होगा । हार्दिक को नेता बना दिया गया और विपक्ष और कांग्रेस को इसके बदले में मोदी विरोधी लहर बनाने में एक साथी मिल गया ।

आन्दोलन के समय लग रहा था की सच में ये एक आन्दोलन है आरक्षण के लिए उस पाटीदार समाज का जो कभी आरक्षण के खिलाफ था । जो समाज एक समृद्ध समाज माना जाता है । उस समाज को आरक्षण की अचानक से जरुरत पड़ गयी हो  और वो भी आझादी के इतने सालो बाद सीधे 2014 के बाद ही क्यूँ? तो आरक्षण के बहाने गुजरात की राजनीती नरेन्द्र मोदी और अमित के पहुँच से दूर करने की एक असफल कोशिश थी । क्यूंकि वही हार्दिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वागत नहीं करता बल्कि वो स्वागत करता है राहुल गाँधी का । क्यूँ? कैसे जानने लगे ये दोनों एक दूजे को? क्या रिश्ता है इनका जो ये हार्दिक राहुल को रिसीव करने जाते है । यह याराना अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है । अबतक सारा मामला समझ में आ ही गया होगा ।

बस यहीं चूक कर जाते है राहुल गाँधी । राहुल को लगता है जनता अब भी वही 1984 की जनता है की आज करे और कल भूल गए । राहुल की परेसानी यही है की इन्हें यह राजनीती समझ तो आती है लेकिन करनी नहीं आती है । राहुल अब भी कांग्रेस वाली पुरानी परम्परागत राजीनीति को संजोये बैठे है । कब समझेगे की जनता इनकी इस बेवकूफी भरी आदतों से तंग आ गयी है । जहाँ एक और इस देश में अनगिनत ऐसे मुद्दे है जिसमे बदलाव लाया जा सकता है, वहीं राहुल अब भी हिन्दू-मुस्लिम, जात-पात और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजीनीति के सहारे जोर अजमाना चाहते है । वो समझ ही नही रहे है की इस बार उनका मुकाबला राम मदिर और परंपरागत हिन्दू वोटर के सहारे बैठी बीजेपी के साथ नही है बल्कि अब उनका मुकाबला नयी उर्जावान, जात-पात से ऊपर उठकर सबका साथ सबका विकास, सबको रोजगार, सबको मकान, एक भारत श्रेष्ट भारत, मेक इन इंडिया और हिंदुत्व और विकास साथ लेकर चलनेवाली बीजेपी से है, एक विकासपुरुष मोदी से है । कई बार आपको अपनी रणनीति इसलिए बदलनी पड़ती है की सामनेवाले के पासे सही पड़ने लग गए है ।

राहुल को यह भी समझना है की सामने वाला आज भी विकास की बात कर के सिर्फ जनता और युवा को लुभा ही नही रहा है बल्कि विकास की नीव भी रखता जा रहा है, हर वो काम कर रहा है जिसको सोचने में ही पिछली सरकारों के पसीने छूटने लगते थे । हर उस कामों में हाथ डाल रहा है जहाँ पता है मुश्किल बहुत है परेशानियाँ भी है । फिर भी जित-हार से ऊपर उठकर जनता का साथ लेकर वो हर मुमकिन कोशिश कर रहा है क्यूंकि वो जानता है बिमारी गहरी है और इलाज भी बड़ा हि करना है । वही दूसरी ओर राहुल अब भी दादा नेहरू, दादी इंदिरा और पिता राजीव की विरासत में दी गई तृष्टिकरण की राजीनीति से बहार नहीं आ पा रहे है । अगर बीजेपी अब भी हिन्दू और राम मंदिर के सहारे बैठी होती तो एक बार को शायद राहुल की परंपरागत राजनीती फिर एक बार चमक सकती थी । लेकिन आज का भारत एक अलग भारत है यहाँ मंदिर भी चाहिए और विकास भी चाहिए यहाँ गीता भी चाहिए और कंप्यूटर भी चाहिए यहाँ रोजगार भी चाहिए और शिक्षा भी चाहिए । यहाँ घर भी चाहिए खाने को दो जून की रोटी भी चाहिए और जब देश को ऐसे वकत एक बड़े बदलाव की आस है राहुल अब भी अख़लाक़, हार्दिक, रोहित, पाटीदार आन्दोलन, जाट आन्दोलन, उमर खालिद, कन्हैय्या, गुरमेहर में अपनी 2019 के प्रधानमंत्री की कुर्सी तलाश रहे है ।

दरअसल, कांग्रेस ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वो भी हिन्दुओं के धार्मिक महत्व को स्वीकार करती है । जिस तरह से गुजरात के सामाजिक ताने-बाने में धर्म शामिल है, और मोदी-बीजेपी अपने परम्परागत तरीके से इसे समझमे माहिर है बल्कि खुद की आस्था से जोड़ रखा है तो आज के समय में शायद ही कोई राजनीतिक दल नज़रअंदाज़ करे । यही वजह है कि राहुल गांधी सौराष्ट्र के तीन दिनों के दौरे पर कई मंदिरों में जाएंगे । लेकिन राहुल गांधी, मोदी और भाजपा के इस मॉडल की नकल कर उन्हें इस तरह सियासी टक्कर दे पाएंगे, ये कहना ग़लत होगा । मंदिरों में जाने का कांग्रेस के परंपरागत मुसलमान वोटर्स में कैसा राजनीतिक संदेश जाएगा, इस पर अभी विचार करना बाकी है ।

फिलहाल भाजपा के पदचिन्हों पर कदम रखते राहुल गाँधी को हिन्दुओ की धार्मिक आस्था के सहारे गुजरात की कुर्सी साधने का प्रयोग करते देखना भी अच्छे दिन ही है । आगे देखना है गुजरात में द्वारकाधीश की कृपा किसपर बरसेगी।

Tags: गुजरातराहुल गाँधी
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Between Rafale and AMCA; Where Does the Su-57 Fit | IAF| HAL | Wings India

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