मोपेड पर घूमने वाली और पारले-G खाने वाली जेनेरेशन नहीं है ये, अब कुछ नया करने का वक्त

बाजार

भारत की अर्थव्यवस्था में जो मंदी देखने को मिल रही है, उसका सबसे बड़ा कारण भारतीय ग्राहकों द्वारा खपत में बड़ी कमी आना माना जा रहा है। इसका मतलब यह है कि लोग चीजें खरीदने से ज़्यादा पैसे को बचाने पर फोकस कर रहे हैं जिसके कारण बाजार में सुस्ती आती है, और फिर बाजार में सुस्ती आने के अपने नुकसान है, फिर वो चाहे बेरोजगारी बढ़ना हो, या फिर निवेश कम आना! हालांकि, यहां यह समझना सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर भारत के ग्राहकों की कंजप्शन इतनी कम क्यों हो गयी है? अब इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला तो यह कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे ही ना हों, और दूसरा कारण ये कि जो चीज़ें लोग खरीदना चाहते हों, वो मार्केट में उपलब्ध हो ही नहीं। यानि वे दूसरे ब्रांड्स पर निर्भर हो रहे हैं।

भारत के मामले में ऐसा नहीं है कि लोगों के पास खर्च करने के पैसे नहीं हैं। इसी वर्ष मई में आई रिपोर्ट के मुताबिक लोग परिवहन के स्रोतों में अब हवाई यात्रा को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। हवाई यात्रा अब बस और रेल यात्रा पर भारी पड़ने लगी है। यानि लोग सस्ती और निम्न स्तर की सुविधाओं के बदले महंगी और उच्च स्तर की सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। इतना ही नहीं, विदेश जाने वाले यात्रियों की संख्या में भी भारी इजाफा देखने को मिल रहा है। जानकर आश्चर्य होगा कि 71,000 हजार भारतीय रोजाना विदेश के लिए उड़ान भरते हैं। स्पष्ट है कि भारतीय ग्राहकों के पास पैसा तो है, और वे उसे खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन सिर्फ उन्हीं सेवाओं के लिए जो उन्हें वाकई में चाहिए।

तो इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय ग्राहकों को जो सेवा या उत्पाद चाहिए, वो उन्हें भारत के ब्राण्ड्स उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं, और इसके पीछे कहीं ना कहीं भारतीय उत्पादकों में इनोवेशन की कमी ही सबसे बड़ा कारण है। भारतीय उत्पादक सोचते हैं कि जो चीज़ या उत्पाद आज से 20 साल पहले सफल हुआ, वह आगे भी सफल होगा और सफल होता ही रहेगा बजाय इसको ध्यान में रखे कि बाजार पर लागू होने वाले बाकी फ़ैक्टर्स किस तरह बदल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आज से 80 साल पहले आप अगर पार्ले जी बिस्किट लेकर मार्केट में उतरे थे, तो उस वक्त लोगों का जीवन स्तर अलग था, मार्केट में कंपीटीशन नहीं था और भारतीय बाजार इतना विकसित नहीं था। भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पहले तक भारतीय बाजार प्रॉडक्शन ओरिएंटिड था, यानि जो उत्पादक ने बना दिया, वही उपभोगता को खरीदना भी पड़ेगा। क्योंकि बाजार पर सरकार का इतना कंट्रोल होता था कि बाजार में नए उत्पादकों का आना बेहद मुश्किल था। उस वक्त यह बिस्किट ब्रांड बहुत सफल हुआ लेकिन आज के समय में बेशक इससे बेहतर ब्रांड मार्केट में उपलब्ध हैं।

भारतीय उत्पादकों को चाहिए कि वह पुरानी घिसी-पिटी तकनीक को छोड़कर या तौर-तरीकों को छोड़कर समय-समय पर ग्राहकों को नई और बेहतर सेवाएँ देने का प्रयास करें, और इसके लिए उन्हें अपने अंदर रिस्क लेने की क्षमता को बढ़ाना होगा। भारत के उत्पादक रिस्क लेने से बचने के लिए नो चेंज पॉलिसी को अपनाते हैं और ग्राहकों को पुरानी और स्तरहीन सेवाओं का भोग करने के लिए मजबूर करते हैं।

अगर भारतीय बिजनेस अपनी सेवाओं या उत्पादों में कोई सकारात्मक बदलाव लाते हैं, तो इसका इन कंपनियों को सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशी बाजार में भी फायदा मिलेगा और भारत की अर्थव्यवस्था को काफी बल मिलेगा। इसी बात को देश के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए देश को कड़े निर्णय लेने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘हमारे पास एक ही विकल्प है। या तो हम हताश हो जाएं या जीवन में एक बार मिलने वाले अवसर का फायदा उठाते हुए अपनी वैश्विक पहुंच (व्यापार) को बढ़ाएं’। आगे गोयल ने यह भी कहा कि भारत ने यदि टेलीकम्युनिकेशंस डिवाइस आयात जैसे तरीके से बाकी दुनिया से संपर्क रखने में सक्रियता न दिखाई होती तो यहां टेलीकॉम क्रांति लाना संभव नहीं हो पाता।

ऐसे में सभी भारतीय उद्योगपतियों और उत्पादकों के लिए यह बेहतर अवसर है कि वे अपने उत्पादों और सेवाओं में लोगों की जरूरतों के मुताबिक बदलाव करके उन्हें बेहतर सुविधाएं देने पर फोकस करे। अगर भारतीय ब्राण्ड्स को भी ‘ग्लोबल जाइण्ट’ बनना है तो उन्हें इस तरफ ध्यान देना ही होगा

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