‘लेकिन LAC के बारे में क्या ख्याल है?’ चीन पर टू दी प्वाइंट सवाल दागने वाले PM मोदी पहले प्रधानमंत्री

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PC: TOI

भारत और चीन के ऊपर अभी पूरे दुनिया की नज़र है, कारण है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चेन्नई के मम्म्लापुरम में मुलाक़ात। इन दोनों महाशक्तियों के बीच इस अनौपचारिक मुलाक़ात में कई मुद्दों पर बातचीत होने की उम्मीद थी और बातचीत हुई भी। इनमें से सबसे प्रमुख मुद्दा था भारत और चीन का बॉर्डर-विवाद। इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से लद्दाख क्षेत्र में “लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल” पर स्थिति स्पष्ट करने की बात कही। दोनों नेताओं ने इस अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में LAC पर शांति बनाए रखने के लिए और अधिक ‘विश्वास बढ़ाने के उपाय’ यानि (CBM) लगाने पर चर्चा की।

ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत के प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति से किसी और मुद्दे पर बात न करके सीधे LAC बॉर्डर विवाद पर बात करना उचित समझा है। बता दें कि भारत और चीन के बीच शुरू से ही सीमा-विवाद रहा है। एक तरफ भारत जहां “लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल” को बार्डर मानता है तो वहीं चीन इसे नकार देता है।

तकरीबन 3500 किलोमीटर की साझी सीमा को लेकर दोनों देशों ने 1962 में जंग भी लड़ी लेकिन विवादों का निपटारा ना हो सका। दुर्गम इलाके, कच्चे-पक्के सर्वेक्षण और ब्रिटिश साम्राज्यवादी नक्शे ने इस विवाद को और बढ़ा दिया। भारत और चीन की ओर से बीते 40 सालों में इस विवाद को बातचीत के जरिए हल करने की कई कोशिशें हुईं। हालांकि इन कोशिशों से अब तक कुछ ख़ास सफलता हासिल नहीं हुई।

इसके दो-तीन कारण हैं। भारत और चीन दोनों के नक्शें अलग-अलग हैं। दोनों ही देशों के नक्शे अलग-अलग स्केल के होते हैं। इस पर भी कई समझौते हुए। एक स्केल के नक्शे भी बने। लेकिन दोनों देशों का बॉर्डर मैनेजमेंट अपनी-अपनी सीमाओं को लेकर अलग-अलग बातें कहता है। लिहाज़ा बॉर्डर के बीच के इलाक़े को लेकर दोनों देशों की समझ के बीच फ़र्क़ आ जाता है। फ़र्क़ ये होता है कि हम कहते हैं कि हमारा बॉर्डर यहां तक है वहीं चीन कहता है कि उसका बॉर्डर वहां (भारत के हिस्से) तक है और चीन की इसी गलतफहमी की वजह से आजतक कोई हल नहीं निकाला जा सका है।

भारत शुरू से ही जॉनसन लाइन के तहत अकसाई चिन के हिस्से को अपना मानता है। लेकिन चीन इसे भारत का हिस्सा नहीं मानता है। बता दें कि सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़े एक प्रशासनिक अधिकारी डब्ल्यू. एच. जॉन्सन ने 1865 में एक ‘जॉन्सन लाइन’ बनाने का प्रस्ताव रखा था जिसके तहत अक्साई चिन को जम्मू-कश्मीर में दर्शाया गया था।

हिमालयी क्षेत्र में सीमा विवाद को निपटाने के लिए 1914 में भारत तिब्बत शिमला सम्मेलन बुलाया गया। हालांकि 1950 में तिब्बत पर चीनी नियंत्रण के बाद भारत और चीन के बीच ऐसी साझी सीमा बन गयी जिस पर कोई समझौता नहीं हुआ था। वर्ष 1951 में चीन ने इस क्षेत्र में रोड बनान शुरू कर दिया था। इस सड़क का निर्माण 1951 में शुरू हुआ और 1957 में बनकर तैयार हुई। इस राजमार्ग का निर्माण 1962 के चीन-भारतीय युद्ध के कारणों में से एक था।

भारत की आजादी के बाद 1954 में भारत और चीन के बीच तिब्बत के इलाके में व्यापार और आवाजाही के लिए समझौता हुआ। इस समझौते के बाद भारत ने समझा कि अब सीमा विवाद की कोई अहमियत नहीं है और चीन ने यथास्थिति को स्वीकार कर लिया है।

तब से लगभग छह दशक बीत चुके हैं, लेकिन सीमा का मुद्दा अनसुलझा है। यह दुनिया के सबसे अधिक विवादित सीमा विवादों में से एक बन गया है। 1981 के बाद से भारत और चीन के अधिकारियों ने इस मुद्दे का हल खोजने के लिए कई बार मुलाकात की है। दोनों देश 1993, 1996, 2005, 2012 और 2013 में द्विपक्षीय समझौतों के साथ सीमा पर कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेज़रमेंट (सीबीएम) में लगे हुए हैं। 21 वीं सदी की शुरुआत तक दोनों पक्ष सीमा विवाद को कम करने पर सहमत हुए थे। वर्ष 2003 में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान, दोनों पक्ष परामर्श के लिए विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति पर सहमत हुए जिसका काम सीमा विवाद के निपटारे के लिए एक रूपरेखा बनाना था लेकिन आजतक कोई हल नहीं निकाला जा सका है।

अब इस क्षेत्र में प्रधानमंत्री ने वर्षो से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कदम उठाया है। “लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल” पर सीमा विवाद सुलझने से सबसे ज्यादा फायदा भारत को ही होगा। उत्तर पूर्वी सीमा पर आए दिन दोनों देशों की सेना विवादों में रहती है। और एक सीमा पर सहमति न होने के कारण अक्सर ही चीन की सेना का भारतीय क्षेत्रों में अतिक्रमण की खबरें आती रहती हैं।

ORF की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में बताया था कि 2014 में चीन द्वारा अतिऋमण के 334 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2013 में यह संख्या 411 थी। सिर्फ सीमा पर ही नहीं चीन ने हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है। 1993 में भारत-चीन सीमा क्षेत्रों पर LAC के साथ शांति और व्यवहार्यता पर समझौता, और 1996 का भारत-चीन सीमा क्षेत्र पर CBMs समझौता दोनों में ही, LAC के साथ वायु घुसपैठ को रोकने के प्रावधानों की बात करता है। 1996 के समझौते के अनुच्छेद V में विशेष रूप से कहा गया है कि लड़ाकू विमान LAC के 10 किमी के भीतर उड़ान नहीं भर सकते हैं।

भारत ने भी अब जवाबी कारवाई करना शुरू कर दिया है। अब चीनी सेना के किसी भी अतिक्रमण का जवाब दृढ़ता के साथ दिया जा रहा है। पिछले चार-पांच सालों से भारत सरकार के नेतृत्व का कूटनीतिक और सैन्य नज़रिया देखें तो लगता है कि अब हम चीन के साथ बराबरी की बात कर सकते हैं। बराबरी की बात से ही बॉर्डर मैनेजमेंट और सीमा विवाद सुलझ सकता है। जब तक यह नहीं होता तब तक बार्डर पर तनातनी बनी रहेगी। पीएम मोदी ने इस मुद्दे को बेहतरीन समय पर उठाया है जब भारत विश्व राजनीति में सबसे अहम देश बन गया है तथा वैश्विक स्तर पर चीन को लगातार हार का सामना करना पड़ा है, चाहे वह कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना हो या पाकिस्तान का साथ देना हो। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने शानदार कदम उठाते हुए इस अनौपचारिक बैठक में सीमा विवाद सुलझाने का मुद्दा उठाया जिससे चीन अभी न तो विरोध कर सकता और न ही मना कर सकता  है। अब यह देखने वाली बात यह होगी कि पीएम मोदी के इस पहल के बाद शी जिनपिंग की क्या प्रतिक्रिया आती है।

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