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पीएम मोदी ने अपनी ‘रूसी यॉर्कर’ से पश्चिमी देशों को क्लीन बोल्ड कर दिया

भारतीय कूटनीति को समझने के लिए अमेरिका अभी 'बच्चा' है!

Prashant Srivastava द्वारा Prashant Srivastava
3 October 2022
in विश्व
modi putin
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कहते हैं कि उगते हुए सूरज को दुनिया सलाम ठोकती है, यह कहावत वर्तमान में भारत के लिए सटीक बैठती है, भारत अपने विकास के पथ पर कुछ इस प्रकार अग्रसर है कि मानो वह सूरज सा चमक रहा हो जिससे नज़रें मिलाने की हिम्मत विश्व के किसी भी देश में न हो। 1947 में आज़ाद हुआ भारत जिस कुशलता से विकास के पथ पर आगे बढ़ा है उसकी सराहना विश्व के साथ-साथ वो आईएमएफ भी कर रहा है जिसने कभी भुगतान संकट में फंसे भारत को अपनी शर्तों पर ऋण दिया था। अमेरिका के पालतू इस संगठन ने बड़ी ही कड़ी शर्तों के साथ भारत को ऋण दिया था।

अमेरिका भी अब भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहता

एक वह दिन था जब भारत का उपहास उड़ाया गया था और एक आज का दिन है जहां भारत अब अन्य देशों की आर्थिक मदद करता है, इतना ही नहीं भारत के उपहास उड़ाने का एक भी अवसर नहीं छोड़ने वाला अमेरिका भी अब भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है। स्वयं को सूपरपावर कहने वाला अमेरिका तो बस एक नाम है, ब्रिटेन, फ़्रान्स, जर्मनी इत्यादि सो कॉल्ड सिविलायज़्ड देश भी भारत के साथ एक अच्छे रिश्ते को चाहते हैं। एक वक्त हुआ करता था जब ये देश भारत को संपेरों और गंवारों का देश कहकर संबोधित किया करते थे। किंतु आज भारत ने अपने  अथक परिश्रम और दूरदर्शितापूर्ण नीतियों वाले नेताओं के कारण समस्त विश्व को ना सिर्फ चुप कराया है अपितु स्वयं के लिए उनकी धारणा को भी बदल दिया। वस्तुतः किसी भी देश को अपनी पूर्व की छवि से निकलने के लिए एक करिश्माई एवं दूरदर्शितापूर्ण नेता की ज़रूरत पड़ती है, यूं तो भारत में ऐसे दूरदर्शितापूर्ण नेता बहुत हुए हैं किंतु दूरदर्शितापूर्ण नीति के साथ-साथ हज़िरजवाबी नेता बहुत कम देखने को मिलते हैं। वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी परंपरा से आते हैं।

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नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद तो भारत ने विकास की जो राह पकड़ी है वह निरंतर बढ़ती ही जा रही है। साथ ही भारत की कूटनीतिक शक्ति में भी अपार वृद्धि हुई है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखने को मिला, जब सम्पूर्ण विश्व भारत पर रूस के विरुद्ध बोलने का दबाव बना रहा था तब भारत ने सर्वप्रथम अपने हितों को सर्वोपरि रखा, परिणामस्वरूप भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने वही वक्तव्य दिया जो राष्ट्र के हित में था, महान लीडर्शिप यही होती है कि आप अपने हितों को भी साध लें और किसी को अपना शत्रु भी ना बनाएं।

और पढ़ें- पोलैंड ने रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने की भारत की क्षमता पर दिखाया भरोसा

यूक्रेन के शहरों को रूस का घोषित किया गया

हाल ही में रूस  के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के कब्जाए गए शहरों को रूस में शामिल कर दिया है। इस ऐलान के लिए एक समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें औपचारिक तौर पर पुतिन ने यूक्रेन के शहरों और स्थानों को रूस का घोषित किया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने क्रैमलिन में आयोजित एक समारोह में डोनेट्स्क, लुहान्स्क, जापोरिजिया, खेरसॉन को रूसी क्षेत्र में शामिल किया। वस्तुतः रूस द्वारा उठाए गए इस कदम से पश्चिमी देश एवं उसके दलाल मीडिया ने भारत के ऊपर फिर से दबाव बनाने की भरसक कोशिश की किंतु पीएम मोदी के नेतृत्व में चट्टान के समान खड़े भारत ने अपने उसी वक्तव्य को दोहराया की भारत शांति चाहता है युद्ध नहीं।

भारत ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के उस एक प्रस्ताव पर भाग नहीं लिया, जिसने मॉस्को के “अवैध जनमतसंग्रह” की निंदा की और चार यूक्रेनी क्षेत्रों के अपने कब्जे को अमान्य घोषित कर दिया।UNSC के प्रस्ताव को रूस ने वीटो कर दिया था।

यूएनएससी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सका क्योंकि रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य होने के नाते इसे वीटो कर दिया।  इस प्रस्ताव को परिषद के 15 सदस्यों में से 10 का समर्थन मिला, जबकि चीन, गैबॉन, भारत और ब्राजील ने मतदान में भाग नहीं लिया।

देखने वाली बात है कि सो कॉल्ड ये सभ्य देश छोटे बच्चे की भांति किसी वक्तव्य का कोई भी अर्थ निकालते जा रहा हैं। आपको याद तो होगा ही कि हाल ही में पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात एससीओ बैठक में हुई थी। इस मुलाकात में दोनों ही देशों के शीर्ष नेताओं के बीच यूक्रेन युद्ध समेत कई अहम मुद्दों पर बात हुई थी।

और पढ़ें- “पश्चिम ने भारत को लूटा” रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका को लताड़ दिया

अमेरिका का बचपना

पुतिन और पीएम मोदी के बीच युक्रेन मामले पर हुई बात को लेकर बाइडेन प्रशासन की ओर से बयान जारी किया गया है। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलेविन (Jake Sullivan) ने मंगलवार को कहा कि पुतिन के साथ पीएम मोदी की बातचीत कि ‘यह युद्ध का समय नहीं है।’ पुतिन के साथ हुई पीएम मोदी की बैठक में यह एक सैद्धांतिक बयान था, जिसे वह सही मानते हैं। अमेरिका भारत के इस बयान का स्वागत करता है। वैसे देखें तो पीएम मोदी ने यहां पर कोई नयी बात नहीं कही थी, किंतु अमेरिका का बचपना कहें या उसकी नासमझी कि वह इतना बहक गया कि उसने कहां की बात को कहां ले जाकर जोड़ा।

अंततः पूरी पश्चिमी मीडिया द्वारा भी इस बयान को ऐसे पेश किया गया  जैसे पीएम मोदी रूसी राष्ट्रपति को डांट कर बोल रहे हों, हाल ही में हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के 77वें सत्र में दूसरे देशों द्वारा भारत की बहुत अधिक सराहना की जा रही है। भारत की आर्थिक और विदेश नीति से प्रभावित होकर दुनिया के कई विकासशील और विकसित देशों ने उसकी पीठ थपथपायी है। साथ ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी बहुत प्रशंसा की गयी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की से लेकर रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित अन्य कई नेताओं ने पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भारत की नीतियों की बहुत प्रशंसा की है।

और पढ़ें- G7, रूस और ईराक, तेल को लेकर भारत के समक्ष प्रार्थना क्यों कर रहे हैं?

मोदी की कुशल कूटनीति

यह पीएम मोदी की कुशल कूटनीति और भारत का बढ़ता वर्चस्व ही है कि ईरान ने ओएनजीसी विदेश लिमिटेड और उसके भागीदारों को फरजाद-बी गैस क्षेत्र को विकसित करने में 30% हिस्सेदारी की पेशकश की है, जिसे भारत ने फारस की खाड़ी में खोजा था। 3,500 वर्ग किलोमीटर फ़ारसी अपतटीय ब्लॉक में, ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने 2008 में एक विशाल गैस क्षेत्र की खोज की थी। इसने अप्रैल 2011 में एक मास्टर डेवलपमेंट प्लान (एमडीपी) प्रस्तुत किया था, जिसे फरजाद-बी के नाम से जाना जाता है। इसे बाद में उत्पादन में लाया गया लेकिन ईरान पर उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के परिणामस्वरूप बातचीत बंद हो गई। चूंकि अमेरिका ईरान की इस महत्वकांक्षा का शुरुआत से विरोधी था तो उसी के परिणामस्वरूप अमेरिका ने एक के बाद एक प्रतिबंध लगाए।

इन प्रतिबंधों में सबसे ज़्यादा प्रभावशाली काटसा था। काटसा की बात करें तो अमेरिका द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरोध हेतु बनाए गए दंडात्मक अधिनियम CAATSA (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) को वर्ष 2018 में लागू किया गया था, इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य दंडनीय उपायों के माध्यम से ईरान, रूस और उत्तर कोरिया की आक्रामकता का सामना करना था। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अधिनियम प्राथमिक रूप से रूसी हितों जैसे कि तेल और गैस उद्योग, रक्षा क्षेत्र और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित है। किंतु भारत यहां भी अपने हितों को साधने के भरपूर प्रयास में हैं अब यदि भारत ऐसा करने में कामयाब हो जाता है तो वह एकमात्र  ऐसा देश होगा जो अमेरिका के आँखों में आँखें डालकर उन देशों से व्यापार करेगा जिन पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया हुआ है। इससे भारत की विश्व पटल पर साख तो बढ़ेगी ही साथ में अन्य देश भी भारत के साथ रिश्तों को अच्छा बनना चाहेंगे । वस्तुतः यह नये भारत का नया क़िस्सा है जो अभी कहानी बनने के लिए बेताब है।

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