अमेरिका ने दुत्कारा तो फिर से चीन की गोद में पाकिस्तान, श्रीलंका बनेगा अगला ‘युद्ध क्षेत्र’

एक बार फिर से चीन ने पाकिस्तान की आर्थिक सहायता की बात की है तो वहीं अमेरिका ने पाकिस्तान को दुलत्ती दे दी है। वहीं, दूसरी तरफ चीन ने श्रीलंका को भी दोबारा से आर्थिक सहायता देने की बात की है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अब श्रीलंका 'युद्ध क्षेत्र' बनने जा रहा है?

चीन पाकिस्तान

Source- TFI

नक़ल करने के लिए अकल का होना बहुत जरुरी है। भारत अपने पड़ोसियों के लिए हर मुश्किल परिस्थिति में खड़ा रहा है। भारत द्वारा पड़ोसियों को दिए गए रियायत और लगातार की जा रही उनकी मदद के कारण ही कई पड़ोसी देश आज भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं। भारत निस्वार्थ भाव से अपने पड़ोसियों के साथ खड़ा रहता है लेकिन जब बात अमेरिका और चीन जैसे देशों की आती है, तो वे छोटे राष्ट्रों की मदद करने के बजाए उन्हें एक तरह से अपने कब्जे में रखने का स्वप्न बुनने लगते हैं। पाकिस्तान, जो पहले ही कंगाल हो चुका है और कर्ज लेकर जैसे तैसे अपनी स्थिति को सही करने का प्रयास कर रहा है, पिछले कुछ महीने में इस पर अपनी पकड़ को लेकर चीन और अमेरिका, दोनों में भिड़ंत देखने को मिल चुकी है।

पाकिस्तान तो पहले से ही चीन का पिछलग्गू रहा है लेकिन अमेरिका से उसका मोह भंग नहीं हुआ था। हाल ही में जब अमेरिका ने उसकी सहायता की तो चीन ने मुंह फुला लिया और पाकिस्तान की मदद करने से पीछे हट गया और अब, जब अमेरिका ने पाकिस्तान से मुंह मोड़ा तो चीन ने फिर से पाकिस्तान को अपनी जेब में डाल लिया। कुछ ऐसी ही स्थिति अब दक्षिण एशियाई देश श्रीलंका में भी देखने को मिल रही है। ऐसा कहा जाता है कि 20वीं सदी पश्चिमी देशों की थी और 21वीं सदी अब एशियाई देशों की है और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पाकिस्तान के बाद अब श्रीलंका, 21वीं सदी में टॉप वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए अगला मोर्चा होने वाला है।

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समझिए पूरा मामला

जैसा सभी जानते हैं कि पाकिस्तान मौजूदा समय में नकदी की तंगी, बाढ़ और महंगाई की मार से परेशान है। लेकिन अब ऐसा लगता है मानो एक दूसरा देश इस पर मेहरबान हो गया है, जिससे तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की मुश्किलों का हल होने वाला है। चीन ने अभी कुछ दिनों पहले ही अपने ‘बेस्ट फ्रेंड’ पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देने का ऐलान किया था। ज्ञात हो कि चीन, पाकिस्तान को 9 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज देने के लिए राज़ी हो गया है। साथ ही यह कपटी राष्ट्र पाकिस्तान के साथ अपने भविष्य को लेकर काफी ज्यादा उत्साहित दिखाई दे रहा हैं। शी जिनपिंग ने स्वयं शहबाज शरीफ से ऐसा कहा है कि चिंता न करें क्योंकि चीन उन्हें बिलकुल भी निराश नहीं करेगा।

वहीं, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजान ने कहा, “चीन ने पाकिस्तान को उसकी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने में सहायता करने की पूरी कोशिश की है। हम ऐसा करते रहे हैं और हम ऐसा करना जारी भी रखेंगे।” चीन से मदद मिलना जहां पाकिस्तान के लिए खुशी की बात है वही पाकिस्तान के लिए एक बुरी खबर भी है। अमेरिका और पाकिस्तान जो एक बार फिर से एक दूसरे के करीब आने लगे थे, अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दोनों देशों ने एक-दूसरे से मुंह फेर लिया है। दोनों देशो के संबंधों के बीच पड़ती हुई दरार साफ नज़र आ रही है।

दरअसल, जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति एक अलग ही झुकाव देखने को मिला था। अमेरिका ने पाकिस्तान को भिन्न-भिन्न तरीके से सहायता प्रदान कर उसे लालच में फंसाने का प्रयास किया फिर चाहे वो वित्तीय मदद हो या फिर हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराना हो। लेकिन उसके पीछे का कारण भी बिल्कुल साफ था क्योंकि बाइडन के लिए एक इस्लामिक राष्ट्र का समर्थन करने से उनके मुस्लिम वोट सुरक्षित हो जाते और साथ ही अमेरिका के चीन और भारत विरोधी अभियान में साथ देने के लिए उसे एक अच्छा पार्टनर भी मिल जाता। लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

यहां हम अमेरिका के भारत विरोधी अभियान को इसलिए संदर्भित कर रहे हैं क्योंकि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को समर्थन देने के पीछे भारत भी एक बड़ा कारण रहा था। ज्ञात हो कि रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की तमाम कोशिशों और धमकियों को नजरअंदाज करते हुए रूस का समर्थन किया और अमेरिका के प्रभाव में नहीं आया। अब यहीं से अमेरिका के पेट में दर्द हुआ और अमेरिका पहुंच गया पाकिस्तान का समर्थन करने और यह समर्थन देखकर चीन ने पाकिस्तान से दूरी बना ली थी। लेकिन अब चीन और पाकिस्तान में फिस से पैचअप हो गया है और इसका असर अमेरिका द्वारा लिए गए इस एक्शन में भी झलक रहा है।

क्या श्रीलंका बनेगा अगला ‘युद्ध क्षेत्र’ ? 

आपको बता दें कि अभी हाल ही में अमेरिका ने वर्ष 2022 के लिए अपने सुरक्षा सहयोगी देशों की एक लिस्ट जारी की है। लेकिन इन सुरक्षा सहयोगी देशों की लिस्ट से पाकिस्तान और सऊदी अरब का नाम गायब है। जो देश कभी एक-दूसरे का हाथ थामें दिखाई देते है थे, आज न जाने क्यों उनकी दोस्ती का ‘द एंड’ हो गया है जबकि इस सूची में आठवें नंबर पर भारत का नाम है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका, रूस नहीं बल्कि चीन को अपनी सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती के रूप में देखता है। अब इन सब के बीच चीन द्वारा पाकिस्तान की सहायता के लिए कदम उठाने से यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका ने जैसे ही पाकिस्तान को लात मारी वैसे ही चीन नें उसे लपक कर फिर से अपनी जेब में कर लिया।

ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान को वित्तीय सहायता देकर अभी चीन का पेट नहीं भरा है। अब चीन एक बार फिर से श्रीलंका का ‘शिकार’ करने की ओर बढ़ रहा है। रिपोर्ट्स की माने तो चीन, श्रीलंका पर फिर से अपना प्रभुत्व स्थापित करने की ओर बढ़ गया है यानी यह धूर्त राष्ट्र श्रीलंका की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाता दिख रहा है। लेकिन आपको याद होगा कि जब श्रीलंका के हालात ठीक नहीं थे और उस मुश्किल परिस्थिति में जब कोई भी देश श्रीलंका की मदद के लिए आगे नहीं आए थे तब भारत ने श्रीलंका की काफी सहायता की थी। लेकिन अब अमेरिका भी इस बहती गंगा में अपने हाथ धोने की पूरी तैयारी में है। ज्ञात हो कि इस वर्ष सितंबर तक अमेरिका ने श्रीलंका को 240 मिलियन डॉलर से अधिक की सहायता दी है। इसके अलावा अमेरिका, श्रीलंका के साथ वित्तीय अनुबंध पर हस्ताक्षर भी कर रहा है। यह कुछ और नहीं बल्कि एक प्रकार का कर्ज-जाल ही है।

इससे एक बात तो साफ है कि भारत अपने पड़ोसियों की मदद करने से कभी पीछे नहीं हटता और बदले में उनसे कुछ ज्यादा उम्मीद भी नहीं रखता लेकिन नैतिकता तो यही है कि ‘एहसान फरामोश’ बनने की बजाए ये देश भारत के साथ खड़े रहे। श्रीलंका को लेकर भी भारत की मंशा यही है। दूसरी ओर चीन के कारण ही श्रीलंका की आज यह हालत हुई है, लेकिन अब चीन भी चाहता है कि श्रीलंका का झुकाव उसकी ओर रहे। वहीं, श्रीलंका को लेकर अमेरिका सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम से यह स्पष्ट हो रहा है कि अमेरिका भी यही चाहता है कि श्रीलंका उसके पाले में रहे। ऐसे में यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि श्रीलंका को ये तीनों ही देश अपनी-अपनी मुट्ठी में लाने की पुरजोर कोशिश में जुटे हुए है और दूसरे देशों के लिए जो युद्धक्षेत्र कभी पाकिस्तान बनता था, आज श्रीलंका बनता दिख रहा है।

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