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“पहले BBC की डॉक्यूमेंट्री फिर FPO से बिल्कुल पहले अडानी के विरुद्ध रिपोर्ट”, भारत-विरोधी टूलकिट की क्रोनोलॉजी को समझिए

कुछ लोगों को भारत के अडानी का विश्व का सबसे बड़ा रईस बनना भा नहीं रहा था!

Devesh Sharma द्वारा Devesh Sharma
30 January 2023
in व्यवसाय
हिंडनबर्ग रिपोर्ट

SOURCE TFI

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25 जनवरी को अडानी ग्रुप की सभी कंपनियों को लेकर अमेरिकी रिसर्च फर्म ‘हिंडनबर्ग’ ने एक रिपोर्ट (Hindenburg report) जारी की थी जिसमें अडानी ग्रुप पर स्टॉक मैनिपुलेशन और अकाउंटिंग फ्रॉड में शामिल होने के आरोप लगाए गए। यही नहीं रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इसे दो साल की रिसर्च के बाद और अडानी ग्रुप में काम कर चुके अधिकारियों से बातचीत करने के बाद तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद अडानी ग्रुप को न केवल 20 अरब डॉलर का नुकसान हुआ बल्कि ‘फोर्ब्स बिलेनियर्स इंडेक्स’ के अनुसार अडानी ग्रुप के मालिक गौतम अडानी दुनियाभर के अमीरों की श्रेणी में चौथे स्थान से खिसककर सातवें स्थान पर पहुंच गए।

और पढ़ें- 1997 में किडनैप हुए, 2008 में 15 फुट की दूरी से मौत को देखा, गौतम अडानी की कहानी

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अडानी ग्रुप का प्रतिउत्तर

हालांकि अडानी ग्रुप की ओर से इस रिपोर्ट के प्रतिउत्तर में 413 पन्नों की एक रिपोर्ट भी जारी कर दी गई है, जिसमें ग्रुप ने कहा है कि हिंडनबर्ग (Hindenburg) द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप ‘‘झूठ के सिवाए कुछ नहीं है’ साथ ही यह ‘‘भारत, उसकी संस्थाओं के विकास की कहानी पर सुनियोजित हमला है’। लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद हिंडनबर्ग शब्द लोगों की जुबान पर चढ़ चुका है जिसे अर्थव्यवस्था की समझ है वह भी हिंडनबर्ग का हवाला दे रहा है और जिसे अर्थव्यवस्था की रत्तीभर समझ नहीं वह भी हिंडनबर्ग-हिंडनबर्ग करने में लगा हुआ है।

इस लेख में हम जानेंगे कि आखिरकार हिंडनबर्ग क्या है और इस रिपोर्ट को जारी करने के पीछे हिंडनबर्ग का क्या उद्देश्य है?  

दरअसल, हिंडनबर्ग अमेरिका की इनवेस्टमेंट रिसर्च कंपनी है। 2017 में इसे ‘नाथन एंडरसन’ नाम के एक अमेरिकी व्यक्ति ने स्थापित किया था। इस कंपनी का मुख्य काम शेयर मार्केट, इक्विटी, क्रेडिट और डेरिवेटिव्स पर रिसर्च करना है यानी कि शेयर मार्केट में कंपनियां पैसों की हेरा-फेरी तो नहीं कर रही हैं या फिर बड़ी कंपनियां अपने फायदे के लिए अकाउंट मिसमैनेजमेंट तो नहीं कर रही हैं। लेकिन इनवेस्टमेंट रिसर्च करने के साथ-साथ यह एक शार्ट-शेलर कंपनी भी है जोकि शेयर मार्केट में अलग-अलग कंपनियों के शेयर खरीदती और बेचती है और उससे मुनाफा कमाती है।

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क्या है रिपोर्ट के पीछे हिंडनबर्ग का उद्देश्य?

हिंडनबर्ग (Hindenburg report) ने अडानी ग्रुप को लेकर यह रिपोर्ट जारी क्यों की इसे समझने के लिए सबसे पहले ‘लॉन्ग पोजिशन’ और ‘शॉर्ट पोजिशन’ जैसे शब्दों को समझना बेहद जरूरी है। दरअसल, शेयर मार्केट में कंपनी के शेयरों को दो तरीके से खरीदा व बेचा जाता है जिसमें पहला है ‘लॉन्ग पोजिशन’ और दूसरा है ‘शॉर्ट पोजिशन’। उदाहरण के लिए किसी कंपनी या व्यक्ति ने शेयर मार्केट में 100 रुपये में किसी कंपनी के शेयर खरीदे और 150 रुपये में बेच दिए। ऐसे में उसे 50 रुपये का लाभ हुआ। इस तरह इसे लॉन्ग पोजिशन कहते हैं।

दूसरी तरफ यदि कोई व्यक्ति एक कंपनी से 100 रुपये की कीमत पर 10 शेयर एक महीने के लिए उधार लेकर बेच देता है और उसे भरोसा है कि शेयर की कीमत 100 से 80 रुपये हो जाएगी। ऐसे में जब शेयर की कीमत 80 रुपये पर पहुंच जाएगी तो वह 10 शेयर खरीद कर उस कंपनी को वापस कर देगा और 20 रुपये प्रति शेयर लाभ कमा लेगा। इस प्रक्रिया को ‘शॉर्ट पोजिशन’ या शॉर्ट सेलिंग कहते हैं।

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रिपोर्ट छापने का उद्देश्य

‘लांग और शॉर्ट पोजिशन’ के बाद अब बात आती है हिंडनबर्ग के रिपोर्ट (Hindenburg report) छापने के उद्देश्य पर। जैसा कि लेख की शुरुआत में बताया गया है कि हिंडनबर्ग इनवेस्टमेंट रिसर्च करने के साथ-साथ शेयर मार्केट में भी इनवेस्टमेंट करती है। ऐसे में इस बात पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि हिंडनबर्ग ने ‘शार्ट सेलिंग’ कर मुनाफा कमाने के लिए इस रिपोर्ट का भरपूर सहारा लिया होगा। यही नहीं हिंडनबर्ग की इस रिपोर्ट के उद्देश्य पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि इसे ठीक उसी समय पर जारी किया गया जब अडानी ग्रुप शेयर बाजार में अपना एफपीओ लेकर कर आया।

हिंडनबर्ग ने अडानी ग्रुप को लेकर अपनी रिपोर्ट में 3 बड़े आरोप लगाए हैं, जिसमें पहला है शेयर बाजार में समान क्षेत्र की कंपनियों के मुकाबले अडानी ग्रुप के शेयरों की कीमत। असल में हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट (Hindenburg report) में कहा है कि अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयर की कीमत उसी सेक्टर में बिजनेस करने वाली दूसरी कंपनियों की तुलना में 85% तक ज्यादा है।ध्यान देना होगा कि शेयर की कीमत उस कंपनी को होने वाले लाभ से तय की जाती है। बाजार के द्वारा अनुमान लगाया जाता है कि कंपनी को जो लाभ होगा उसकी तुलना में उस कंपनी के शेयर का मूल्य कितना अधिक होगा। इसे प्राइज अर्निंग रेश्यो कहा जाता है और अडानी ग्रुप की कंपनियों का प्राइज अर्निंग रेश्यो दूसरी कंपनियों से बहुत अधिक है।

यही नहीं हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि अडानी ग्रुप ने शेयर बाजार में हेराफेरी कर अपने शेयरों की कीमत बढ़वाई है। हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में तीसरा सबसे बड़ा आरोप यह लगाया है कि अडानी ग्रुप पर 2.20 लाख करोड़ से ज्यादा का भारी कर्ज है।

और पढ़ें- NDTV के भविष्य को लेकर गौतम अडानी ने बड़ी बात कही है

शेयरों की कीमत पर असर

लेकिन हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कुछ छिपाना और कुछ बताना वाली नीति को अपनाया है यानी उसने अडानी ग्रुप के बारे में उन्हीं चीजों को बताया है जो उसके हित में हैं और जो शेयर बाजार में अडानी ग्रुप के शेयरों की कीमत को घटाने का काम करे।

इस रिपोर्ट से दुनिया के सबसे अमीरों की सूची में अडानी की रैंकिंग में भी गिरावट आई है। ऐसे में आवश्यक है कि इस घटना के व्यापक तस्वीर को देखना होगा। अडानी पर हमला करने से बहुत से समूहों को कई गुना लाभ होता है। अडानी साम्राज्य सोलर मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, इंडस्ट्रियल लैंड, डिफेंस, एयरोस्पेस, फ्रूट्स, डेटा सेंटर्स, रोड, रेल, रियल एस्टेट लेंडिंग, कोल और कई अन्य क्षेत्रों में मौजूद है ।

अब जब ग्रुप के अंतर्गत इतना कुछ होगा तो इसके विरोधक भी होंगे। इनमें प्रतिद्वंद्वी व्यापारिक समूह, विपक्षी दल, औद्योगीकरण के खिलाफ वैचारिक रूप से मीडिया समूह शामिल हैं। फिर भी, यह समझना कठिन है कि विदेशी फर्मों को “अडानी का पर्दाफाश” करने में क्यों दिलचस्पी होगी।

दरअसल, भारत वैश्विक मंच पर एक ताकत बन गया है। यह यूक्रेन-रूस संकट में भी कई बार दिखा है। भारत अपनी जमीन पर खड़ा रहा और सम्मान अर्जित किया। हां, हमारी हार्ड पावर इसके लिए जिम्मेदार है लेकिन मजबूत वित्तीय आधार के बिना हार्ड पावर का उपयोग नहीं हो सकता है। यहीं पर पिछले कुछ सालों में अडानी ग्रुप ने अपना प्रभाव जमाया है। गौतम अडानी ने अडानी ग्रुप के वैश्विक विस्तार मिशन को आगे बढ़ाया।

और पढ़ें- भारतीय अरबपति गौतम अडानी बने दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स

वैश्विक रूप से आगे बढ़ रहा है अडानी ग्रुप

अडानी ग्रुप पिछले 12 साल से ऑस्ट्रेलिया में मौजूद है। ग्रुप ने कई विरोधों के बाद भी कारमाइकल कोयला खदान का विकास किया। 2017 में, अडानी ने चीनी बेल्ट एंड रोड पहल में सेंधमारी की। उस वर्ष, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (लिमिटेड) ने कुआलालंपुर से 50 किमी दूर स्थित कैरी द्वीप में कंटेनरों को संभालने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। यह सभी अपेक्षाओं के विपरीत था इससे भी अधिक, यह मलेशिया में भारत की स्थिति को बढ़ावा देने वाला था।

फिर श्रीलंका में चीनी उपस्थिति की बारी थी। अडानी समूह को कोलंबो बंदरगाह पर एक पश्चिमी कंटेनर टर्मिनल के विकास और संचालन का ठेका मिला है। कुछ महीनों के भीतर, समूह ने द्वीप राष्ट्र में दो पवन ऊर्जा परियोजनाओं को समाप्त कर दिया। अडानी की उपस्थिति से बांग्लादेश के बिजली क्षेत्र को भी बढ़ावा मिल रहा है।

एशिया के बाहर भी अडानी ग्रुप भारत की मौजूदगी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. पिछले साल, अडानी समूह ने इज़राइल के हाइफा बंदरगाह में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए 1.18 अरब डॉलर खर्च किए। अडानी अब इज़राइल में चीनी राज्य के स्वामित्व वाले शंघाई इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा में है। राष्ट्रवाद के संदर्भ में यह चीनी राज्य के व्यापारिक हितों पर सीधा हमला है। तंजानिया में, अडानी ने पूर्ववर्ती प्रीमियम बीआरआई परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके चीन को भारी झटका दिया। देखना होगा कि समूह तेजी से यूरोप और यहां तक ​​कि अजरबैजान जैसे भौगोलिक क्षेत्रों में अपने पैर फैला रहा है ।

हां, यह सच है कि अडानी से पहले टाटा, रिलायंस और कई अन्य कंपनियों ने भी अन्य देशों में विस्तार किया। लेकिन उनके विस्तार के बीच उल्लेखनीय अंतर हैं। एक तो ये कि इन औद्योगिक समूहों ने भारत के बढ़ते दबदबे के समानांतर विस्तार नहीं किया। दूसरा अंतर यह है कि अडानी को पीएम मोदी का करीबी माना जाता है, जो सच न भी हो तो भी विदेशी ताकतों को झटका देना तय है।

और पढ़ें- पारिवारिक कलह से बचने के लिए अंबानी की तर्ज पर अडानी कर रहे हैं बंटवारा!

अडानी ग्रुप और उसके विरोधी

ऐस में वैश्विक रूप से अडानी ग्रुप का बढ़ना भला कैसे रास आ सकता है उसके विरोधियों को। तब तो और नहीं जब अडानी ग्रुप भारत की पहचान को दिनोदिन और सुदृढ़ करने में आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी दुनिया में जिस गति से भारत विरोधी नैरेटिव को फैलाया जा रहा है उसमें काफी वृद्धि हुई है। एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है कि कैसे ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी बीबीसी (BBC) ने अपनी डॉक्टूमेंट्री के माध्यम से पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने की कोशिश की और अब उसके बाद अडानी ग्रुप से जुड़ी यह घटना।

इन सभी का एक साथ आना संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछ इन विरोधियों का अपना लाभ तो है ही साथ ही साथ भारत की छवि खराब करने का षड्यंत्र भी है। हिंडनबर्ग जैसे रिपोर्ट भी ऐसे ही षड्यंत्र रच रहे हैं।

यदि हिंडनबर्ग के द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के बारे में संक्षेप में कहा जाए तो इसका उद्देश्य अडानी ग्रुप को टारगेट करना और शेयर बाजार में शॉर्ट सेलिंग का लाभ उठाकर पैसा बनाना है। हिंडनबर्ग ने बाजार की भावनाओं को समझते हुए ठीक उसी समय पर रिपोर्ट जारी किया है जब अडानी ग्रुप विस्तार करने के लिए एफपीओ लेकर आया।

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