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सेर सिवराज है… वो महाकवि जिन्होंने ठुकराया औरंगजेब का प्रस्ताव, भूषण ने अपनी रचनाओं से छत्रसाल और छत्रपति को कर दिया अमर

भूषण ने अपनी रचनाओं में औरंगजेब द्वारा मंदिर तोड़े जाने की आलोचना की है

architsingh द्वारा architsingh
9 November 2024
in इतिहास, संस्कृति
सेर सिवराज है… वो महाकवि जिन्होंने ठुकराया औरंगजेब का प्रस्ताव, भूषण ने अपनी रचनाओं से छत्रसाल और छत्रपति को कर दिया अमर
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मध्यकाल के उत्तरार्द्ध में जहाँ एक ओर निरंकुश केंद्रीय मुगल सत्ता अपनी कुनीतियों से छोटे–बड़े देशी रजवाड़ों को विवश कर भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीयता का भाव और हमारे अतीत के प्रति गौरव के भाव का ह्रास कर रही थी, जब कुछ देशी राज्य मुगलों की शर्तों को मानते हुए अपना राज्य चला रहे थे अर्थात सशर्त स्वतंत्रता के साथ सत्ता की विलासिता और अनैतिकता का भोग कर रहे थे। उसी दौर में शिवाजी और छत्रसाल जैसे वीर योद्धा विदेशी सत्ता से निरन्तर टकराते हुए वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हृदय में राष्ट्र प्रेम का तूफान लेकर कंटकों से भरे ध्येय मार्ग पर चल रहे थे।

इसी प्रकार मध्यकाल का यह दौर साहित्य, कला एवं संगीत की स्वतंत्रता का भी ह्रास कर रहा था। इस समय तक आते–आते अनेक कवि अपनी प्रतिभा का प्रयोग महज मुगल शासकों को खुश करने के लिए करते थे, जहाँ साहित्य का कार्य राष्ट्र में व्याप्त इन विषम परिस्थितियों को दूर करने के लिए जनमानस को जागरूक करने का होना चाहिए था किन्तु यह सिर्फ कवियों की आजीविका बल्कि यों कहें कि विलासिता का साधन बन गया था।

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मध्यकाल के इस दौर को हिंदी साहित्य में ‘रीतिकाल‘ के नाम से जाना जाता है। ऐसा नहीं है कि रीतिकाल के सभी कवियों में राष्ट्रीयता–बोध का लोप हो चुका था बल्कि अनेक ऐसे कवि थे जो भारतीय संस्कृति, अतीत के प्रति गौरव का भाव, राष्ट्रीय चेतना जैसे तत्वों को अपनी कविता के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहे थे। महाकवि भूषण का नाम भी इसी फेहरिस्त में आता है, जिन्होंने अपनी कविता को बेचने के बजाय उसे राष्ट्रीयता–बोध की अभिव्यक्ति बनाया।  

हिंदी साहित्य में वीर रस के कवियों की श्रेणी में भूषण का नाम अग्रगण्य है। भूषण ने अपने समय के ही स्वातंत्र्य–चेता दो नायकों वीर शिवाजी तथा छत्रसाल को आदर्श व्यक्तित्व मानकर, इन्हें ही अपनी कविता का आधार बनाया। भूषण की कविता में राष्ट्रीय चेतना, भारतीय संस्कृति के तत्वों पर चर्चा करने से पहले उनके प्रारंभिक जीवन पर चर्चा कर लेना उचित रहेगा।

संवत् 1670 वि. में कानपुर के तिकवांपुर नामक गाँव में भूषण का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रत्नाकार त्रिपाठी था। कहा जाता है कि हिंदी साहित्य के आचार्य कवि मतिराम और चिंतामणि इनके भाई थे। हालाँकि, इनके बचपन का क्या नाम था इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं प्राप्त होती है, ‘भूषण‘ नाम इन्हें चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्र द्वारा दिया गया था। इनकी ही रचना ‘शिवराज भूषण‘ में इस तथ्य की जानकारी मिलती है–

“कुल सुलंकि चित्रकूट–पति साहस सील–समुद्र।

कवि भूषण पदवी दई, हृदय राम सुत रुद्र॥“

भूषण शिवाजी के आश्रम क्यों गए इस सम्बंध में दो किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक दिन भाभी का ताना सुनकर इन्होंने घर ही छोड़ दिया। घर छोड़कर ये अनेक आश्रमों में गए और वहाँ शरण ली। ऐसे ही एक दिन ये शिवाजी के आश्रम में पहुँचे और वहाँ इनका मन ऐसा लगा कि ये अपने अंतिम समय तक वहीं रहे।

इसके अतिरिक्त एक और लोकमत के अनुसार एक बार भूषण अपने भाई के साथ दिल्ली दरबार में पहुंचे थे। वहाँ उन्हें और उनके भाई को मुगलों द्वारा निरादरित किया गया। मुगलों के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर भूषण ने निर्णय किया कि वे उन लोगों की महिमा का बखान करेंगे जो सच में वीर हैं। यही सोचकर वे शिवाजी महाराज के दरबार पहुंचे और उन्हें देखकर इतना प्रभावित हुए कि उन्हें ही असली राजा मान लिया।

भूषण के साहित्य की बात करें तो इनकी ‘शिवराज भूषण‘, ‘शिवाबावनी‘, ‘छत्रशाल दशक‘ आदि प्रमुख रचनाएं हैं। चूँकि इनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति के तत्वों, राष्ट्रीय चेतना के साथ ही न सिर्फ शिवाजी एवं छत्रसाल जैसे हिन्दू राजाओं की वीरता का गान हुआ है बल्कि प्रत्यक्ष एवं प्रकारांतर से हिंदुत्व का समर्थन भी दिखाई देता है, इसलिए कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी आलोचक इन्हें राष्ट्रकवि न मानकर भूषण को एक सम्प्रदाय विशेष का समर्थक कवि मानते हैं। किन्तु वास्तव में यदि हम तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के आलोक में भूषण की रचनाधर्मिता को देखें तो वस्तुतः उन्हें सम्प्रदाय विशेष का समर्थक कवि कहना उनके राष्ट्र–प्रेम के साथ अन्याय होगा।

महाकवि भूषण की चेतना जातीय भावना अर्थात हिन्दू जाति की चेतना तक ही सीमित नहीं थी, वरन् हिन्दू शब्द उनके लिए राष्ट्र शब्द का परिचायक था। भूषण की कविताओं में हिन्दू का आशय साम्प्रदायिकता से सम्बंधित न होकर सांस्कृतिक था। आज भी जो हिन्दू शब्द को जाति या साम्प्रदायिकता से जोड़कर देखते हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि हिन्दू शब्द का अर्थ संस्कृत के श्लोक ‘हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते‘ से ज्ञात होता है। अर्थात हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। व्यापक रूप से इसे देखें तो वस्तुतः हिमालय से समुद्र पर्यन्त विस्तृत भू–भाग में जन्मी उपासना पद्धति को मानने वाले ‘हिन्दू‘ हैं। यहाँ स्पष्ट है कि जो भी मत, पूजा–पद्धति इस भूभाग में जन्मी उसे मानने वाले हिन्दू हैं, अर्थात हिन्दू जीवन जीने की एक शैली है। मध्यकाल की विपरीत परिस्थितियों में राष्ट्रीयता के भाव की व्यापकता के साथ अभिव्यक्ति ने ही भूषण को कालजयी बनाया।

भूषण जिस समय काव्य रचना कर रहे थे उस समय औरंगजेब केंद्रीय सत्ता पर विराजमान था। औरंगजेब और भूषण के सम्बंध में कहा जाता है कि एक बार मुगल बादशाह औरंगजेब ने भूषण को अपने दरबार में आने का निमंत्रण भेजा, तो भूषण ने इस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। वह मुगलों के विरुद्ध स्वतंत्रता और वीरता के प्रतीक शिवाजी के साथ ही रहे। उन्होंने मुगलों के दरबार में जाने के बजाय, शिवाजी के सम्मान और उनकी वीरता को अपने काव्य में स्थान दिया। ऐसा समय जब धर्मांधता और कट्टरपन के कारण औरंगजेब ने हिंदुओं पर बेशुमार अत्याचार किया, उस समय भूषण का उसके निमंत्रण को स्वीकार न करना है उनकी वीरता और राष्ट्र के प्रति उनके प्रेम को परिलक्षित करता है। इतना ही नहीं भूषण की कविता में औरंगजेब की खुले शब्दों में आलोचना भी दिखाई देती है– 

“देवल गिरावते फिरवते निसान अली, 

ऐसे समै राव–राने सर्वे गए लवकी। 

गौरा गनपत्ति आप, औरंग की देखि ताप, 

अपने मुकाम सब मारि गए लबकि।”

इन पंक्तियों में जहाँ उसके मंदिरों को तोड़ने की आलोचना की गई है वहीं उस समय के जो राजा सशर्त स्वतंत्रता के साथ विलासी जीवन जी रहे थे उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठा रहे हैं। किंतु वीर नायक शिवाजी की प्रशंसा उनकी कविता में उसी तरह अभिव्यक्त हुई है जो सम्भवतः तत्कालीन जनता महसूस कर रही होगी। वे लिखते हैं–

“इंद्र जिम जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर रावन सदंभ पर रघुकुलराज है। 

पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है। 

दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुँड पर भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है। 

तेज तम–अंस पर कान्ह जिम कंस पर यौं मलेच्छ–बंस पर सेर सिवराज है॥”

वास्तव में आज भी भूषण की इन पंक्तियों को पढ़कर मन में वीरता का स्थायी भाव जाग्रत हो जाता है तो निश्चित रूप से उस समय की परिस्थितियों में भूषण की इन कविताओं ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि से निराश हिन्दू जनता में उत्साह अवश्य भरा होगा। 

भूषण भारतीय ज्ञान–परम्परा में आस्था रखते थे, भारतीय पौराणिक इतिहास में विश्वास रखने वाले भूषण राम नाम जपने की बात अपनी कविताओं में करते हैं। उनकी ये पंक्तियाँ “वेद राखे विदित पुरान परसिद्ध राखे, राम–नाम राख्यो अति रसना सुधर में।” इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। भूषण की प्रत्येक पंक्ति में राष्ट्र के प्रति प्रेम, अतीत का गौरवगान, भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी आस्था परिलक्षित होती है। इनकी ये विशेषता ही भूषण को साहस, निष्ठा, और वीरता का प्रतीक बनाती है।

उनकी कविताओं ने उन्हें एक ऐसे कवि के रूप में स्थापित किया, जिन्होंने केवल काव्य नहीं लिखा, बल्कि एक पूरे युग को दिशा दी। इस तरह मुगल शासन के दौरान मुगल शासन की आलोचना करने का साहस करने वाला यह महान राष्ट्रकवि जीवन के अंतिम समय तक काव्य रचना करता रहा। भूषण की मृत्यु के विषय में प्रामाणिक और विस्तृत ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। भूषण का कार्यकाल शिवाजी के जीवनकाल के समय में था और वे उनके राज्याभिषेक के समय भी उनके साथ रहे। इसके बाद का उनका जीवन और मृत्यु के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, इसलिए विद्वानों में उनकी मृत्यु को लेकर अलग–अलग धारणाएँ हैं।

ऐतिहासिक दस्तावेजों की अनुपलब्धता के कारण उनकी मृत्यु का समय और स्थान अज्ञात है लेकिन उनकी रचनाएँ और उनके वीर रस के कवित्त आज भी जीवित हैं, जो उनकी स्मृति को बनाए रखते हैं।

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