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15 अगस्त को धर्म के कारण मारे गए हिंदुओं का ‘श्राद्ध संकल्प’ लेना क्यों आवश्यक है?

15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और ‘श्राद्ध संकल्प दिवस’ एक साथ मनाना ही धर्म के कारण मारे गए उन लाखों हिन्दुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है जो भारत विभाजन के समय मारे गए थे।

Dr. Mahender द्वारा Dr. Mahender
12 August 2025
in इतिहास, मत
15 अगस्त को धर्म के कारण मारे गए हिंदुओं का ‘श्राद्ध संकल्प’ लेना क्यों आवश्यक है?

15 अगस्त को धर्म के कारण मारे गए हिंदुओं का ‘श्राद्ध संकल्प’ लेना क्यों आवश्यक है?

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“महावतार नरसिंह” फिल्म धूम मचाती जा रही है । भक्त प्रहलाद की अटल भक्ति के पीछे आखिर क्या था? विचार करेंगे तो ध्यान आएगा कि देवर्षि नारद द्वारा दिए गए गुरु मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ की शक्ति और प्रहलाद द्वारा हर परिस्थिति में इस मन्त्र के जाप का‘’संकल्प’ । संकल्प में बहुत शक्ति होती है, इसका प्रमाण दुनिया ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय भी देखा । जब भारतीय सेना ने संकल्प लेकर पकिस्तान की कब्र खोदी ।

भारत 15 अगस्त 2025  को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने जा है। 15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता का पर्व है, यह एक ऐसा दिन जिसे हम गर्व, राष्ट्रभक्ति और आज़ादी के जश्न के रूप में मनाते हैं। परंतु इसी दिन का एक और कहीं अधिक गहरा और पीड़ादायक पक्ष भी है। यह वह दिन होता है जब भारत के लोग अपनी हर पीड़ा को भूलाकर देशभक्ति के रंग में रंगे होते हैं। देशभक्ति का रंग कुछ ऐसा चढ़ता है कि भारत विभाजन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पाकिस्तानी अल्लामा इक़बाल तक के पोस्टर भारत में लहराते रहते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि जिनके कारण यह देश अभी तक ‘भारत’ नाम से जीवंत है वह हिन्दू सदियों से भूलने की बीमारी से ग्रसित है। 

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14 अगस्त: अखंड भारत संकल्प दिवस

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भारत विभाजन के समय लाखों हिन्दू मारे गए थे, बेघर हुए थे। बहन बेटियों के साथ मुस्लिम पिशाचों ने दुर्व्यवहार किया था। शवों से भरी हुई ट्रेने भारत आयीं थी। और वो सब के सब हिन्दू थे। कुछ लोग कहेंगे उनमें सिख भी थे। उनके लिए केवल इतना ही कहूंगा ‘मैं सिखों को हिन्दुओं से भिन्न नहीं मानता।’ इतना कुछ हुआ और भारत माता के मज़हब के आधार पर टुकड़े  कर दिए गए। सुप्रसिद्ध लेखक श्री प्रशांत पोल जी की पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन’ जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है हर हिन्दू को पढ़नी चाहिए। जिससे उनको अनुमान होगा कि 15 अगस्त 1947 को देश में तथाकथित कितनी ख़ुशी का माहौल था? या फिर कुछ और ही दृश्य था। हिन्दुओं के भूलने की बीमारी का उपचार प्रशांत जी की पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन’ है, ऐसा कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

सनातन परंपरा का अनुगामी हिन्दू समाज आज भी विस्मृति में है। हमारे पूर्वजों ने बताया था कि सभी प्रकार के ऋणों से महत्वपूर्ण ऋण ‘पितृ ऋण’ होता है। और साथ ही इस ऋण मुक्ति का सरल सा उपाय बताया गया था कि श्रद्धाभाव के साथ श्राद्ध तर्पण करने से इस ऋण से मुक्ति मिल सकती है और पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। लेकिन हमेशा से भूलने की बीमारी से ग्रसित हिन्दू कदाचित ही इस ऋण की तरफ सोचता है। और यदि सोचता भी है तो केवल अपने परिवार के पूर्वजों के बारे में।

  • क्या भारत का हिन्दू समाज इस बात को नकार सकता है कि हिन्दू होने के नाते भारत विभाजन के समय मुस्लिम पिशाचों के हाथों मारे गए लाखों हिन्दू केवल इसलिए मार दिए गए थे कि वे हिन्दू थे?
  • क्या भारत के हिन्दुओं में से कोई भी एक ये दावे के साथ बता सकता है कि यदि वह स्वयं और उसका परिवार उन दिनों विभाजन की भयानक विभीषिका के समय उस परिस्थिति में होता तो सकुशल भारत आ पाता या जीवित रहता?
  • क्या भारत का हिन्दू इस बात को नकार सकता है कि देश को जो आज़ादी (स्वतंत्रता) मिली है उसका मार्ग लाखों हिन्दुओं के रक्त से सींचा गया था?
  • क्या भारत का हिन्दू इस बात को नकार सकता है कि भारत की स्वतंत्रता को लेकर न जाने कितनी हिन्दू बहन बेटियों की गरिमा को तार तार किया गया था?
  • क्या भारत का हिन्दू इस बात को भूल सकता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले लाखों हिन्दू परिवार बेघर हो गए थे, उनके व्यवसाय लूट लिए गए थे, वो भी इसलिए क्योंकि वे सभी हिन्दू थे?
  • अपने परिवार के प्रति हमारे दायित्व निर्वहन अपनी जगह हैं और हमें हर परिस्थिति में उनका पालन और निर्वहन करना चाहिए। लेकिन क्या हिन्दू होने के नाते हमारे कुछ और दायित्व नहीं है? क्या भारत विभाजन के समय अकाल, असमय मारे गए लाखों हिन्दू हमारे पूर्वज नहीं है? क्या हिन्दू होने के नाते उनके प्रति हमारा कोई दायित्व नहीं है? आखिर आज हम हिन्दू होने के नाते उनके लिए कर क्या सकते हैं?

जो तिरंगा आज सरकारें लोगों के घरों में फहरा रहीं हैं उस तिरंगे के लिए अपना बलिदान देने वाले हुतात्मा क्रांतिकारियों के साथ-साथ लाखों हिन्दुओं का रक्त भी बहा है और हिन्दू होने के नाते उन असमय मारे गए हिन्दुओं के प्रति हमारा भी कोई दायित्व बनता है। इसी दायित्व का निर्वहन करने के लिए अयोध्या फाउंडेशन की संस्थापक मीनाक्षी शरण विगत 9 वर्षों से उन अंसंख्य हिन्दुओं की आत्मा की शांति के लिए प्रतिवर्ष 15 अगस्त को ‘श्राद्ध संकल्प’ आह्वान करती हैं। मैं स्वयं इस मुहीम से शुरू से जुड़ा हुआ हूँ। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और यह ‘श्राद्ध संकल्प दिवस’ एक साथ मनाना ही धर्म के कारण मारे गए उन लाखों हिन्दुओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है जो भारत विभाजन के समय मारे गए थे। यह संकल्प लेने से किसी के भी स्वतंत्रता दिवस के उल्लास में कोई विघ्न नहीं पड़ता है, ऐसा मेरा मत है, क्योंकि विगत 8 वर्षों से मैं ये दोनों कार्य एक साथ सपरिवार करता आ रहा हूँ और लोगों से भी करवा रहा हूँ। बाकी तर्क, कुतर्क करना कुछ जगह छोड़ देना चाहिए। जो बात सरलता से हो सकती है और समझ आ सकती है, वहाँ बुद्धि के व्यायाम की आवश्यकता नहीं होती, ऐसा भी मेरा मत है।

वर्ष 2021 में ही भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 14 अगस्त के दिन ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थीं। कदाचित यह मीनाक्षी शरण जी के हिन्दू भाव जागरण के प्रयास पर एक मोहर की तरह देखना चाहिए। सामूहिक तर्पण करने का यह संकल्प सर्वपितृ अमावस्या के दिन केवल हिन्दू होने के नाते मारे गए उन असंख्य हिन्दुओं के नाम पर जल तर्पण करके पूरा होता है देश विदेश में कई जगह ये कार्यक्रम होने लगे हैं। आईये इस 15 अगस्त को हम भी यह संकल्प लें कि इस बार आने वाली सर्व पितृ अमावस्या को हम भी उन हिन्दू हुतात्माओं के नाम पर तर्पण करेंगे ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके ।

Tags: 15 अगस्त15 अगस्त श्राद्ध संकल्प दिवसअयोध्या फाउंडेशनमिनाक्षी शरणविभाजन की विभीषिकाश्राद्ध संकल्प दिवस
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