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कृष्णजन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है? जानिए इस बार का शुभ मुहूर्त

भगवान कृष्ण के जन्म का पावन पर्व और इसका महत्व

Mansi Singh द्वारा Mansi Singh
9 August 2025
in धार्मिक कथा
कृष्णजन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है? जानिए इस बार का शुभ मुहूर्त

कृष्णजन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है? जानिए इस बार का शुभ मुहूर्त

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कृष्णजन्माष्टमी हिन्दू धर्म का एक बहुत ही पवित्र और खुशी से भरा त्योहार है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि प्रेम, धर्म और आनंद के अवतरण का प्रतीक है। यह पर्व हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था।

श्रीकृष्ण का जन्म रात के आठवें मुहूर्त में, रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के शुभ संयोग में हुआ था, जिसे “जयंती योग” कहा जाता है। उस समय रात के 12 बजे “शून्य काल” था और आकाश में केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी।

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श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक चमत्कार नहीं था, बल्कि धर्म की पुनःस्थापना और अधर्म के अंत की शुरुआत थी। उनका जीवन कर्म, प्रेम, नीति और लीलाओं से भरा हुआ था। वे एक ओर मुरली बजाने वाले बालक थे और दूसरी ओर धर्म रक्षक योद्धा। वे ईश्वर के अवतार के रूप में इस धरती पर आए, जो धर्म की विजय का प्रतीक है।

कृष्ण जन्म की सच्ची कथा

कंस, जो मथुरा का राजा था, अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। जब देवकी की शादी वसुदेव से हो रही थी, तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र ही कंस का अंत करेगा। यह सुनकर कंस डर और गुस्से में भर गया और उसने तलवार खींच ली ताकि वह देवकी को मार दे। लेकिन वसुदेव ने बड़ी समझदारी से उसे शांत किया और वादा किया कि वे अपनी हर संतान उसे सौंप देंगे। कंस ने यह शर्त मान ली और दोनों को जेल में बंद कर दिया।

देवकी और वसुदेव के छह बच्चे हुए, जिन्हें कंस ने जन्म लेते ही निर्दयता से मार डाला। सातवें गर्भ में भगवान शेषनाग बाल रूप में आए। भगवान विष्णु ने योगमाया की मदद से उन्हें देवकी के गर्भ से निकालकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में भेज दिया। यही बालक आगे चलकर बलराम बने।

आठवें गर्भ में भगवान विष्णु ने स्वयं अवतार लिया। उन्होंने देवकी और वसुदेव को उनके पिछले जन्मों की तपस्या और वचन की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि वे पहले वृष्णिगर्भ के रूप में और फिर उपेंद्र (वामन) के रूप में अवतरित हो चुके हैं और अब तीसरी बार आए हैं।

जन्म की रात बहुत अंधेरी थी, तेज बारिश हो रही थी, बिजली कड़क रही थी और यमुना नदी में बाढ़ थी। तभी योगमाया प्रकट हुईं और वसुदेव को आदेश दिया कि वे नवजात कृष्ण को गोकुल ले जाकर यशोदा के पास रख दें और वहाँ से जन्मी कन्या को कारागार में वापस ले आएं।

वसुदेव ने डरते हुए कहा कि वे कैद में हैं, बाहर सैनिक तैनात हैं, वे कैसे जाएंगे? योगमाया मुस्कुराईं और कहा कि सब कुछ उनके लिए आसान हो जाएगा। वसुदेव की बेड़ियाँ टूट गईं, दरवाजे अपने आप खुल गए और पहरेदार सो गए। वसुदेव ने कृष्ण को टोकरी में रखा और यमुना नदी पार करने लगे।

जब पानी बढ़ा तो शेषनाग ने अपनी छाया से बालक को ढक लिया और यमुना माता ने श्रीकृष्ण के चरणों को छूते हुए मार्ग बना दिया। वसुदेव सुरक्षित गोकुल पहुंचे और यशोदा के पास जन्मे बालक के पास श्रीकृष्ण को रखकर वहाँ की नवजात कन्या को लेकर लौट आए।

वापस आकर उन्होंने कन्या को देवकी के पास सुला दिया और योगमाया की कृपा से सब भूल गए। सुबह होते ही कंस आया और कन्या को देखकर चौंक गया। उसने उसे भी मारने की कोशिश की लेकिन वह कन्या उसके हाथ से निकलकर आकाश में उड़ गई और वहां योगमाया के रूप में प्रकट होकर बोलीं -“हे मूर्ख कंस! तुझे मारने वाला कहीं और जन्म ले चुका है। अब कोई तुझे नहीं बचा सकता।”

कंस स्तब्ध रह गया और उसे समझ आ गया कि वह भाग्य को नहीं बदल सकता। इस तरह श्रीकृष्ण के जन्म के साथ अधर्म पर धर्म की विजय की शुरुआत हो गई।

कृष्ण जन्माष्टमी का पौराणिक रहस्य

यह पर्व केवल श्रीकृष्ण के जन्म का दिन नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की जीत, अंधकार में उजाले के आगमन और जीवन में ईश्वर की मौजूदगी का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब द्वापर युग में पृथ्वी पाप और अत्याचार से भरी हुई थी, तब भगवान विष्णु ने वसुदेव और देवकी के घर श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया।

यह दिन सिर्फ एक बच्चे के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि ईश्वर की उस महान लीला की शुरुआत है, जिसमें जेल के ताले अपने आप खुल जाते हैं, नदी रास्ता देती है, और एक छोटा बालक अधर्म का अंत करने आता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, 15 अगस्त को रात 11:49 बजे भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि आरंभ होगी और 16 अगस्त को रात 9:34 बजे समाप्त होगी। चूंकि श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि को हुआ था, इसीलिए जन्मोत्सव भी उसी समय मनाया जाता है।

इस बार पूजा का शुभ समय 16 अगस्त की रात 12:04 से 12:47 तक रहेगा। इसी समय भगवान की पूजा और आराधना की जाती है।

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि

इस पर्व की पूजा विधि विशेष महत्व रखती है। लड्डू गोपाल के जन्म की तैयारी खास होती है। पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनें।
  • रात को मंदिर और पालना सजाएँ, गंगाजल से शुद्धिकरण करें।
  • भगवान की मूर्ति को पालने में रखें या चौकी पर विराजमान करें।
  • भगवान को जल, अर्घ्य और आचमन अर्पित करें।
  • पंचामृत से स्नान कराएं: दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल।
  • मूर्ति को वस्त्र, आभूषण, मुकुट, मोरपंख से सजाएं।
  • चंदन, फूल, तुलसी, धूप और दीप अर्पित करें।
  • माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
  • आरती करें, परिक्रमा करें और प्रार्थना करें।

जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को भोग में क्या चढ़ाया जाता है?

भक्तजन इस दिन विशेष व्यंजन बनाते हैं, विशेषकर दूध और माखन से बने पकवान। इनमें शामिल हैं:

  • माखन और मिश्री – श्रीकृष्ण के प्रिय।
  • खीर – दूध और चावल से बनी मिठाई।
  • लड्डू व पेड़ा – पारंपरिक मिठाइयाँ।
  • पंचामृत – पवित्र मिश्रण।
  • फल और मेवे – ताजे और सुखाए हुए दोनों।
  • छप्पन भोग – 56 प्रकार के व्यंजन।

इन सभी प्रसादों को भगवान को चढ़ाकर बाद में भक्तों में बांटा जाता है।

Tags: Hindu festivalJanmashtami celebrationJanmashtami importanceKrishna JanmashtamiKrishna Janmashtami Muhurat
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