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व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रभावशाली यात्रा

भारतीय राष्ट्र-जीवन के आधुनिक इतिहास में यदि किसी संगठन ने बिना सत्ता, बिना चुनाव और बिना सरकारी संरक्षण के समाज के भीतर गहरी वैचारिक और संगठनात्मक पैठ बनाई है

TFI Desk द्वारा TFI Desk
8 January 2026
in भारत
संघ की दिशा: व्यक्ति से राष्ट्र तक की उत्कर्ष यात्रा

संघ की दिशा: व्यक्ति से राष्ट्र तक की उत्कर्ष यात्रा

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स्वतन्त्रता व्यक्ति का श्रेष्ठ मूल्य है जिसके बिना वह अपने स्वरूप को न तो समझ सकता है और न ही उसका प्रकटन कर सकता है। भारतवर्ष की अनवरत दासता की मुक्ति हेतु सतत रूप से स्वतन्त्रता का आन्दोलन चलता रहा और भारत के वीर सपूत अपने अप्रतिम बलिदान के लिए हर प्रकार से तत्पर रहे परंतु उसी दौरान जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि भारत कि स्वतन्त्रता का अमृत दिवस निकट आ रहा है तो कुछ मनीषियों का विचार इस महत्वपूर्ण विंदु की तरफ गया कि मिलने वाली स्वतन्त्रता का स्वरूप कैसा होगा? क्या स्वतन्त्रता मात्र राजनैतिक स्वतन्त्रता ही होगी? क्या इतना ही भारत जैसे गौरवशाली राष्ट्र के लिए पर्याप्त है या इसके साथ मानसिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता की भी आवश्यकता है। आदरणीय केशव बलिराम हेडगेवार,एक चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रचिंतकने इसी कालखंड में यह महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। जब तक समाज संगठित, चरित्रवान और सांस्कृतिक रूप से जागरूक नहीं होगा, तब तक स्वतंत्र भारत भी कमजोर ही रहेगा। व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और इसके माध्यम से राष्ट्र उन्नति ही स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ होगा। यही विचार आरएसएसकी स्थापना की वैचारिक पृष्ठभूमि बना।

भारतीय राष्ट्र-जीवन के आधुनिक इतिहास में यदि किसी संगठन ने बिना सत्ता, बिना चुनाव और बिना सरकारी संरक्षण के समाज के भीतर गहरी वैचारिक और संगठनात्मक पैठ बनाई है, तो वह है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। वर्ष 1925 में नागपुर की एक छोटीसी बैठक से प्रारंभ हुआ यह संगठन 2025 में अपनी शताब्दी पूर्ण करते हुए न केवल भारत बल्कि विश्व का सबसे बड़ा स्वैच्छिक, अनुशासित और निरंतर सक्रिय सामाजिक – सांस्कृतिक संगठन बन चुका है। आरएसएसका यह सौ वर्ष का प्रवास केवल एक संस्था का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय समाज के आत्मबोध, पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की एक लंबी यात्रा है।

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1920 के दशक का भारत गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन था, जिसने भारत की राजनीतिक सत्ता छीन ली थी, तो दूसरी ओर भारतीय समाज भीतर से विखंडित, आत्महीन और दिशाहीन होता जा रहा था। जातीय विभाजन, सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक हीनताबोध और आक्रामक विभेद आधारित राजनीति राष्ट्रीय एकता को निरन्तर क्षीण करती जा रही थी। 1920 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के निधन के पश्चात् नागपुर में उनके अन्य अनुयायियों की भाँति डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जो कि स्वयं भी काँग्रेस के मेम्बर थे, ने भी महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए कुछ राजनीतिक कार्यक्रमों से असहमति व्यक्त की। विशेष रूप से खिलाफ़त आंदोलन के प्रति गांधी का दृष्टिकोण हेडगेवार के लिए गहन चिंता का विषय था।

वर्ष 1921 में कटोल और भरतवाड़ा में दिए गए उनके राष्ट्रवादी भाषणों के कारण ब्रिटिश शासन ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया, जिसके अंतर्गत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंततः उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। जुलाई 1922 में कारावास से मुक्त होने के पश्चात् हेडगेवार ने कांग्रेस से जुड़े स्वयंसेवी संगठनों में अनुशासन, निरंतरता और संगठनात्मक संरचना के अभाव को गहराई से अनुभव किया। इसी अनुभव ने उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न किया कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक चेतना पर आधारित एक स्वतंत्र, अनुशासित और दीर्घकालिक संगठन की स्थापना आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से उन्होंने 1922 से 1924 के बीच नागपुर में अनेक प्रमुख राजनीतिक एवं सामाजिक व्यक्तित्वों से संवाद किया। इसी चिंतन और प्रयास की परिणति आगे चलकर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की अवधारणा के रूप में सामने आई।विजयादशमी, 27 सितंबर 1925, को नागपुर में कुछ युवाओं के साथ डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। आरएसएसका उद्देश्य स्पष्ट था—“हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और राष्ट्रनिष्ठ बनाना।” उल्लेखनीय है कि यहाँ ‘हिंदू’ कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक जीवन-दृष्टि का प्रतीक था। सम्पूर्ण भारतीय भू भाग और इसकी सांस्कृतिक विरासत में अपनी आस्था रखने वाले सभी हिन्दू ही हैं, ऐसी आरएसएस की राष्ट्रीय सोच रही है।

1940 में डॉ. हेडगेवार के देहावसान के बादमाधव सदाशिव गोलवलकर, गुरु जी आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक बने। उनके नेतृत्व में आरएसएसका वैचारिक ढाँचा और अधिक स्पष्ट हुआ।गुरुजी ने आरएसएसको केवल संगठन नहीं, बल्किजीवन – पद्धतिके रूप में स्थापित किया। 1947 का वर्ष भारत के लिए स्वतंत्रता के साथ विभाजन की त्रासदी भी लेकर आया। देश भर में हिंसा, विस्थापन और अव्यवस्था का दौर था। इस कठिन समय में आरएसएसके स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सहायता, सुरक्षा और पुनर्वास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।हालाँकि, इसी काल में आरएसएसको अनेक राजनीतिक और वैचारिक विरोधों का भी सामना करना पड़ा। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। किंतु जाँच के पश्चात जब आरएसएसकी भूमिका निर्दोष पाई गई, तब प्रतिबंध हटा लिया गया। यह घटना संघ के इतिहास मेंसंघर्ष और संयमकी एक महत्वपूर्ण परीक्षा थी।

स्वतंत्र भारत में आरएसएसने स्वयं को सत्ता से दूर रखते हुए समाज के भीतर कार्य करने का मार्ग चुना। इसी दौर में आरएसएससे प्रेरित अनेकअनुषांगिक संगठनोंका जन्म हुआ जिनमें कुछ प्रमुख भारतीय मजदूर संघ,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,विश्व हिंदू परिषद,वनवासी कल्याण आश्रम,विद्या भारती इतयड रहे जिनके माध्यम से संघ ने समाज के सभी वर्गों में हिन्दुत्व की चेतना का अनवरत प्रयास जारी रखा हुआ है। इन संगठनों के माध्यम से आरएसएसकी विचारधारा समाज के विभिन्न वर्गों तक शनै: – शनै:पहुँचती भी रही।

1975–77 का आपातकाल आरएसएसके इतिहास का एक निर्णायक अध्याय है। संघ पर पुनः प्रतिबंध लगा, हजारों स्वयंसेवक जेल गए, भूमिगत आंदोलन चला। इस दौर में आरएसएसने यह स्पष्ट किया कि वह केवल सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्किलोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षकभी है।आपातकाल के बाद भारतीय राजनीति और समाज में आरएसएसकी भूमिका को एक नई दृष्टि से देखा जाने लगा। संघ ने भी मानों यह निर्णय कर लिया कि जब तक शासनतंत्र में राष्ट्रीय विचार के लोगों का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं रहेगा तब तक नीति निर्माण कि प्रणाली को भारतीय चिंतन के अनुरूप नहीं किया जा सकता है। समाज के स्फूर्त होने के साथ ही शासन सत्ता में बैठे लोगों को भी भारत कि आत्मचिंतन पद्धति का ज्ञान होना आवश्यक है। 1990 के बाद का भारत आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और तकनीकी परिवर्तन का साक्षी बना। आरएसएसने भी अपने कार्यक्षेत्र और भाषा को समयानुकूल बनाया। सेवा कार्य, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, परिवार मूल्य और युवाओं के बीच राष्ट्रभाव,इन सब क्षेत्रों में संघ की सक्रियता बढ़ी।

आज, 2025 में आरएसएसएक शताब्दी पूर्ण कर रहा है। देश-विदेश में फैली लाखों शाखाएँ, करोड़ों स्वयंसेवक और समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय प्रेरित संगठन,यह सब आरएसएसको केवल एक संगठन नहीं, बल्किराष्ट्रीय चेतना का प्रवाहबनाते हैं।सौ वर्ष का इतिहास यह सिखाता है किराष्ट्र निर्माण सत्ता से नहीं, संस्कार से होता है। यह यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। 2047 के ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए संघस्वयं को एकदीर्घकालिक सामाजिक प्रयोगके रूप में प्रस्तुत करता है।

(डा. आलोक कुमार द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर केएसएएस लखनऊ, और आईएनएडीएस, यूएसए)

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