भारत दुनिया के सबसे समृद्ध और जीवंत लोकतंत्रों में से एक है और गणतंत्र के इसी वैभव व शक्ति को गणतंत्र दिवस के दिन कर्तव्य पथ पर दर्शाया जाता है। हर साल की तरह इस बार भी रिपब्लिक डे परेड में भारत की सैन्य और तकनीकि क्षमताओं का प्रदर्शन किया जाएगा, लेकिन इस बार ये परेड कई मायनों में ख़ास होने वाली है। ख़ास इसलिए क्योंकि पहली बार भारत इस परेड के ज़रिए पूरी दुनिया के सामने अपनी हाइपरसोनिक क्षमता का प्रदर्शन करेगा। ऐसी खबरें हैं कि इस बार DRDO एक ऐसी लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LRAShM) को परेड में दिखाने जा रहा है जो कि एक बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोनिक वेपन है। अब जरा कल्पना कीजिए- मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर के सामने से कर्तव्य पथ पर ये हथियार गुजरेगा तो इसकी धमक पूरी दुनिया किस रूप में महसूस करेगी? विशेषकर तब, जबकि ग्रीनलैंड लेने पर अड़े ट्रम्प यूरोप और EU के ज़्यादातर देशों को धमका रहे हैं।
LRAShM क्या है और ये भारत की क्षमता को कैसे पूरी तरह बदल देगा?
LRAShM यानी लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल को खासतौर पर दुश्मन के बड़े नौसैनिक जहाजों, जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर या डिस्ट्रॉयर्स, को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैसे तो इसके लिए भारत के पास पहले से ही ब्रह्मोस जैसी एंटी शिप मिसाइल है, जो न सिर्फ ख़तरनाक है, बल्कि भरोसेमंद भी है, लेकिन ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है, वहीं LRAShM एक हाइपरसोनिक मिसाइल है जो कि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) पर बेस्ड है।
यानी ये मिसाइल कंवेंशनल बैलिस्टिक मिसाइल की तरह वायुमंडल के बाहर स्पेस में जाकर दोबारा टार्गेट की तरफ़ नहीं एप्रोच करती, बल्कि बूस्टर से जरूरी रफ़्तार हासिल करने के बाद ये वायुमंडल के भीतर ही बहुत तेज़ रफ्तार से ग्लाइड करती हुई लक्ष्य तक पहुंचती है। यानी इसे आप बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइल का मिला-जुला वर्जन कह सकते हैं, जो दोनों तरह की ट्रैजेक्टरी को फॉलो करती है।
आमतौर पर पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें मैक 15 या मैक 20 तक की स्पीड हासिल कर लेती हैं, लेकिन उनकी ट्रेजेक्टरी ‘फिक्स’ और ‘प्रेडिक्टेबल’ होती है। इसी वजह से उन्हें शुरुआती चरण में ही डिटेक्ट किया जा सकता है और इंटरसेप्ट करने के मौके मिल जाते हैं। इसके उलट, हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल मैक 5 से मैक 10 की स्पीड पर अपेक्षाकृत कम ऊंचाई (लगभग 40–100 किमी) पर आगे बढ़ते है, इससे इन्हें रडार पर देख पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल क्यों इतने खतरनाक क्यों हैं?
इस तरह के हथियारों का सबसे बड़ा फायदा है कम रिएक्शन टाइम। क्योंकि ये मिसाइलें सतह के काफी करीब उड़ती हैं, इसलिए दुश्मन के लॉन्ग रेंज रडार इन्हें देर से पकड़ पाते हैं। इसके अलावा, इतनी तेज़ गति पर उड़ते समय मिसाइल के चारों ओर प्लाज्मा की एक परत बन जाती है, जो रडार से निकलने वालीं इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स को एब्जॉर्ब कर लेती है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल खुद-ब-खुद एक तरह की स्टेल्थ क्षमता हासिल कर लेती है। साथ ही, ये मिसाइलें उड़ान के दौरान मैन्युवर भी कर सकती हैं, यानी दिशा बदल सकती हैं (बैलिस्टिक मिसाइल्स ऐसा नहीं कर सकतीं)। इससे इनकी ट्रेजेक्टरी ‘अनप्रिडिक्टेबल’ हो जाती है और मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम्स के लिए इन्हे ‘इंटरसेप्ट’ कर पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही कारण है कि आज के समय में हाइपरसोनिक हथियारों (क्रूज़ मिसाइल्स) को गेम-चेंजर माना जा रहा है।
भारत किन-किन हाइपरसोनिक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है?
अक्सर सवाल पूछा जाता है कि क्या भारत सिर्फ एक ही हाइपरसोनिक मिसाइल बना रहा है। जवाब है—नहीं। भारत इस समय कई अलग-अलग कैटेगरी के हाइपरसोनिक वेपन्स और टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल: इसके लिए डीआरडीओ ने HSTDV (Hypersonic Technology Demonstrator Vehicle) प्रोजेक्ट पर काम किया है। इसके स्क्रैमजेट इंजन की सफल टेस्टिंग हो चुकी है। स्क्रैमजेट तकनीकि को हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की रीढ़ माना जाता है, क्योंकि यही इंजन किसी क्रूज़ मिसाइल को हाइपरसोनिक रफ़्तार प्रदान करता है। भारत इसमें भी कई तरह वर्जन पर काम कर रहा है, जो बेसिकली मिसाइल के शेप और स्ट्रक्चर से संबंधित हैं।
BrahMos-II: ब्रह्मोस पहले से ही एक सुपरसोनिक मिसाइल है जो 3 मैक से ज्यादा की रफ़्तार से टार्गेट की तरफ़ बढ़ती है, तो वहीं अब ब्रह्मोस मिसाइल के अगले संस्करण पर भी काम किया जा रहा है, जिसकी स्पीड मैक 7 के आसपास हो सकती है।
बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोनिक वेपन (HGV): LRAShM इसी कैटेगरी का वेपन सिस्टम है। ये हथियार खासतौर पर लॉन्ग रेंज और प्रिसीजन स्ट्राइक के लिए बनाए जा रहे हैं, जो 2 हज़ार किलोमीटर से भी ज्यादा रेंज पर मौजूद एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे किसी मैन्युवरिंग प्लेटफॉर्म्स को भी निशाना बना सकते हैं।
हाइपरसोनिक रेस में भारत कहां खड़ा है?
अगर तुलना की जाए तो रूस इस रेस में सबसे आगे है, क्योंकि वो पहले से ही इन्हें यूक्रेन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहा है तो वहीं बताया जाता है कि चीन के पास भी ऐसे हथियार मौजूद हैं। इन दोनों की तुलना में अमेरिका इस रेस में कुछ पीछे ज़रूर है, लेकिन वो भी बड़े पैमाने पर इनकी टेस्टिंग और डेवलपमेंट में जुटा हुआ है।
भारत की बात करें तो हम भी इस रेस में ज्यादा पीछे नहीं है और DRDO इन्हें लेकर काफी तेजी के साथ काम कर रहा है। स्क्रैमजेट टेस्ट, बूस्ट-ग्लाइड ट्रायल्स और लिमिटेड सीरीज प्रोडक्शन की खबरें यह दिखाती हैं कि भारत में ये तकनीकि अब रिसर्च और ट्रॉयल के लेवल पर तैयार है और अब भारत इनके शुरुआती ऑपरेशनल फेज की ओर बढ़ रहा है।
रणनीतिक दृष्टि से इसका क्या अर्थ है?
LRAShM जैसे हथियार भारत को खासतौर पर समुद्री क्षेत्र में बड़ा एडवांटेज दे सकते हैं। ख़ासकर हिंद महासागर जैसे क्षेत्र में अगर भारत के पास ऐसी मिसाइलें हैं, जो दुश्मन के आधुनिक एयर डिफेंस को चकमा देते हुए उनके युद्धपोतों को मिनटों में निशाना बना सकें, तो यह हमारे नेवल डिटरेंस को पूरी तरह बदल सकता है।






























