पाकिस्तान ने हमेशा कि तरह इस बार भी एक झूठा दावा किया है कि उसके JF-17 फाइटर, जो चीन और पाकिस्तान का ज्वाइंट प्रॉडक्ट्स है, उसने नए कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए है, यहा दावा कम कागजी जगहों पर किया गया है, जिसमें एयर शो और पाकिस्तानी सेना तक सीमित है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट ने इस खबर पर मोहर लगाने की कोशिश की है।
हालांकि इसमें इतनी संभावनाएं नहीं नजर आ रही है, पाकिस्तान के इस रिपोर्टिंग कि खबर से विदेश मंत्रालय भी हैरान हो गया है। उसने माना कि उसे सऊदी अरब के साथ लगभग 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सऊदी लोन को JF-17 फाइटर जेट डील में बदलने के बारे में किसी भी बातचीत की “जानकारी नहीं” थी.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के बाद पाकिस्तान को सफाई देनी पड़ी, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान और सऊदी अरब करीब 2 बिलियन डॉलर के सऊदी लोन को JF-17 फाइटर जेट डील में बदलने को लेकर बातचीत कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि JF-17 से जुड़ी ज़्यादातर कथित डील्स की खबरें चर्चा में है, इन रिपोर्ट्स को पढ़कर ऐसा लगता है मानो ये फाइटर जेट पूरी दुनिया में धड़ल्ले से बिक रहे हों।
22 दिसंबर पिछले साल से अब तक, रॉयटर्स ने अलग-अलग सूत्रों और कुछ आधिकारिक बयानों के आधार पर लीबिया, बांग्लादेश, सऊदी अरब, सूडान और इंडोनेशिया के साथ संभावित डील्स की खबरें प्रकाशित की हैं।
हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री रजा हयात हरराज ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा कि कई देश बातचीत कर रहे हैं और “जब विमान डिलीवर होंगे, तब दुनिया को पता चल जाएगा कि खरीदार कौन हैं।” यानी अभी तक कोई ठोस सौदा सामने नहीं आया है।
सबसे हैरान करने वाला दावा लीबिया के साथ डील को लेकर है। लीबिया 2011 से संयुक्त राष्ट्र के हथियार प्रतिबंध के तहत है। इसके बावजूद रॉयटर्स ने पाकिस्तानी सैन्य सूत्रों के हवाले से दावा किया कि पाकिस्तान ने लीबियाई नेशनल आर्मी के साथ 16 JF-17 फाइटर जेट और 12 ट्रेनर विमान बेचने का 4 बिलियन डॉलर से ज्यादा का समझौता किया है।
यह दावा कई सवाल खड़े करता है, क्योंकि पाकिस्तान खुद UN सुरक्षा परिषद और हथियार प्रतिबंध समिति का हिस्सा है। ऐसे में वह प्रतिबंधित देश को हथियार कैसे बेच सकता है—इस पर रॉयटर्स ने कोई जवाब नहीं दिया।
पाकिस्तानी मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय आउटलेट्स हर ऐसी अफवाह वाली डील को पाकिस्तान की बड़ी रणनीतिक जीत और उसके रक्षा उद्योग की सफलता बताने लगते हैं। साइन किए गए कॉन्ट्रैक्ट्स न होने को “गोपनीयता” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसा लगता है कि असली सफलता विमानों की डिलीवरी से नहीं, बल्कि बनी हुई हेडलाइंस से मापी जा रही है।
हकीकत यह है कि पाकिस्तान ने अब तक सिर्फ दो देशों को JF-17 एक्सपोर्ट किए हैं, और दोनों मामलों का अनुभव अच्छा नहीं रहा।
2015 में म्यांमार ने 16 JF-17 जेट खरीदे थे, लेकिन अब तक उसे सिर्फ 7 विमान मिले हैं। तकनीकी दिक्कतों और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण ये विमान लंबे समय तक उड़ान भरने लायक नहीं थे।
2021 में नाइजीरिया ने पाकिस्तान से 3 JF-17 खरीदे।
पिछले साल पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने अज़रबैजान के साथ 40 JF-17 ब्लॉक-3 विमानों की 4.6 बिलियन डॉलर की डील हासिल की है। यह एक शुरुआती समझौते पर आधारित है, लेकिन इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं है।
भारतीय रक्षा सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान JF-17 को ज़रूरत से ज्यादा प्रचारित कर रहा है ताकि “ऑपरेशन सिंदूर” में उसे मिली असफलताओं से ध्यान हटाया जा सके। उनके मुताबिक ये मीडिया स्टोरीज़ उसी रणनीति का हिस्सा हैं।
कुछ पाकिस्तानी सूत्रों का कहना है कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर इस बात से नाराज़ हैं कि ज्यादा ध्यान J-10C फाइटर जेट पर जा रहा है, इसलिए JF-17 को लेकर प्रचार बढ़ाया जा रहा है। मीडिया में चुनिंदा लीक भारत को उकसाने (ट्रोल करने) का भी तरीका है।
पाकिस्तान का दावा है कि JF-17 ने भारत के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन भारतीय सूत्रों का कहना है कि असल लड़ाई में J-10C जेट ही सक्रिय थे। JF-17 ज्यादातर पीछे ही रहे।
एक और बड़ी समस्या यह है कि पाकिस्तान के पास इतनी बड़ी संख्या में विमान बनाने की क्षमता ही नहीं है। पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स साल में करीब 20–25 JF-17 ही बना सकता है।
अगर लीबिया, सऊदी अरब और अज़रबैजान जैसी कथित डील्स को जोड़ दिया जाए, तो अगले कुछ सालों में करीब 80–90 जेट्स एक्सपोर्ट करने की बात हो रही है, जो मौजूदा क्षमता से कहीं ज़्यादा है।
इसके अलावा पाकिस्तान खुद विमान के सारे हिस्से नहीं बनाता। विमान का ढांचा, रडार और एवियोनिक्स चीन से आते हैं, जबकि इंजन रूस से। प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए इंजन सबसे बड़ी रुकावट हैं।
JF-17 ब्लॉक-3 चीन पर और ज्यादा निर्भर है क्योंकि इसमें एडवांस्ड AESA रडार और आधुनिक सिस्टम लगे हैं। चीन ने अपना इंजन लगाने की कोशिश की थी, लेकिन भरोसेमंद न होने के कारण पाकिस्तान को फिर से रूसी इंजन इस्तेमाल करना पड़ा।
सीधे शब्दों में कहें तो JF-17 को लेकर जो वैश्विक मांग दिखाई जा रही है, वह ज़्यादातर मीडिया प्रचार पर आधारित है। असली डील्स, डिलीवरी और उत्पादन क्षमता के स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति काफी कमजोर है।





























