भारत ने अमेरिका के साथ एक नई ट्रेड डील करने की घोषणा की है, जिसे कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस डील के तहत भारत को अब अमेरिका में अपने उत्पादों पर 50% की जगह सिर्फ 18% टैरिफ देना होगा। यह समझौता 2 फरवरी को हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक ताकत को दर्शाती है।
इस डील के बाद पाकिस्तान को निराशा का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान के उत्पादों पर अमेरिका ने 19% टैरिफ बनाए रखा, जबकि इस्लामाबाद ने महीनों लॉबिंग की और वहां के शीर्ष नेता व सेना प्रमुख भी वाशिंगटन में लगातार प्रयासरत रहे। पाकिस्तान में इस फैसले को लेकर गुस्सा और नाराजगी फैली हुई है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि “सम्मान खरीदा नहीं जा सकता।”
डील में ट्रंप प्रशासन ने भारत के लिए विशेष शर्तें रखीं। भारत को रूस से तेल खरीदने पर पेनल्टी से राहत दी गई और अमेरिका में भारतीय सामान पर रिसिप्रोकल टैरिफ घटाया गया। इसके विपरीत, पाकिस्तान को इस तरह के फायदे नहीं मिले। विश्लेषकों का कहना है कि यह दिखाता है कि विदेश नीति फोटो ऑप्स और व्यक्तिगत मुलाकातों से नहीं बनती, बल्कि आर्थिक ताकत, बाजार पहुंच और रणनीतिक दृष्टिकोण पर आधारित होती है।
पाकिस्तान में विपक्ष और मीडिया ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। पूर्व पीटीआई मंत्री हम्माद अजहर ने कहा कि 21वीं सदी में विदेश नीति का आधार केवल लॉबिंग और व्यक्तिगत रिश्तों से नहीं बनता। डिजिटल क्रिएटर और पत्रकार भी कह रहे हैं कि भारत ने पार्टनर बनकर बातचीत की, जबकि पाकिस्तान केवल लॉबिंग करने वाला बना रहा।
भारत के लिए यह डील आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 10 साल में इस डील के कारण भारत के निर्यात में लगभग 150 अरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है। इससे टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिलेगा। इसे देश की निर्यात क्षमता और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक प्रभाव को बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह डील भारत की कूटनीतिक समझदारी और रणनीतिक सोच का उदाहरण है। जबकि पाकिस्तान निराश है और उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिला, भारत ने आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से बेहतर स्थिति बनाई है। इस डील से न केवल भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश की वैश्विक व्यापारिक स्थिति भी मजबूत होगी।






























