महाराष्ट्र में मराठी और गैर-मराठी लोगों के बीच बढ़ती तनातनी फिर एक बार सामने आई है। नासिक में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक कोचिंग सेंटर के शिक्षक को पीटा, क्योंकि उन पर मराठी भाषा का अपमान करने का आरोप लगा। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें दिखाया गया कि MNS कार्यकर्ता शिक्षक को कोचिंग सेंटर के अंदर पकड़कर मार रहे हैं।
वीडियो और रिपोर्ट के अनुसार, Physics Wallah की नासिक की शाखा में पढ़ रहे छात्रों ने कहा कि शिक्षक ने कुछ मराठी बोलने वाले बच्चों को “गांवठी” और “बेवकूफ” कहकर अपमानित किया। इसके बाद छात्र शिकायत लेकर MNS के राज ठाकरे के नेतृत्व वाले सदस्यों के पास गए। कम से कम चार कार्यकर्ता कोचिंग सेंटर पहुंचे और शिक्षक से मारपीट की। वीडियो में दिखता है कि कार्यकर्ता छात्र से पूछते हैं कि क्या हुआ, और जब शिक्षक बोलता है तो एक MNS कार्यकर्ता उसे मराठी में बात करने को कहता है। फिर सभी ने उसे कम से कम चार बार थप्पड़ मारे।
MNS कार्यकर्ताओं की चेतावनी
MNS कार्यकर्ताओं ने दूसरे कर्मचारी को चेतावनी भी दी कि कोचिंग सेंटर में आठ दिनों के अंदर मराठी बोलने वाला स्टाफ नियुक्त करना होगा, अन्यथा वे “MNS-स्टाइल” प्रदर्शन करेंगे।
इससे पहले, मुंबई के माहिम में भी एक बैंक कर्मचारी को मराठी न बोलने पर MNS नेता ने डरा-धमकाकर माफी दिलवाई थी। हाल के समय में महाराष्ट्र में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां गैर-मराठी लोगों को भाषा के नाम पर धमकाया या हमला किया गया।
पिछले साल जुलाई में भी पलघर जिले में एक ऑटो चालक को मारपीट का शिकार होना पड़ा था, क्योंकि उसने मराठी न बोलने का बहाना दिया था। इसी तरह L&T पवई में एक सुरक्षा गार्ड और कल्याण में एक इडली विक्रेता भी मराठी न बोलने के कारण MNS कार्यकर्ताओं के हमले का शिकार हुए।
इन घटनाओं के बाद जुलाई 2025 में तीन वकीलों ने राज्य के डीजीपी को पत्र लिखकर MNS पर गैर-मराठी लोगों पर हमले और धमकी देने के आरोप में कानूनी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसे कृत्यों से समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है और राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ रही है।
भले ही अपनी मातृभाषा को बढ़ावा देना और उसका संरक्षण करना जरूरी है, लेकिन हिंसा और धमकाना कभी सही नहीं हो सकता। ऐसा करने से न केवल व्यक्तियों को नुकसान होता है बल्कि भाषा आंदोलन की साख भी गिरती है।
भाषा को लेकर विवाद करना गलत
भाषा एक पहचान, गर्व और सांस्कृतिक धरोहर है। इसे सम्मान और शिक्षा के जरिए बढ़ावा देना चाहिए, धमकी और मारपीट से नहीं। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी मतभेद को शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से हल किया जाना चाहिए। किसी भाषा को जबरदस्ती लागू करना न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि समाज में दूरी और तनाव भी बढ़ाता है।
सचमुच में सांस्कृतिक ताकत उस भाषा को साझा और मनाने में है, न कि उसे डर और बलपूर्वक थोपने में।
































