संसद का विशेष सत्र जब गुरुवार को शुरू हुआ, तो यह साफ हो गया कि यह सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण मोड़ का गवाह बनने जा रहा है। जैसे ही परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दे सदन में आए, माहौल तुरंत गरमा गया। विपक्षी दलों ने जहां इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताते हुए विरोध जताया, वहीं सरकार ने इसे ऐतिहासिक और देश की आधी आबादी के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने दोपहर बाद सदन में अपनी बात रखते हुए साफ कहा कि किसी भी राज्य या समुदाय के साथ अन्याय नहीं होगा और यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी।
विपक्ष से साधा निशाना
सत्र की शुरुआत से ही विपक्ष के तेवर तीखे नजर आए। केसी वेणुगोपाल, अखिलेश यादव और टी आर बालू जैसे नेताओं ने परिसीमन बिल को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अखिलेश यादव ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन वह किसी भी ऐसी “राजनीतिक साजिश” के खिलाफ खड़ी रहेगी, जिसे वे सत्ता का विस्तार करने की कोशिश मानते हैं। इस दौरान सदन में तीखी बहस हुई और कई बार हंगामे की स्थिति भी बनी। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह मुद्दा केवल नीति का नहीं, बल्कि राजनीति का भी केंद्र बन चुका है।
अमित शाह ने क्या बोला ?
इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि समाजवादी पार्टी मुस्लिम महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना चाहती है, तो उन्हें टिकट देने में कोई आपत्ति नहीं है। उनके इस बयान ने बहस को और तेज कर दिया और सदन का माहौल और अधिक राजनीतिक हो गया। यह स्पष्ट था कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल अधिकारों की बात नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीतियों और सामाजिक समीकरणों का भी हिस्सा बन चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा
दोपहर बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में बोलना शुरू किया, तो उन्होंने पूरे मुद्दे को एक व्यापक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में महिलाओं को उनका अधिकार देना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कई दशकों से इस मुद्दे को टालते रहे हैं और अब समय आ गया है कि इस “ऐतिहासिक भूल” को सुधारा जाए। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह भी दोहराया कि यह बिल किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है।
प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि कुछ लोग इसे राजनीतिक स्वार्थ से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन यदि विपक्ष इसका समर्थन करता है, तो इसका लाभ पूरे देश को मिलेगा। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि विपक्ष को इसका श्रेय चाहिए, तो वह देने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि वह “क्रेडिट का ब्लैंक चेक” देने को तैयार हैं, बस यह सुनिश्चित किया जाए कि देश की महिलाओं को उनका अधिकार मिल सके। उनका यह बयान जहां सत्ता पक्ष के सांसदों के लिए उत्साह का कारण बना, वहीं विपक्ष ने इसे एक राजनीतिक चाल के रूप में देखा।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमन की प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा और वर्तमान अनुपात में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संविधान हमें देश को टुकड़ों में देखने की अनुमति नहीं देता और हमें पूरे भारत को एक इकाई के रूप में देखना चाहिए—चाहे वह कश्मीर हो या कन्याकुमारी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि “गारंटी” शब्द की जरूरत है, तो वह यह गारंटी भी देने को तैयार हैं कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी।
इस बीच कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी और सरकार के दावों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महिलाएं अब “बहकावे” में आने वाली नहीं हैं और वे समझती हैं कि कौन उनके हित में काम कर रहा है और कौन नहीं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस ने 2023 में इस बिल का समर्थन किया था और आज भी वह इसके समर्थन में खड़ी है, लेकिन सरकार की नीयत पर सवाल उठाना जरूरी है।
संसद के भीतर इस मुद्दे पर चल रही बहस के समानांतर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कक्ष में वरिष्ठ मंत्रियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक भी की। इस बैठक में अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। इस बैठक में विशेष सत्र की रणनीति और आगे की कार्यवाही पर चर्चा होने की संभावना जताई गई। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और जी. रेड्डी भी प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे, जिससे यह संकेत मिला कि सरकार इस मुद्दे को लेकर पूरी तरह सक्रिय और गंभीर है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि विकसित भारत का अर्थ केवल बुनियादी ढांचे का विकास नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि देश की आधी आबादी महिलाएं नीति निर्धारण की प्रक्रिया में बराबरी से भाग लें। उन्होंने कहा कि यह केवल अधिकार देने का मामला नहीं, बल्कि देश की प्रगति को नई दिशा देने का अवसर है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे इस मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से न देखें, बल्कि इसे देशहित में एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में स्वीकार करें।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब वह संगठन के कार्यकर्ता थे, तब भी यह चर्चा होती थी कि पंचायत स्तर पर आरक्षण देना आसान होता है, क्योंकि वहां राजनीतिक जोखिम कम होता है। लेकिन संसद और विधानसभा जैसे उच्च स्तरों पर इसे लागू करना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि इन चुनौतियों को पार किया जाए और महिलाओं को उनकी उचित भागीदारी दी जाए।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले 30 वर्षों में इस मुद्दे को बार-बार टाला गया और हर बार कोई न कोई तकनीकी कारण देकर इसे आगे बढ़ाया गया। उन्होंने इसे एक “ऐतिहासिक गलती” बताया और कहा कि अब इसे सुधारने का समय है। उन्होंने कहा कि आज देश की महिलाएं अधिक जागरूक और मुखर हैं और वे नीति निर्माण में अपनी भूमिका चाहती हैं। ऐसे में संसद का यह दायित्व है कि वह उनकी इस आकांक्षा को पूरा करे।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दे केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश की राजनीति, समाज और लोकतांत्रिक संरचना से गहराई से जुड़े हुए हैं। जहां एक ओर यह महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है, वहीं दूसरी ओर यह राजनीतिक समीकरणों को भी बदल सकता है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि संसद का यह विशेष सत्र केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण है, जो आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति और समाज की दिशा तय कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश कि किसी के साथ अन्याय नहीं होगा और महिलाओं को उनका अधिकार मिलेगा, इस पूरे विमर्श का केंद्र बन गया है। अब यह देखना होगा कि सदन में आगे क्या होता है और क्या यह बिल उसी रूप में पारित होता है, जैसा सरकार चाहती है, या इसमें विपक्ष की चिंताओं को भी शामिल किया जाता है।




























