यह शाम यूनाइटेड स्टेट की राजधानी वॉशिंगटन में 6:32 बजे की थी। घड़ी की सुइयां तेजी से उस समय सीमा की ओर बढ़ रही थीं, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तय किया था। केवल 90 मिनट बाकी थे, और दुनिया एक ऐसे सैन्य हमले की आशंका से कांप रही थी, जो ईरान के बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता था। पुल, ऊर्जा संयंत्र और जल आपूर्ति प्रणाली संभावित निशाने पर थे। हालात इतने तनावपूर्ण थे कि वैश्विक स्तर पर एक बड़े युद्ध की आशंका गहराती जा रही थी।
लेकिन इसी तनाव के चरम पर एक ऐसा संदेश सामने आया जिसने युद्ध की दिशा ही बदल दी। डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक घोषणा की कि अमेरिका अगले दो हफ्तों के लिए ईरान पर प्रस्तावित बमबारी और सैन्य कार्रवाई को रोक देगा। हालांकि इसके लिए एक शर्त रखी गई, ईरान को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज को “पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित” तरीके से खोलना होगा। इस एक घोषणा ने तेजी से बिगड़ते हालात को थाम लिया और युद्ध की ओर बढ़ रहे कदमों को रोक दिया।
यह फैसला उस दिन आया जब ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है। उन्होंने रात 8 बजे (ईस्टर्न टाइम) की डेडलाइन तय की थी, जिससे कूटनीतिक हलकों में अफरा-तफरी मच गई थी। दुनियाभर के राजनयिक और मध्यस्थ आखिरी समय में किसी समाधान की तलाश में जुट गए थे।
आखिरी समय की कूटनीति ने बदला खेल
पर्दे के पीछे एक बेहद तेज और संवेदनशील कूटनीतिक प्रयास चल रहा था। शहबाज़ शरीफ़ ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप से अपील की कि वे डेडलाइन को टालें और दो हफ्ते का समय दें ताकि बातचीत का रास्ता निकल सके। साथ ही उन्होंने ईरान से भी अपील की कि वह इस अवधि में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोल दे, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सके।
यह प्रस्ताव जल्द ही एक संभावित समझौते के रूप में सामने आया। ईरान पहले ही मध्यस्थों के जरिए एक 10 सूत्रीय प्रस्ताव भेज चुका था, जिसमें प्रतिबंधों में राहत, जमे हुए फंड्स की वापसी और क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी जैसी बड़ी मांगें शामिल थीं। शुरुआत में अमेरिका ने इस प्रस्ताव को अपर्याप्त बताया, लेकिन इसमें एक अहम बिंदु था, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों को गुजरने देने की अनुमति।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इसका खुलना तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
ईरान ने भी दिखाई नरमी, लेकिन शर्तों के साथ
ट्रंप की घोषणा के तुरंत बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने प्रतिक्रिया दी, उन्होंने कहा कि अगर ईरान पर हमले बंद होते हैं तो उनकी सेना भी अपनी “रक्षात्मक कार्रवाई” रोक देगी। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि अगले दो हफ्तों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित मार्ग दिया जाएगा, हालांकि यह ईरानी सेना के समन्वय में होगा।
ईरान ने इस युद्धविराम को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया। उनका कहना था कि अमेरिका ने उनके प्रस्ताव के ढांचे को स्वीकार कर लिया है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच अब भी कई मतभेद बने हुए हैं। उदाहरण के लिए, फारसी भाषा में जारी प्रस्ताव में ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को मान्यता देने की बात कही गई है, जबकि अंग्रेजी संस्करण में यह उल्लेख नहीं है।
वैश्विक बाजारों ने ली राहत की सांस
इस अचानक हुए युद्धविराम का असर तुरंत वैश्विक बाजारों पर दिखा। तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने का खतरा कम हो गया। अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतें आधे घंटे में ही 9% तक गिर गईं और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट लगभग 96 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया।
इसके अलावा शेयर बाजारों में भी तेजी देखी गई। निवेशकों ने राहत की सांस ली, क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों से बढ़ते तनाव के कारण अनिश्चितता बनी हुई थी।
जमीन पर जारी रहा तनाव
हालांकि युद्धविराम की घोषणा हो चुकी थी, लेकिन जमीन पर हालात तुरंत शांत नहीं हुए। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की ओर से Israel और खाड़ी देशों की दिशा में मिसाइलें दागी गईं, यहां तक कि सीजफायर लागू होने के बाद भी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह देरी ईरान की विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना के कारण हो सकती है, जहां केंद्रीय आदेशों को जमीनी स्तर तक पहुंचने में समय लगता है।
इजरायल, जो कुछ घंटे पहले तक ईरान के ठिकानों पर हमले कर रहा था, अंततः अमेरिका के फैसले के बाद सीजफायर के लिए सहमत हो गया।
इस्लामाबाद में तय होगा भविष्य
अब इस दो हफ्तों के युद्धविराम के दौरान इस्लामाबाद में बातचीत होने की संभावना है। पाकिस्तान ने 10 अप्रैल को दोनों देशों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। यह बैठक तय करेगी कि यह अस्थायी युद्धविराम स्थायी शांति में बदल सकता है या नहीं।
फिलहाल यह साफ है कि यह सीजफायर केवल तत्काल संकट को टालने में सफल रहा है, लेकिन असली मुद्दे अब भी जस के तस हैं। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल हैं।
टला संकट, लेकिन खत्म नहीं हुआ खतरा
दुनिया ने महज 90 मिनट पहले एक बड़े युद्ध के मुहाने से खुद को पीछे खींच लिया। लेकिन यह केवल एक अस्थायी राहत है। आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि क्या यह शांति कायम रह पाएगी या फिर यह केवल एक और बड़े टकराव से पहले का विराम है।
यह घटनाक्रम न केवल कूटनीति की ताकत को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिक वैश्विक राजनीति में हर फैसला कितनी तेजी से हालात बदल सकता है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस दो हफ्तों के भीतर क्या कोई स्थायी समाधान निकल पाता है या दुनिया फिर से युद्ध के कगार पर पहुंच जाती है।





























