भोजशाला: इतिहास, आस्था और साक्ष्यों के बीच उभरता सत्य

भोजशाला इस सत्य का जीवंत उदाहरण है कि यह भारत की स्मृति शक्ति, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक सहिष्णुता का प्रतीक है। पिछले लगभग 120 वर्षों से हिंदू समाज और इतिहासकार इस सत्य की पुनर्पुष्टि हेतु प्रयासरत रहे।

भोजशाला

कोर्ट के आदेशों के बाद अब लंदन के म्यूजियम में मौजूद मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने के प्रयास भी तेज हुए हैं

हाल ही में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच ने धार स्थित भोजशाला के विवाद को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। इस निर्णय में हिंदू पक्ष को विजय मिली है। भोजशाला इस सत्य का जीवंत उदाहरण है कि यह भारत की स्मृति शक्ति, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक सहिष्णुता का प्रतीक है। पिछले लगभग 120 वर्षों से हिंदू समाज और इतिहासकार इस सत्य की पुनर्पुष्टि हेतु प्रयासरत रहे। न्यायिक प्रक्रिया, वैज्ञानिक समर्पण और सांस्कृतिक स्मृति, इन तीनों ने मिलकर इस क्षण को विजयी बनाया है।

जहाँ तक इतिहास की बात है तो भोजशाला का इतिहास मालवा के परमार सम्राट ‘भोज’ की उस दूरदर्शी सांस्कृतिक दृष्टि से आरंभ होता है, जिसने 11वीं सदी के ‘धार’ को एक अद्वितीय विद्यापीठ में रूपांतरित किया। ‘भोजप्रबंध’, ‘प्रबंधचिंतामणि’ तथा ‘मेरुतुङ्ग’ जैसे प्राचीन साहित्यिक ग्रंथ इस परिसर को “सरस्वती पीठ”, “विद्या गृह” और “काव्य सभा” का स्थान बताते हैं। यह वह युग था, जब संस्कृत, नाट्य, शिल्प, ज्योतिष और व्याकरण का स्वर्ण प्रवाह धार में उमड़ता था। परंपरा और ग्रंथ साक्ष्य दोनों यह स्पष्ट करते हैं कि 1034-1055 ईस्वी के बीच यह स्थान ‘वाग्देवी’ उपासना और उच्च विद्याओं का केंद्रीय केंद्र था।

वास्तु रूपों में भी इस्लाम पूर्व के इतिहास की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। परिसर में आज विद्यमान सौ से अधिक शिलास्तंभ, जिन पर कुंभ, कलश, गजथर, मकरथर और पद्मदल जैसे विशुद्ध हिन्दू मंदिर शिल्प उकेरे हुए हैं, यह प्रमाणित करते हैं कि यह मूल रूप से एक प्रतिष्ठित ‘देवी मंदिर’ था। इन स्तंभों पर अंकित संस्कृत, नागरी और शारदा लिपियाँ 11वीं-12वीं सदी के काल निर्देशों से मेल खाती हैं। गर्भगृह दिशा में मिली योनिपट्ट, अधिष्ठान पीठ और एक भग्न प्रतिमा खंड यह पुष्टि करते हैं कि यहाँ ‘वाग्देवी सरस्वती’ की प्रतिष्ठा रही है। कई ब्रिटिशकालीन सर्वेक्षण विवरणों, विशेषकर कनिंघम और बर्गेस के प्रतिवेदनों में भी इसे “शास्त्रीय हिन्दू मंदिर के अवशेषों से निर्मित” स्थान बताया गया है।

समय के साथ राजनीतिक परिवर्तन आए और 14वीं सदी में इस परिसर का आंशिक रूपांतरण हुआ। कुछ दीवारों पर उकेरी गई अरबी-फारसी लेखन और मिहराब जैसी संरचनाएँ उस काल की पहचान अवश्य देती हैं, किंतु विशेषज्ञों की दृष्टि में यह कोई सुव्यवस्थित नई इस्लामी इमारत नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती मंदिर की संशोधित उपयोगिता के रूप में रचित संरचना थी। स्तंभों का उल्टा-सीधा प्रयोग, वास्तु खंडों का पुनर्संयोजन और गर्भगृह रूपांकन की अवशिष्ट रेखाएँ इस तथ्य को और स्पष्ट करती हैं।

अभिलेखीय प्रमाणों में संस्कृत-नागरी के चालीस से अधिक शिलालेख मिलते हैं, जिनमें सरस्वती वन्दना, काव्य श्लोक, दान विधान और गुरुकुल संबंधी विवरण अंतर्निहित हैं। इसके विपरीत फारसी के कुछ अभिलेख इस स्थान को “मकान मौला” या “कमाल मौला” के रूप में संबोधित करते हैं तथा यह स्वीकारते हैं कि यह “पुरानी इमारत” के पत्थरों से निर्मित है। दोनों तरह के अभिलेख मिलकर यह ऐतिहासिक चित्र रचते हैं कि मूल संरचना उच्च ‘संस्कृत विद्या’ और ‘देवी उपासना’ का केंद्र थी, जिसे बाद की सत्ता ने पुनः उपयोग में लिया।

इसी समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच हाल के वर्षों में यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन गया कि इस धरोहर की मूल पहचान की सत्यापित पुनर्स्थापना कैसे हो? इस संदर्भ में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच द्वारा दिया गया निर्णय अत्यंत ऐतिहासिक और व्यापक प्रभाव वाला माना जा रहा है। न्यायालय ने पुरातात्त्विक, अभिलेखीय, वास्तुशिल्पीय और ऐतिहासिक साक्ष्यों की गहन समीक्षा करते हुए यह रेखांकित किया कि भोजशाला का चरित्र किसी एक कालखंड का परिणाम नहीं है, बल्कि यह परमारकालीन विद्या परंपरा का उज्ज्वल अवशेष है, जिसकी प्रमाणिकता भारतीय और ब्रिटिशकालीन सर्वेक्षण रिपोर्टों में एकमत रूप से स्थापित होती है। न्यायालय ने यह भी माना कि इस स्थल की मूल पहचान का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन राष्ट्रीय धरोहरों के संरक्षण के व्यापक सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण वर्षों से व्यवस्थित रूप से संचालित करता आया है।

इस निर्णय का समाज में अत्यंत सकारात्मक, भावनात्मक और उत्सव सदृश स्वागत हुआ। विद्या, संस्कृति और परंपरा से गहरे जुड़े नागरिकों ने इसे “इतिहास के न्याय का क्षण” कहा। धार, इंदौर, उज्जैन और मालवा के अनेक नगरों में लोगों ने दीप प्रज्वलन, पुष्प वर्षा और सांस्कृतिक यात्राओं के माध्यम से इस निर्णय का स्वागत किया। शिक्षण संस्थानों, परंपरागत विद्या पीठों, वेद पाठशालाओं और सांस्कृतिक संगठनों ने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा के सम्मान और पुनर्जीवन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम बताया। विशेष रूप से युवा पीढ़ी में यह भावना देखी गई कि न्यायपालिका ने इतिहास, ज्ञान और सत्य पर आधारित निर्णय देकर सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूती प्रदान की है।

यह स्वागत केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था; यह इसलिए भी व्यापक था क्योंकि लोगों ने महसूस किया कि सदियों पुरानी विद्या परंपरा का पुनर्स्मरण मात्र आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान चेतना की निरंतरता का विषय है। भोजशाला का निर्णय इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना गया कि उसने इतिहास को न तो शत्रुता के कोण से देखा, न राजनीतिक व्याख्या के संकुचित दायरों से, बल्कि ठोस साक्ष्यों पर आधारित, अध्ययन प्रधान और शास्त्रीय दृष्टि से मूल्यांकन करते हुए मूल सत्य को सम्मान दिया।

इस निर्णय के बाद भोजशाला को लेकर नई ऊर्जा और शोध उत्साह दिखाई दे रहा है। पुरातात्त्विक अध्ययन, लिपि विश्लेषण, शिल्प तुलना और सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या के नए द्वार खुल रहे हैं। अनेक विद्वान इसे भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता को पुनर्स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। भोजशाला अब केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान भारतीय समाज के सांस्कृतिक स्वाभिमान और ज्ञान संस्कार का प्रतीक बनकर पुनः उभर रही है, एक ऐसा स्थल जहाँ सभ्यता के विभिन्न कालखण्डों की परतें मिलकर हमें यह सिखाती हैं कि इतिहास के मूल स्वर को संरक्षित रखना ही किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक परिपक्वता का प्रमाण है।

Exit mobile version