भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर बने हिंद महासागर की सबसे बड़ी ताकत, दुश्मनों के लिए क्यों हैं बड़ी चुनौती?

भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप (CBG) कोई कमजोर लक्ष्य नहीं, बल्कि समुद्र में चलने वाला एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच है। यह खुले समुद्र को एक तरह के “चलते-फिरते किले” में बदल देता है।

भारतीय एयरक्राफ्ट

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति की अराजक दुनिया में हर देश सबसे पहले अपने अस्तित्व और सुरक्षा की चिंता करता है। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देश शक्ति संतुलन और सैन्य क्षमता बढ़ाने पर जोर देते हैं। आज के समय में नौसैनिक शक्ति को लेकर एक बड़ी बहस चल रही है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि एयरक्राफ्ट कैरियर अब पुराने और कमजोर हो चुके हैं, क्योंकि उन्हें जमीन से दागी जाने वाली एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) मिसाइलों से आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। लेकिन यह सोच हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) की वास्तविक रणनीतिक स्थिति को सही तरीके से नहीं समझती।

असल में भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप (CBG) कोई कमजोर लक्ष्य नहीं, बल्कि समुद्र में चलने वाला एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच है। यह खुले समुद्र को एक तरह के “चलते-फिरते किले” में बदल देता है।

भूगोल युद्ध की रणनीति में बहुत अहम भूमिका निभाता है। समुद्र में लंबी दूरी तय करने के साथ किसी भी नौसेना की ताकत और आपूर्ति क्षमता कमजोर होने लगती है। हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी दुश्मन देश को अपने व्यापार मार्गों और नौसैनिक ताकत की रक्षा के लिए हजारों किलोमीटर दूर तक आना पड़ता है। उसे मलक्का जलडमरूमध्य जैसे संकरे रास्तों से गुजरना पड़ता है। युद्ध की स्थिति में उसके पास इस क्षेत्र में भरोसेमंद बंदरगाह या जमीनी समर्थन नहीं होता।

इसका मतलब है कि दुश्मन की नौसेना को लंबी और कमजोर सप्लाई लाइन के सहारे अकेले काम करना पड़ता है। बिना मजबूत लॉजिस्टिक सपोर्ट और हवाई सुरक्षा के समुद्र में ताकत दिखाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

वहीं भारत को अपने क्षेत्र में “होम ग्राउंड एडवांटेज” मिलता है। भारतीय नौसेना INS Vikramaditya और INS Vikrant जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर का उपयोग समुद्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए करती है। अकेला एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ा पूरा कैरियर बैटल ग्रुप असली ताकत बनता है। इसमें कोलकाता क्लास डेस्ट्रॉयर, तलवार क्लास फ्रिगेट और फ्लीट टैंकर जैसे युद्धपोत शामिल होते हैं।

हाल ही में “मिलन 2024” जैसे नौसैनिक अभ्यासों में भारतीय नौसेना ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर को एक साथ संचालित करने की क्षमता दिखाई। इसका मतलब है कि भारत विशाल समुद्री क्षेत्र में प्रभावी तरीके से नियंत्रण स्थापित कर सकता है।

एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र में एक मोबाइल एयरबेस और कमांड सेंटर की तरह काम करता है। इससे उड़ान भरने वाले MiG-29K लड़ाकू विमान हवाई सुरक्षा, दुश्मन जहाजों पर हमला और निगरानी विमान की रक्षा करते हैं। Ka-31 हेलीकॉप्टर लंबी दूरी तक रडार चेतावनी देते हैं, जबकि P-8I विमान दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने और नष्ट करने का काम करते हैं।

कमजोर देश अक्सर “सी डिनायल” रणनीति के तहत पनडुब्बियों का इस्तेमाल करते हैं। पनडुब्बियां जहाजों को डुबो सकती हैं, लेकिन वे समुद्र पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकतीं और न ही अपने जहाजों को हवाई हमलों से बचा सकती हैं।

फॉकलैंड युद्ध इसका बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस युद्ध में ब्रिटिश पनडुब्बियों और एयरक्राफ्ट कैरियर टास्क फोर्स ने मिलकर ऐसा सुरक्षा क्षेत्र बनाया कि अर्जेंटीना की नौसेना पीछे हटने को मजबूर हो गई। भारतीय नौसेना इसी रणनीति को और बड़े स्तर पर लागू करने की क्षमता रखती है।

भारतीय युद्धपोतों पर लगे बराक-8 मिसाइल सिस्टम दुश्मन की मिसाइलों को दूर से ही मार गिराने में सक्षम हैं। इसके बाद MiG-29K लड़ाकू विमान आसमान पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं और दुश्मन की पनडुब्बियों व जहाजों पर हमले करते हैं।

रणनीतिक रूप से देखा जाए तो बिना मजबूत सप्लाई लाइन और हवाई सुरक्षा के कोई भी नौसेना युद्ध नहीं जीत सकती। हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय कैरियर स्ट्राइक ग्रुप दुश्मन देशों की जमीन आधारित सैन्य बढ़त को लगभग खत्म कर देता है। इससे विरोधी देशों को भारत के प्रभाव वाले क्षेत्र में हजारों किलोमीटर दूर जाकर लड़ना पड़ता है, जहां भारतीय नौसेना और वायु शक्ति को स्पष्ट बढ़त हासिल रहती है।

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