बच्चे आपके, संस्कार किसके?

बच्चे आपके हैं, उनका भविष्य भी आपका है, लेकिन उनके संस्कार किसके होंगे, इसका निर्णय आज आपको करना है।

बच्चे आपके, संस्कार किसके?

हाल ही में एक पुस्तक पढ़ी, जिसका शीर्षक है “जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।” पुस्तक में विकसित भारत 2047 के परिप्रेक्ष्य में युवाओं की संभावित भूमिका को लेकर सूत्ररूप में संदेश देने का प्रयास किया गया है। पुस्तक का शीर्षक ही एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने रखता है कि यदि जवानी सही दिशा में चलेगी तो जमाना भी उसी दिशा में चलेगा और यदि जवानी भटक गई तो उसका प्रभाव केवल आज पर नहीं, बल्कि भविष्य के भारत पर भी पड़ेगा।

यहीं से एक दूसरा प्रश्न भी उठता है कि बच्चे आपके हैं, लेकिन उनके संस्कार किसके हैं? आज की दुनिया रील्स की दुनिया बन गई है और बड़ी तेजी से बदल रही है। मोबाइल, इंटरनेट, रील्स, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। तकनीक अपने आप में न अच्छी है, न बुरी। प्रश्न उसके उपयोग और उसके प्रभाव का है।

जिस आयु में बच्चे की बौद्धिक और चरित्र की नींव मजबूत होनी चाहिए, उस आयु में सोशल मीडिया उसकी डिजिटल दुनिया का शिक्षा से बड़ा हिस्सा बन चुका है। प्रश्न यह नहीं है कि बच्चे मोबाइल चला रहे हैं या नहीं। असली प्रश्न यह है कि वे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं, किसे अपना आदर्श मान रहे हैं और जो कुछ देख रहे हैं, उसे समझने तथा सही-गलत में अंतर करने की क्षमता उनके भीतर कितनी है। आज किसी बच्चे के हाथ में मोबाइल देखकर केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह बिगड़ रहा है, बल्कि हमें यह भी देखने की जरूरत है कि उसे दिशा कौन दे रहा है? वह किससे प्रभावित है? वह किसे फॉलो कर रहा है?

बच्चों के संस्कारों की चर्चा करते समय विद्यालयों को जिम्मेदार ठहराना आसान है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि विद्यालय शिक्षा दे सकता है, शिक्षक मार्गदर्शन दे सकता है, समाज वातावरण बना सकता है, लेकिन बच्चे के व्यक्तित्व की पहली पाठशाला परिवार ही है। ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि अब बच्चों के जीवन में परिवार की भूमिका गौण होती जा रही है।

आज सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना अपने आप में उपलब्धि समझा जाने लगा है। कुछ सेकंड की रील किसी को भी रातोंरात प्रसिद्ध अर्थात् सेलेब्रिटी बना सकती है। यहाँ तक कि पैसा भी अर्जित करा सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब प्रसिद्धि स्वयं लक्ष्य बन जाती है और उसके लिए मर्यादा, भाषा और विवेक को पीछे छोड़ दिया जाता है। हाल ही में सस्ती लोकप्रियता के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर बच्चों और युवाओं का अमर्यादित व्यवहार और असभ्य भाषा के वीडियो दुनिया ने देखे हैं।

किसी आन्दोलन, धरने या सार्वजनिक प्रदर्शन में जाना अपने आप में गलत नहीं है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति और अभिव्यक्ति का अधिकार महत्त्वपूर्ण है। लेकिन यदि किसी सार्वजनिक गतिविधि का उद्देश्य मुद्दे से अधिक कैमरे के सामने आना, वायरल होना, अपशब्द बोलना या भीड़ के व्यवहार की नकल करना और फिर बाद में माफीनामा के वीडियो बनाना बन जाये, तो हमें ठहरकर सोचना चाहिए।

विशेष चिंता तब होती है जब इस वातावरण का प्रभाव स्कूली बच्चों तक पहुँचने लगे। किसी भी विचार, संगठन या आन्दोलन से जुड़े व्यक्ति को बच्चों से संवाद करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन बच्चों को राजनीतिक या वैचारिक प्रभाव में लेने से पहले उनकी उम्र, मानसिक परिपक्वता और सुरक्षा को ध्यान में रखना आवश्यक है। सरकारी विद्यालयों की सुविधाएँ बेहतर होनी चाहिए। शिक्षक उपलब्ध हों, भवन सुरक्षित हों, शौचालय और पेयजल की व्यवस्था हो, पुस्तकालय और खेल की सुविधाएँ हों, डिजिटल संसाधन हों और शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो, यह सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है और उस पर लगातार काम होना चाहिए। लेकिन स्कूल सुधार का प्रश्न और बच्चों के राजनीतिक अथवा वैचारिक उपयोग का प्रश्न दो अलग-अलग विषय हैं।

यदि किसी विद्यालय में समस्या है तो उसका समाधान प्रशासन से माँगा जाना चाहिए। जनप्रतिनिधियों से प्रश्न किया जाना चाहिए। शिक्षा विभाग से जवाब माँगा जाना चाहिए। अभिभावकों को संगठित होकर अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन बच्चे किसी भी राजनीतिक संघर्ष के उपकरण न बनें, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

आज माता-पिता के सामने चुनौती पहले से कहीं बड़ी है। पहले बच्चे के संपर्क में आने वाली दुनिया अपेक्षाकृत सीमित थी। आज एक स्मार्टफोन के माध्यम से दुनिया का कोई भी विचार, कोई भी वीडियो, कोई भी व्यक्ति और कोई भी प्रवृत्ति कुछ सेकंड में उसके सामने आ सकती है। इसलिए केवल मोबाइल छीन लेना समाधान नहीं है। बच्चे को डिजिटल विवेक देना माता-पिता का पहला कर्तव्य बन गया है।

उसे यह सिखाना होगा कि हर वायरल वीडियो सत्य नहीं होता। हर लोकप्रिय व्यक्ति आदर्श नहीं होता। हर नारा सही नहीं होता। भीड़ में शामिल होना और सही होना एक ही बात नहीं है। किसी के कहने मात्र से किसी के विरुद्ध अपशब्द बोलना साहस नहीं है। असहमति व्यक्त करना लोकतंत्र है, लेकिन असहमति के नाम पर मर्यादा छोड़ देना लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी है।

हम अक्सर पूछते हैं कि सरकार क्या कर रही है? हम यह भी पूछते हैं कि विद्यालय क्या कर रहा है? लेकिन अब जरूरी प्रश्न और हैं, जो सबसे पहले घर में पूछे जाने चाहिए और वे प्रश्न हैं:

भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या है। यह हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है और यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है। यदि यह पीढ़ी ज्ञान, कौशल, अनुशासन, चरित्र, विज्ञान, उद्यम, राष्ट्रबोध और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ती है तो विकसित भारत 2047 केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक वास्तविकता बन सकता है। लेकिन यदि इस पीढ़ी की ऊर्जा नशे, हिंसक भाषा, अराजकता, अंधानुकरण, डिजिटल लत और क्षणिक प्रसिद्धि की दौड़ में खप गई तो नुकसान केवल एक बच्चे का नहीं होगा, बल्कि नुकसान एक परिवार का होगा, फिर एक समाज का होगा और अंततः भारत का होगा।

इसलिए आज हर माता-पिता और अभिभावक के लिए आवश्यकता बच्चों को डराने की नहीं, उन्हें समझने की है। उन्हें रोकने की नहीं, सही दिशा देने की है। उन्हें हर विचार से दूर रखने की नहीं, बल्कि हर विचार को परखने का विवेक देने की है। बच्चों को केवल सफल बनाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें संस्कारी, विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना भी आवश्यक है। क्योंकि आने वाला भारत संसद में नहीं, केवल सरकारों के निर्णयों से नहीं, बल्कि आज के घरों में तैयार हो रहा है। आज हम अपने बच्चों को जो दिखाएँगे, जो सिखाएँगे और जिस व्यवहार का उदाहरण उनके सामने रखेंगे, वही कल समाज में दिखाई देगा।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि “जिस ओर जवानी चलेगी, उस ओर जमाना चलेगा।” बल्कि आज हमें यह भी पूछना होगा कि “जवानी किस दिशा में जाएगी, यह तय कौन करेगा?” और इसका उत्तर सरकार से पहले परिवार के पास है, माता-पिता के पास है। बच्चे आपके हैं, उनका भविष्य भी आपका है, लेकिन उनके संस्कार किसके होंगे, इसका निर्णय आज आपको करना है। नारायणायेती समर्पयामि……

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