एक चक्रवात का असर खत्म भी नहीं हुआ कि दूसरा तूफान समुद्र में तैयार हो गया। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान अर्नब ने आंध्र प्रदेश के तट को प्रभावित किया। इसके कुछ ही दिनों बाद बंगाल की खाड़ी में एक और सिस्टम विकसित हुआ, जो चक्रवात मुरासु में बदल गया। 2 नवंबर 2026 को मुरासु गंभीर चक्रवाती तूफान की श्रेणी में पहुंच चुका है। IMD ने आंध्र प्रदेश और उत्तरी तमिलनाडु के तटीय इलाकों के लिए रेड अलर्ट जारी किया है।
लगातार दो चक्रवाती सिस्टम आने से सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में चक्रवातों की संख्या बढ़ रही है? क्या समुद्र का तापमान बढ़ने से तूफान ज्यादा ताकतवर हो रहे हैं? और क्या भारत के पूर्वी तट को आने वाले वर्षों में ज्यादा चक्रवातों का सामना करना पड़ेगा? इसका जवाब समझने के लिए मौसम विभाग के 130 साल से ज्यादा के रिकॉर्ड और हालिया वैज्ञानिक शोध को देखना जरूरी है।
1. पहले समझिए, मुरासु और अर्नब कितने करीब आए?
अर्नब ने 28 अक्टूबर 2026 को आंध्र प्रदेश के तट पर दस्तक दी थी। IMD के मुताबिक, लैंडफॉल के दौरान इसकी अधिकतम निरंतर हवा की रफ्तार 125-135 किलोमीटर प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 150 किलोमीटर प्रति घंटा तक थी।
इसके बाद 1 नवंबर को बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम-मध्य हिस्से में बना सिस्टम चक्रवाती तूफान मुरासु में बदल गया। 2 नवंबर को यह गंभीर चक्रवाती तूफान बन गया। IMD के पूर्वानुमान के मुताबिक, इसका दक्षिण आंध्र प्रदेश के तट पर असर पड़ने की आशंका थी।
इस तरह कुछ ही दिनों के अंतराल में एक ही समुद्री क्षेत्र में दो शक्तिशाली सिस्टम सक्रिय हुए। लेकिन क्या ऐसा पहले बार नहीं हुआ है ।
भारत में पहले भी आए हैं एक के बाद एक चक्रवात
भारत के चक्रवात इतिहास में 2013 इसका बड़ा उदाहरण है। उस साल बंगाल की खाड़ी में अक्टूबर से दिसंबर के बीच लगातार कई शक्तिशाली सिस्टम विकसित हुए।
- फाइलिन (अक्टूबर 2013): 12 अक्टूबर को ओडिशा के गोपालपुर के पास लैंडफॉल किया। यह बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान था।
- हेलन (नवंबर 2013): 22 नवंबर को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम के दक्षिण में तट पार किया।
- लेहर (नवंबर 2013): 28 नवंबर को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम के पास पहुंचा।
- माडी (दिसंबर 2013): दिसंबर में बंगाल की खाड़ी में विकसित हुआ और आगे कमजोर पड़ गया।
IMD के मुताबिक, 2013 के पोस्ट-मानसून सीजन में छह तीव्र निम्न दबाव वाले सिस्टम बने। इनमें तीन बेहद गंभीर चक्रवाती तूफान और एक गंभीर चक्रवाती तूफान था। उस साल उत्तर हिंद महासागर में चक्रवातों की कुल ऊर्जा भी 1990-2012 के मुकाबले सबसे अधिक दर्ज की गई थी।
यानी अर्नब और मुरासु का लगातार आना कोई पहली घटना नहीं है। 2013 में भी बंगाल की खाड़ी ने एक के बाद एक शक्तिशाली सिस्टम देखे थे। एक और उदाहरण 2021 का है। मई में अरब सागर में चक्रवात ताउते सक्रिय हुआ, जबकि कुछ ही दिनों बाद बंगाल की खाड़ी में यास ने दस्तक दी। उसी साल सितंबर-अक्टूबर में गुलाब और शाहीन जैसे सिस्टम भी बने।
130 साल का डेटा क्या बताता है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के चक्रवात संबंधी मानक संचालन दस्तावेज में 1891 से 2019 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इस डेटा के मुताबिक:
- भारत के आसपास उत्तर हिंद महासागर में हर साल औसतन 12.4 चक्रवाती गतिविधियां यानी डिप्रेशन और उससे ऊपर के सिस्टम बनते हैं।
- इनमें से औसतन 5.2 सिस्टम चक्रवाती तूफान या उससे अधिक ताकतवर श्रेणी तक पहुंचते हैं।
- सालाना चक्रवाती गतिविधियों की संख्या अलग-अलग वर्षों में 8 से 23 तक रही है।
- 1893, 1926 और 1930 में एक-एक साल के दौरान 10 चक्रवाती तूफान दर्ज किए गए थे।
यहां एक अहम बात समझनी होगी। हर चक्रवाती गतिविधि तूफान नहीं होती। मौसम विभाग डिप्रेशन, डीप डिप्रेशन, साइक्लोनिक स्टॉर्म और गंभीर चक्रवातों को अलग-अलग श्रेणियों में रखता है। इसलिए चक्रवातों की संख्या की तुलना करते समय यह देखना जरूरी है कि हम सभी मौसमी सिस्टम की बात कर रहे हैं या केवल नाम वाले चक्रवाती तूफानों की।
4. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में क्या अंतर है?
भारत के दोनों समुद्री क्षेत्रों में चक्रवात बनने की प्रवृत्ति अलग-अलग है। IMD के 1965-2020 के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर हिंद महासागर में सालाना औसतन करीब 10 चक्रवाती गतिविधियां और 5 उष्णकटिबंधीय चक्रवात विकसित होते हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि बंगाल की खाड़ी में अरब सागर के मुकाबले ज्यादा चक्रवाती गतिविधियां होती हैं। IMD के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में मानसून के दौरान बनने वाले डिप्रेशन और दक्षिण चीन सागर से आने वाले सिस्टम भी इसकी वजह हैं। वहीं अरब सागर के पश्चिमी हिस्से में अपेक्षाकृत ठंडे समुद्री पानी के कारण चक्रवात बनने की संभावना कम रहती है।
एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाले 60 फीसदी से ज्यादा चक्रवात भारत के पूर्वी तट के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित करते हैं। लगभग 30 फीसदी बांग्लादेश और म्यांमार के तटों की तरफ जाते हैं, जबकि शेष समुद्र में ही कमजोर पड़ जाते हैं।
क्या चक्रवातों की संख्या सचमुच बढ़ रही है?
IMD के 1965-2020 के आंकड़ों में बंगाल की खाड़ी के ऊपर सभी श्रेणियों के चक्रवाती सिस्टम की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट का रुझान दर्ज किया गया है। इसके उलट अरब सागर में गंभीर और उससे ज्यादा शक्तिशाली चक्रवातों की संख्या में बढ़ोतरी का रुझान देखा गया है। यानी भारत के आसपास हर समुद्री क्षेत्र में चक्रवातों की संख्या एक जैसी नहीं बढ़ रही है।
2025 में PLOS Climate जर्नल में प्रकाशित भारत के जलवायु परिवर्तन पर एक शोध में भी यही अंतर सामने आया। शोध के अनुसार, पिछले चार दशकों में अरब सागर में चक्रवातों की आवृत्ति, अवधि और तीव्रता बढ़ी है, जबकि बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की आवृत्ति में मामूली गिरावट का रुझान रहा है। इसके मायने है कि अर्नब और मुरासु जैसी लगातार घटनाओं को पूरे देश में चक्रवातों की संख्या बढ़ने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फिर चक्रवात ज्यादा ताकतवर क्यों हो रहे हैं? समुद्र का तापमान कितना बढ़ा?
इसका एक बड़ा कारण समुद्र का बढ़ता तापमान है। चक्रवात को विकसित होने और ताकत हासिल करने के लिए गर्म समुद्री पानी से ऊर्जा मिलती है। समुद्र की सतह से वाष्पीकरण होता है। यह नमी ऊपर जाकर संघनित होती है और इससे निकलने वाली ऊर्जा तूफान को और मजबूत बनाने में मदद करती है।
2025 के PLOS Climate शोध के मुताबिक:
- 1950 के बाद से उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर का तापमान हर दशक औसतन 0.12 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है।
- अरब सागर में चक्रवात बनने से जुड़ा समुद्री सतह का तापमान पिछले चार दशकों में 1.2 से 1.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा है।
- 1982 से 2019 के बीच अरब सागर में प्री-मानसून चक्रवातों की अधिकतम तीव्रता में करीब 40 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई।
- पोस्ट-मानसून सीजन में अरब सागर के चक्रवातों की तीव्रता में करीब 20 फीसदी बढ़ोतरी देखी गई।
इसका मतलब यह है कि समुद्र का गर्म होना केवल चक्रवात बनने की परिस्थितियों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि पहले से बने सिस्टम के तेजी से मजबूत होने की संभावना भी बढ़ा सकता है।
क्या क्लाइमेट चेंज ही इसकी वजह है?
जलवायु परिवर्तन को चक्रवातों के बदलते व्यवहार का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। लेकिन हर चक्रवात को सीधे क्लाइमेट चेंज से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। सकिसी चक्रवात का बनना कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इनमें समुद्र का तापमान, वातावरण में नमी, हवा की दिशा और ऊंचाई के साथ हवा की गति में बदलाव यानी वर्टिकल विंड शियर शामिल हैं।
गर्म समुद्र और ज्यादा नमी तूफानों को अधिक ताकत दे सकते हैं। इसके अलावा समुद्र का बढ़ता जलस्तर भी तटीय इलाकों में तूफानी लहरों और बाढ़ के खतरे को बढ़ाता है।उसी 2025 के शोध के मुताबिक, 1993 से 2017 के बीच उत्तर हिंद महासागर में समुद्र का स्तर औसतन 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष बढ़ा। इस दौरान अत्यधिक समुद्री जलस्तर की घटनाओं में दो से तीन गुना वृद्धि भी दर्ज की गई। इसका मतलब है कि समान ताकत का चक्रवात भी पहले के मुकाबले ज्यादा गंभीर तटीय बाढ़ पैदा कर सकता है।
भारत के लिए आगे कितनी बड़ी चुनौती?
भारत के लिए चक्रवात कोई नई प्राकृतिक आपदा नहीं हैं। 1990 का आंध्र प्रदेश सुपर साइक्लोन, 1996 का आंध्र चक्रवात, 2013 का फाइलिन, 2014 का हुदहुद और 2020 का अम्फान इसकी गंभीरता के उदाहरण हैं।
हालांकि, मौसम की निगरानी और समय पर चेतावनी देने की क्षमता में सुधार हुआ है। IMD के अनुसार, हाल के वर्षों में बेहतर पूर्वानुमान और समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने से चक्रवातों में होने वाली मौतों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। अब किसी एक चक्रवात में मौतों की संख्या 100 से कम रखने में सफलता मिली है। लेकिन संपत्ति, कृषि, बिजली और बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान अब भी बड़ी चुनौती है।
