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पर्यावरणवादियों का विलाप हिंदुओं के त्योहारों पर ही क्यों होता है?

Nitesh Kumar Harne द्वारा Nitesh Kumar Harne
7 November 2018
in संस्कृति
हिंदू त्योहारों

PC: The Indian Express

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दीपावली उत्साह और दीयों का त्यौहार है। रौशनी का यह पर्व अँधेरे से उजाले की ओर जाने का और सकारात्मकता का त्यौहार है। त्रेतायुग में इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम लंकापति रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे और उनके सम्मान में पूरे अयोध्या राज्य को दीपों की रौशनी से सजाया गया था तबसे इस पर्व को अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में हर साल मनाया जाता है। दरअसल, ये त्यौहार सिर्फ रौशनी का ही नहीं बल्कि अधर्मियों पर धर्म की विजय के उत्साह का त्यौहार है। इस बार भी त्यौहार के कुछ दिन पहले से ही दिवाली की शुभकामनाएं भरे सन्देश आने शुरू हो गए जिसपर विचार करने की जरुरत है। ये संदेश है दीपावली में क्रैकर्स यानी पटाखे न जलाने के क्योंकि पटाखों से, वायु प्रदूषण बढ़ जाता है ऐसा इस संदेश में कहा जाता है। वैसे इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर बंदी न लगाकर 2 घंटे पटाखे जलाने की अनुमति दी है लेकिन ये संदेश केवल इसी वर्ष नही बल्कि हर वर्ष एक हफ्ते पहले से शुरू कर दिए जातें हैं। इस तरीके से सन्देश में चीजें लिखीं होती हैं कि आप इससे सहमत भी हो जातें हैं। पटाखे पर्यावरण के लिए कितने ख़राब हैं और इससे प्रदूषण होने पर कितना खतरनाक हो सकता है?

दरअसल पहली नजर में ये पर्यावरण को बचाने के लिए किया गया संदेश लगता है लेकिन जब आप ऐसे संदेशो पर गैर फरमाएंगे तो पता चलेगा ये लिबरल्स मानसिकता जनवरी के त्योहारों से शुरू होकर दिवाली तक तीव्र होने लगती है, दशहरा और दीपावली तक यह मानसिकता अपने पूरे चरम पर होती है।

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किसान सूखे से मर रहे हैं ऐसी पोस्ट दिखें तो समझ जाइये होली आने वाली है। दूध भगवान पर न चढ़ाकर गरीब बच्चों को दान करने वाली पोस्ट आने लगे तो समझ जाइए महाशिवरात्रि आने वाली है। यही लिबरल्स गैंग जब अचानक से ‘पशुओं की रक्षा करें’ जैसी पोस्ट आये तो समझ जाईये दक्षिण में जलिकट्टू है। अंत में रावण को महाज्ञानी, आदिवासियों दलितों का हितचिंतक माना जाने लगे तो दशहरा एवं पर्यावरण, वायु तथा ध्वनि प्रदूषण की बात करने लगे तो समझ जाइए दीपावली पास आ गई है। अब ऐसा ही कुछ कुछ देखने को मिल रहा है जब पिछले दस दिनों से सोशल मीडिया में दिवाली के महापर्व सम्बन्ध में संदेश, पोस्ट आने लगे हैं।

ब्राह्मण का विरोध करने वालों को दशहरे के रावण में इन्हें हीरो नजर आता है। जिन्हें पानी का वैज्ञानिक फार्मूला तक नहीं पता वो लोग भी आपको यह बतायेंगे की दिवाली के पटाखों से प्रदूषण में कितने प्रतिशत नाइट्रोजन और कार्बन होता है। अब तो ये बीमारी सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है और ये साबित कर ही देंगे की पूरे साल में पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान दीवाली के दिन फोड़े जाने वाले पटाखों से निकलने वाली गैस से ही होता है। भले इन्हें दुर्गा नवमी और राम नवमी का अंतर न पता हो लेकिन यह आपको यह बताने से नहीं चूकेंगे कि रावण क्यों महान था और ज्ञानी था। श्रीराम ने कैसे रावण पर अत्याचार किया था। इसे कहते है तथाकथित बुद्धिजीवियों की आधुनिक सोच !

करवा चौथ के एक सप्ताह पहले ये पर्यावरणवादी अचानक से नारीवादी होने लगते है। पति के लिए उपवास करना इन्हें रास नहीं आता क्योंकि ये तो पुरानी सोच है। इसे मानसिक गुलामी समझा जाने लगता है। फिर महाशिवरात्रि पर आ जाइए तो आपको यही लोग कहेंगे भगवान शंकर की पूजा तो करिए लेकिन शिवलिंग पर दूध मत चढ़ाइए| दूध चढाने से भगवान खुश नहीं होंगे बल्कि यही दूध आप गरीबों में बांट दीजिये कहकर आपको हर सिग्नल चौराहे पर बैठे गरीब भूखे बच्चों की याद दिलाई जाएगी। फिर सालभर इन्हें वो बच्चे कभी नजर नहीं आते है।

इसमें गौर करने वाली बात ये है कि सब सन्देश सिर्फ आपको सभी हिंदू त्योहारों के एक दो सप्ताह पहले से ही आना शुरू हो जाते है फिर आपको ईद, क्रिसमस, अंग्रेजी न्यू इयर, बकरी ईद, रमजान के मौके पर कभी नहीं दिखेंगे। मजेदार बात ये है की जो लोग दूध न चढाने की और पटाखे न फोड़ने की सलाह देंगे और ऐसे सन्देश भेजेंगे वही लोग आपको बकरी ईद पर बिरयानी की फ़ोटो के साथ बधाई देते हुए नजर आएंगे।

दीपावली जैसे महापर्व पर इनका ये पर्यावरण वाद प्रचंड चरम पर होता है। इन्हें साल भर जिस प्रदूषण का ख़याल नहीं आया। अचानक से दिवाली पर ऐसे लगने लगेगा मानो पूरे ब्रह्माण्ड का तापमान सिर्फ दिवाली के दिन से ही बढ़ गया हो, ओजोन की लेयर दिवाली के पटाखों से ही कमजोर हुई हो, एक दिन के ध्वनि प्रदूषण के जैसे सबके कान के परदे ही फटने वाले हो और पूरा ब्रह्माण्ड धुंआ-धुंआ हो रखा हो वरना क्रिसमस और नए साल के पटाखे तो इको-फ्रेंडली होते है। बिना धुएं और बिना आवाज के एक्स्ट्रा ऑक्सीजन छोड़ रहे होते हैं है न ? दीपावली में पटाखे न जलायें जैसी पोस्ट से सोशल मीडिया भरा पड़ा है लेकिन आप इन्हें ये नहीं पूछ सकते की सिर्फ दीपावली के पटाखों से ही क्यों प्रदूषण होता है जबकि क्रिसमस में पूरी दुनिया इससे सैकड़ों गुना ज्यादा पटाखे जलाती है क्योंकि यह तो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा माना जायेगा।

ऐसी पोस्ट करने के पीछे का इनका मकसद :

अपनी संस्कृती को खोकर कोई भी समाज या राष्ट्र अपना सम्पूर्ण विकास नहीं कर सकता और अगर किसी राष्ट्र को या समाज को तोड़ना है, तो उसकी जड़ पर यानी उसकी बरसों पुरानी संस्कृती, रीती-रिवाजों पर वार करना होता है। ठीक वैसे ही हजारों वर्षों पुराने इस राष्ट्र को विश्व गुरु बनने से रोकना हो और तोड़ना हो तो सदियों पुरानी हमारी वैज्ञानिक संस्कृती और सनातन धर्म की रीती-रिवाजों पे वार करना होगा। हिंदुओं को उनके जड़ से अलग करना होगा उन्हें उनके वैज्ञानिक धर्म, प्रथा, त्यौहार, रीती-रिवाज से अलग करना होगा। बस यही अलग करने की अगली कड़ी है जिसमें कभी पर्यावरण, कभी पानी की कमी, कभी पेड़-पौधों का वास्ता देकर भोले हिन्दुओं पर भावनात्मक अत्याचार कर उन्हें उनकी त्योहारों से दूर किया जाए ताकि आगे चलकर हिंदू अपनी ही संस्कृती का पतन होता देख खुश हो और उन्हें दिग्भ्रमित किया जाए और इससे राष्ट्र को तोड़ने का एजेंडा कामयाब हो जायेगा। इसे ही ‘फेस्टिवल शेमिंग’ भी कहा जाता है। इसे ये लिबरल्स पर्यावरणवादी प्रोग्रेसिव बता कर बरगलाते नजर आते है ताकि कूल डूड टाइप के हिंदुओं को अपने ही त्योहारों पर शर्म आने लगें।

क्या कारण हो सकता है की जिन लोगों को क्रिसमस के पटाखों से डर नहीं लगता लेकिन दीपावली के पटाखों से लगता है? न्यू इयर के पटाखे प्रदूषण नहीं फैलाते है लेकिन दिवाली के पटाखे ब्रह्माण्ड भर को प्रदूषित कर देते है। होली पानी की बर्बादी का त्यौहार लगता है लेकिन ईद पर बर्बाद पानी प्रोग्रेसिव सोच लगती है। जलिकट्टू क्रूर रिवाज लगता है, लेकिन बकरी ईद पशु प्रेमी त्यौहार माना जाता है। दही हांड़ी पर मानवाधिकार याद आने लगता है लेकिन आतंकी हमला भटके हुए नौजवान द्वारा किया गया मजाक लगता है। जब पर्यावरणवाद का चोला पहन हिंदू त्योहारों पर ही सेलेक्टिव आउटरेज हो तो संदेह होना लाजमी है।

कैसे बचें हिन्दू विरोधी, देशविरोधी ताकतों से :

हिंदुओं को पर्यावरण संतुलन का पाठ पढ़ाने वाले शायद ये नहीं जानते की ये सनातन धर्म ही है जिसमें प्रकृति को ही धर्म माना गया है, जहां धरती नदियाँ पशु और पौधों को भी मां का दर्जा दिया गया है। जहां कण-कण में शंकर है, जहां पौधों में भगवान् बसते है। जहां पेड़ पौधों धरती नदियों को इतना महत्व दिया गया है कि उसे विज्ञान से जोड़ने के लिए इन्हें भगवान का दर्जा तक दे दिया गया। हमें नारीवाद का पाठ पढ़ाने वालों को ये नहीं भुलना चाहिए की यहां सदियों से नारियों ने हुकूमतें चलाई है यहाँ युगों से नारियों को पूजा जाता रहा है।

ये सिर्फ आपके त्योहारों तक का सवाल नहीं है बल्कि ये सवाल है आपकी सोच आपकी हजारों वर्षों की परंपरा, सदियों के स्वर्णिम इतिहास का और आपके आन बान शान आपके भारत राष्ट्र का। ये आपके संस्कृति पर आघात करने का एक मकसद है इसे पहचानिये। हमें चाहिए कि अपने त्योहारों को और जोर शोर से मनाएं, अपनों और परिजनों के लिए उपहार भी खरीदें, पर्यावरण की चिंता एक दिन ही नहीं पूरे साल करें। मिटटी के दीयों का इस्तेमाल करें। गरीबों को दान भी करें। पानी भी बचाएं पर्यावरण का ख़याल भी रखें लेकिन होली- दिवाली जरुर मनाएं। खुद की संस्कृती को खोकर और मूल्यों को दांव पर रख हमें पर्यावरण बचाने के पीछे इनके मकसद को पहचानना होगा। त्यौहार मनाने के तरीके बदले जा सकते है लेकिन त्योहारों को न बदलें, अपनी संस्कृती पर गर्व करें।

आज इन्हें पटाखों से तकलीफ है कल इन्हें मिठाइयों से भी परेशानी होगी, इन्हें मूर्ति पूजने से तकलीफ होगी, इन्हें लक्ष्मी आरती से भी तकलीफ होगी और वो दिन दूर नहीं होगा जब इन्हें दीपावली से ही परेशानी होगी। दरअसल तकलीफ इन्हें त्योहारों से नहीं है, अस्तित्व से है और हमें इस मानसिकता के पीछे के मकसद को समझने की जरुरत है। इसीलिए आप अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर हर एक त्योहार मनाएं पूरे जोर शोर से मनाए पर्यावरण का खयाल सालभर करे क्योंकि पर्यावरण का ठेका सिर्फ हिंदुओं का ही नही है बल्कि ये एक वैश्विक मुद्दा है तो ऐसे पोस्ट पर ध्यान न दे और आज दीपावली पर ढेरों दीपक जलाएं पटाखे भी उड़ाइये पर्यावरण के लिए 364 दिन है। इसी के साथ rightlog परिवार की ओर से आप एवं आपके समस्त परिवार को दीपावली के ढेरों शुभकामनाएं।

Tags: दीपावलीहिंदूहिंदू विरोधी
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भारतीय चिंतन दृष्टि से संविधान: ज्ञान परंपरा में नागरिकता का इतिहास

2 December 2025

भारतीय ज्ञान परंपरा में नागरिकता (Citizenship) का विचार आधुनिक “राज्य–नागरिक” (State–Citizen) ढाँचे से भले अलग रहा हो, पर इसका इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी...

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