मणिपुर में शांति बहाली की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। केंद्र सरकार, मणिपुर सरकार और कुकी-जो समुदाय से जुड़े 25 उग्रवादी संगठनों के बीच करीब 18 साल से लागू Suspension of Operations (SoO) समझौते की अवधि 4 सितंबर 2026 को समाप्त हो गई। इसका नवीनीकरण नहीं हुआ है। राज्य के गृह मंत्री कोंथौजम गोविंदास सिंह ने 23 अक्टूबर को स्पष्ट किया कि फिलहाल राज्य में यह समझौता लागू नहीं है। इस घटनाक्रम ने सुरक्षा व्यवस्था, उग्रवादी संगठनों के भविष्य और राज्य में जारी जातीय तनाव को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
क्या है SoO समझौता और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
SoO का पूरा नाम Suspension of Operations यानी अभियान रोकने की व्यवस्था है। यह सरकार और सशस्त्र संगठनों के बीच संघर्ष कम करने और राजनीतिक बातचीत का रास्ता खोलने के लिए बनाया गया था। इसके तहत सुरक्षा बल संबंधित संगठनों के खिलाफ आक्रामक अभियान रोकते थे, बशर्ते उग्रवादी संगठन तय नियमों का पालन करें।
इस समझौते की औपचारिक शुरुआत 22 अगस्त 2008 को हुई थी। इसमें केंद्र सरकार, मणिपुर सरकार और दो प्रमुख संगठनात्मक समूहों—कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन (KNO) तथा यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (UPF)—के बीच सहमति बनी। इसके पीछे उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष को सीमित करना और राजनीतिक समाधान की संभावनाएं तलाशना था।
समझौते के तहत पंजीकृत कैडरों को निर्धारित शिविरों में रहना था। हथियारों को तय नियमों के अनुसार शिविरों की निगरानी वाली शस्त्रागार व्यवस्था में रखना, जबरन वसूली और नई भर्ती जैसी गतिविधियों से दूर रहना भी इसकी शर्तों में शामिल था। इसके बदले सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सीमाएं लागू होती थीं और राजनीतिक बातचीत के लिए एक औपचारिक ढांचा उपलब्ध रहता था।
यह समझौता स्थायी शांति समझौता नहीं था। इसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा। सितंबर 2025 में भी इसे एक साल के लिए आगे बढ़ाया गया था। लेकिन सितंबर 2026 में इसकी अवधि समाप्त होने के बाद अब तक इसे नवीनीकृत नहीं किया गया है।
समझौते के दायरे में कितने उग्रवादी कैडर थे?
इस व्यवस्था के अंतर्गत 25 उग्रवादी संगठन दो प्रमुख समूहों के तहत आते थे। KNO के अंतर्गत 17 संगठन और UPF के अंतर्गत आठ संगठन शामिल थे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन संगठनों के कैडरों की संयुक्त संख्या 2,000 से अधिक थी।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इन सशस्त्र कैडरों को निर्धारित शिविरों तक सीमित रखना था। हथियारों की निगरानी और सुरक्षा बलों के साथ टकराव से बचने के नियम इसी व्यवस्था का हिस्सा थे।
अब समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन कैडरों की मौजूदा स्थिति क्या है? कितने लोग अभी भी निर्धारित शिविरों में हैं? कितने बाहर हैं? और शिविरों में जमा कराए गए हथियारों की निगरानी किस व्यवस्था के तहत हो रही है?
इन सवालों के जवाब महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि समझौते के खत्म होने से केवल एक दस्तावेज की वैधता समाप्त नहीं हुई है। इससे सशस्त्र संगठनों और सुरक्षा बलों के बीच लंबे समय से लागू व्यवस्था भी बदल गई है।
समझौता खत्म होने के बाद क्या बदलेगा?
SoO समझौते की अवधि समाप्त होने का सीधा अर्थ है कि इसके तहत मिलने वाली सुरक्षा और अभियान रोकने की व्यवस्था अब पहले की तरह लागू नहीं है। सुरक्षा बलों को संबंधित सशस्त्र संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने में समझौते से मिलने वाली पुरानी पाबंदियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कैडर अपने आप कानून तोड़ने वाला घोषित हो गया है या सुरक्षा बल बिना कानूनी प्रक्रिया के कोई भी कदम उठा सकते हैं। कार्रवाई तथ्यों, कानून और संबंधित सुरक्षा परिस्थितियों के आधार पर होगी।
मणिपुर के गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा अभियान किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहेंगे। कुकी, मैतेई या नागा समूहों से जुड़े संदिग्ध ठिकानों पर भी कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का घोषित उद्देश्य राज्य में कानून-व्यवस्था बहाल करना है।
लेकिन व्यावहारिक चुनौती यह है कि यदि हजारों सशस्त्र कैडरों को निर्धारित शिविरों में रखने वाली व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तो उनकी गतिविधियों पर नजर रखना कठिन हो सकता है। यदि हथियारों की निगरानी और कैडरों की पहचान का प्रभावी तंत्र नहीं रहता, तो सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
ताजा हिंसा ने क्यों बढ़ाई चिंता?
समझौते के नवीनीकरण पर अनिश्चितता ऐसे समय में आई है, जब मणिपुर में जातीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 19 अक्टूबर को इम्फाल ईस्ट और कांगपोकपी की सीमा के पास सुनुरोक इलाके में तीन मैतेई नागरिकों की हत्या के बाद तनाव बढ़ गया। इस घटना में कुकी उग्रवादी संगठन से जुड़े लोगों की कथित भूमिका की जांच की जा रही है। आरोपों को अंतिम रूप से साबित होना अभी बाकी है।
इसके बाद सुरक्षा बलों ने कांगपोकपी जिले के साइनाई स्थित एक निर्धारित शिविर में तलाशी अभियान चलाया। गृह मंत्री के अनुसार, वहां मिले 18 लोगों में केवल एक की पहचान पूर्व SoO व्यवस्था के तहत आने वाले कैडर के रूप में हुई। बाकी 17 लोगों को हिरासत में लेकर उनकी पहचान और संगठनात्मक संबंधों की जांच की गई।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निर्धारित शिविरों में कैडरों की मौजूदगी और उनकी पहचान समझौते की निगरानी व्यवस्था के अहम हिस्से थे। हालांकि, किसी व्यक्ति की पहचान या किसी संगठन से संबंध की पुष्टि जांच के बाद ही की जा सकती है।
राजनीतिक विवाद और शांति प्रक्रिया की चुनौती
मणिपुर में SoO समझौते को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। घाटी के कई मैतेई संगठनों ने इसका विरोध किया है। उनका आरोप रहा है कि समझौते से कुकी-जो उग्रवादी संगठनों को ऐसी छूट मिलती है, जिसका इस्तेमाल जातीय संघर्ष के दौरान किया जा सकता है। दूसरी ओर, कुकी-जो संगठनों का पक्ष रहा है कि यह व्यवस्था उन्हें सुरक्षा और राजनीतिक बातचीत का अवसर देती है।
मणिपुर में मई 2023 में शुरू हुई मैतेई-कुकी जातीय हिंसा ने इस विवाद को और गहरा किया। समझौते के नियमों के कथित उल्लंघन और हथियारबंद कैडरों की गतिविधियों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी सशस्त्र संगठन कानून से ऊपर न रहे और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो। साथ ही, ऐसी स्थिति भी पैदा नहीं होने देनी होगी जिसमें राजनीतिक बातचीत का रास्ता बंद हो जाए और सशस्त्र संघर्ष दोबारा तेज हो जाए।
आगे क्या होगा?
SoO समझौते का नवीनीकरण न होना अपने आप में स्थायी शांति प्रक्रिया का अंत नहीं है, लेकिन इससे मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव जरूर आया है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के सामने अब हथियारों की निगरानी, कैडरों की पहचान, सुरक्षा अभियानों और राजनीतिक संवाद को लेकर स्पष्ट रणनीति बनाने की जरूरत है।
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या सरकार नई शर्तों के साथ समझौते को फिर से लागू करेगी या कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाएगी। फिलहाल इसका स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
मणिपुर में शांति केवल सुरक्षा अभियानों से नहीं लौटेगी। इसके लिए हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई, हथियारों पर प्रभावी नियंत्रण और विभिन्न समुदायों के बीच भरोसा बहाल करना भी जरूरी है। 18 साल पुरानी व्यवस्था के समाप्त होने के बाद असली परीक्षा यही है कि सरकार सुरक्षा के मोर्चे पर सख्ती बरतते हुए राजनीतिक समाधान की संभावनाओं को कैसे बनाए रखती है।


































