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न चंगेज़ खान, न सिकंदर – ये हैं विश्व के सबसे सफल सम्राट

Dev Desai द्वारा Dev Desai
18 November 2017
in इतिहास
थॉमस मैकॉले

Image: The Wire

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थॉमस मैकॉले : जिसने भारत की मानसिकता पर शासन किया है

लेख के पाठकों को लेख का शीर्षक पढ़ कर शायद लगा हो कि लेख अगर चंगेज़ खान या सिकंदर जैसे किसी सफल चक्रवर्ती शासक के बारे में नहीं तो उनके किसी समकक्ष राजा महाराजा के बारे में होगा. किन्तु नहीं, यह लेख एक ऐसे महानुभाव पर आधारित है जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो भूमि के छोटे से टुकड़े पर भी नहीं, परन्तु परोक्ष रूप से जीते-जी और मरणोपरांत भी, एक पूरे-पूरे राष्ट्र, या कहूँ तो उप-महाद्वीप की मानसिकता पर शासन किया है. बात है थॉमस मैकॉले की

जिन्होंने आज से १७५ से भी ज्यादा वर्षों पूर्व गुलाम-भारत की शिक्षा-पध्दति के बारे में एक ऐसा निर्णय लिया, जिसके फ़ल (अच्छे या बुरे यह आपके अपने विचारों पर निर्भर करता है) हम आज तक भुगत रहे हैं.

जैसे-जैसे अंग्रेज़ी ईस्ट इण्डिया कंपनी का भारत पर आधिपत्य बढ़ने लगा, वैसे-वैसे इस विषय पर चर्चा होने लगी कि, खुद के देश से न केवल भौगोलिक अपितु सांस्कृतिक तौर पर भी सात समुन्दर दूर इस देश का शासन किस प्रकार किया जाए? और इन चर्चाओं के परिणामस्वरूप कुछ ऐसी वस्तुएं उभर कर आईं, जिनका साया आज भी समग्र भारतीय उप-महाद्वीप पर बरक़रार है, उदाहरण-स्वरूप भारतीय दंड संहिता और शिक्षण पध्दति.  शिक्षण पध्दति के विषय पर कंपनी में दो खेमे थे. पहला खेमा भारत की पारंपरिक गुरुकुल प्रथा को भारतीय भाषाओँ में ही जारी रखने के पक्ष में था, तो दूसरा वर्ग यह मानता था, कि भारत में अंग्रेज़ी आधारित शिक्षण लागू किया जाए. दूसरे खेमे के प्रमुख नेताओं में से एक थे थॉमस मैकॉले और २ फ़रवरी १८३५ को हुई एक बैठक में उन्होंने कुछ ऐसे तर्क रखे कि उनके खेमे की बात को स्वीकृति दे दी गई.

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थॉमस मैकॉले ने कहा (कहा तो बहुत कुछ था, जो आप यहाँ पढ़ सकते हैं: http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00generallinks/macaulay/txt_minute_education_1835.html, लेख में केवल आवश्यक चीज़ें संक्षेप में शामिल की हैं)-

“भारत के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषाएँ साहित्य और विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत कमज़ोर हैं. मेरा तो मानना है कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी भी समस्त भारतीय एवं अरबी साहित्य से अधिक समृद्ध होगी. मेरा निवेदन है कि आज के समय में हमें ज़रूरत है एक ऐसे वर्ग की जो अंग्रेज़ शासकों और गुलाम भारतीयों के बीच सेतु का काम कर सके, जो दिखने में तो भारतीय हो, पर जिसकी पसंद-नापसंद, विवेक-बुद्धि और विचारशैली एकदम अंग्रेज़ हो.”

[…that the dialects commonly spoken among the natives of this part of India contain neither literary nor scientific information…..  I have never found one among them who could deny that a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia….. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, -a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect]

और जो थॉमस मैकॉले साहब की इच्छा थी, वह एक दैवी आकाशवाणी की तरह शब्दशः यथार्थ साबित हुई. १८३५ से लेकर आज तक, हमारे शिक्षा-संस्थान ऐसे ही विद्यार्थी देते आए हैं जो देशी चीज़ों, प्रथाओं और संस्कृति को हीनभाव से देखतें हैं और हर एक विदेशी चीज़ को अहोभाव से. आज भी युवा पीढी में लोग सज-धज कर हेलोवीन मनाने पहुँच जाते हैं, पर अगर कोई नाग-पंचमी मनाने की बात करे तो उसको पछात मानसकिता और अंधश्रद्धा का शिकार समझा जाएगा (यह बात अलग है, कि नाग पंचमी में तो नाग की पूजा करते हैं, जिसका जीता-जागता अस्तित्व है, जबकी हेलोवीन तो भूत-प्रेतों पर आधारित है, जिनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण ही नहीं है). आज भी जिसे ज़रा सी भी अंग्रेजी आती हो, समाज उसे महान समझता है पर हिंदी, संस्कृत या अन्य भारतीय भाषा के प्रकांड पंडित को भी कोई पूछने वाला तक नहीं. सारी हदें तो तब पार हो जातीं हैं, जब बड़े-शहरों के बड़े स्कूलों में विद्यार्थियों को अपने मित्रों से हिंदी में वार्तालाप करने की वजह से दण्डित किया जाता है (विश्वास नहीं होता? ये पढ़िए: http://www.deccanherald.com/content/297143/students-fined-speaking-hindi.html या ये https://timesofindia.indiatimes.com/city/agartala/Agartala-school-slaps-fine-for-not-speaking-in-English-faces-flak/articleshow/55256393.cms).

आज के स्वतन्त्र भारत में भी अंग्रेजी-शिक्षित बाबुशाही स्वयं को प्रजा का स्वामी ही समझती है. दासता तो १९४७ में समाप्त हो गयी, पर दास-मानसिकता ज़रा भी नहीं गयी, और यही है थॉमस मैकॉले को विश्व का सबसे सफल सम्राट बताने के पीछे की वजह. भूमि के छोटे-बड़े टुकड़ों पर राज करने वाले तो कई देखे होंगे, परन्तु लगातर १७५ वर्षों तक करोड़ों की जनसंख्या वाले उप-महाद्वीप की सामूहिक मानसिकता पर राज करने का शायद यह अकेला उदाहरण होगा.

अब प्रश्न यह है, कि इस थॉमस मैकॉले -मानसिकता से संघर्ष किस प्रकार किया जाए? कहते हैं न, कि लोहा ही लोहे को काटता है? हमें भी उसी प्रकार थॉमस मैकॉले साहब का वही पुराना, आज़माया हुआ तरीका अपनाना होगा- पहले शिक्षा-पध्दति पर काबु करो, जनमानस अपने आप काबु में आ जाएगा. राष्ट्र की शिक्षा-पध्दति को पूर्णतः परिवर्तित कर के कुछ ऐसा बनाने की आवश्यकता है, कि हर विद्यार्थी भव्य-भारत माता की संतान होने पर गर्व महसूस करे. एक ऐसी शिक्षा जो अंग्रेजी के साथ-ही-साथ मातृभाषा और राष्ट्रभाषा पर एक समान ज़ोर दे, एक ऐसी शिक्षा जो बताए कि जब भारत में सिन्धु-घाटी सभ्यता फल-फूल रही थी, तब इन अंग्रेजों के पूर्वज जंगली जीवन व्यतीत कर रहे थे, जब भारत में आर्यभट्ट और भास्कराचार्य जैसे विद्वान शोध पर शोध कर रहे थे तब इन अंग्रेजों के पूर्वज वन में पशु चरा रहे थे, जब भारत में कालिदास भव्य रचनाएँ कर रहे थे, तब यह अंग्रेज़ और आरब एक बर्बर युद्ध लड़ रहे थे, अरे, पुरानी बाते जाने दो, १९५० में ही जब भारत का एक-एक नागरिक स्वतन्त्र भारत के पहले चुनाव में समान मताधिकार प्राप्त कर चूका था, तब यूरोप-अमरीका की महिलाऐं सडकों पर इसी मत के अधिकार को पाने प्रदर्शन कर रही थीं. यदि हम ऐसा करने में सफल होते हैं, तो आने वाली पीढ़ियाँ थॉमस मैकॉले की काली परछाई से बाहर आकर, एक गर्वान्वित भारतीय बनकर एक स्वर्णिम भारत का निर्माण करने में ज़रूर सफल होंगी, और वह होगी सच्चे अर्थ में स्वतंत्रता….

भारत माता की जय!!!!

Tags: थॉमस मैकॉले
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