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परमाणु बम के जनक ओपेनहाइमर कैसे भगवद गीता से प्रभावित हुए ?

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
8 July 2019
in मत
ओपेनहाइमर भगवद गीता
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जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर एक सैद्धांतिक भौतिकविद् थे जिन्हें ‘एटोमिक बॉम्ब का जनक’ भी कहा जाता है। ओपेनहाइमर ने मेक्सिको के ट्रिनिटी टेस्ट केंद्र पर 16 जुलाई 1945 को जब सबसे पहले एटोमिक बॉम्ब का विस्फोट देखा तो उन्होंने कहा ,’मुझे हिन्दू शास्त्र भगवद गीता की वह पंक्ति याद आ रही है जब विष्णु अपना विराट स्वरूप दिखाते हुये अर्जुन को समझा रहे है कि मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ। और मैं इस समय अधर्म का नाश करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ।

ओपेनहाइमर का यह कथन हिन्दू धर्म की धार्मिक किताब भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय के 32वें श्लोक की ओर इशारा करता है, जो कहता है –

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भगवद् गीता अध्याय 11 श्लोक 32. कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।…॥३२॥

अर्थात मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूं। मैं समस्त लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं।

भौतिकविद ओपेनहाइमर कभी हिन्दू धर्म में परिवर्तित नहीं हुए ना ही खुद को कभी हिन्दू कहा लेकिन भारतीय वैदिक दर्शनशास्त्र ने उन्हे अन्य से ज्यादा प्रभावित किया। ओपेनहाइमर ने गीता को समझने के लिए संस्कृत की अतिरिक्त शिक्षा ली क्योंकि वह गीता को उसी की भाषा में समझना चाहते थे। उनका जन्म भले ही एक यहूदी परिवार में हुआ था लेकिन महान हिंदू महाकाव्य भगवद्-गीता के ज्ञान ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया। ओपेनहाइमर के अनुसार 19वीं शताब्दी में अगर ऐसा कुछ था जो पश्चिम के देश भारत से सीख सकते थे तो यह गीता का अध्ययन था। भारत के महाकव्य महाभारत में ब्रह्मास्त्र का उल्लेख मिलता है जो परमाणु बम के समान ही माना जाता था। उल्लेखनीय रूप से ओपेनहाइमर भी परमाणु के साथ ब्रह्मास्त्र की संभावना पर विश्वास करते थे।

एक बार जब ओपेनहाइमर से Rochester University के एक लैक्चर में एक विद्यार्थी ने पूछा कि जो बम मैनहट्टन परियोजना में विस्फोट हुआ था क्या वह पहला था ? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि आधुनिक युग में यह जरूर पहला था। ओपेनहाइमर का यह जवाब इस बात का संकेत था कि ब्रह्मास्त्र रूपी परमाणु बम का विस्फोट पहले भी हो चुका है।

ओपेनहाइमर को गीता पर इतना विश्वास था कि अपने दोस्तों को भी गीता पढ़ने की सलाह देते थे और वे स्वयं गीता की एक प्रति अपने पास रखते थे। फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट के दाह संस्कार के दौरान भी उन्होंने गीता के 17वें अध्याय के तीसरे श्लोक को पढ़ा था जिसमें यह लिखा है कि सभी मनुष्योंकी श्रद्धा अन्तःकरण के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय है। इसलिये जो जैसी श्रद्धावाला है? वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा — स्थिति है।

गीता में पांडु पुत्र अर्जुन ने अपने कौरव भाइयों से युद्ध करने में संकोच दिखाया था। अपने भाइयों, दोस्तों और गुरुजनों को अपने विरोधी के रूप में देख कर अर्जुन के मन में सवालों का सुनामी उमड़ने लगी थी। ऐसा नहीं था कि वह शस्त्र विद्या में अपने विरोधियों से कम थे, वह बस अपने परिवारजनों के विरूद्ध युद्ध करने और उनका वध करने में संकोच कर रहे थे। वो अपनों पर ही हमला कर उनका वध नहीं करना चाहते थे। इसके बाद वह अपने सारथी श्रीकृष्ण के समक्ष अपने मन में चल रहे प्रश्नो को रखते हैं। अर्जुन के प्रश्नो को सुनकर श्रीकृष्ण भगवद गीता की व्याख्या करते हैं और अर्जुन के सभी प्रश्नो का उत्तर देते हैं।

गीता में श्रीकृष्ण ने तीन बिंदुओं को केंद्र बनाया है:

  1. अर्जुन एक योद्धा है और इसलिए युद्ध लड़ना उसका कर्तव्य है।
  2. अर्जुन के भाग्य का निर्धारण करना भगवान (श्रीकृष्ण) का काम है, अर्जुन का नहीं।
  3. अगर वह अपनी आत्मा को संरक्षित करने जा रहे हैं तो अर्जुन को कृष्ण पर विश्वास रखना चाहिए।

श्री कृष्ण के विस्तृत उत्तर सुनकर अर्जुन का विचलित मन शांत हो जाता है और वह युद्ध के लिए फिर से तैयार हो जाते है। अर्जुन श्री कृष्ण से उनके ईश्वरीय तथा बहु-सशस्त्र रूप के दर्शन के लिए आग्रह करते हैं। अर्जुन के आग्रह के बाद श्री कृष्ण अपना विराट रूप उन्हें दिखाते हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है जैसे आकाश में एक हजार सूर्य चमक रहे हों। भगवान कृष्ण के इस विराट स्वरूप में समस्त ब्रह्माण्ड को समाहित देखकर अर्जुन मोहमुक्त हो जाते हैं। तब भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं वह काल हैं और वर्तमान में उनका लक्ष्य अधर्म का विनाश करना है.

गीता हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धार्मिक ग्रंथ है जिसकी विभिन्न विद्वानों ने अपने तरीकों से व्याख्या की है। जैसे काल को किसी ने ‘मृत्यु’ कहा है तो किसी ने इसे ‘समय’ कहा है लेकिन संस्कृत में दोनों के लिए ही एक ही शब्द इस्तेमाल किया जाता है जिसे ‘काल’ कहते हैं. इसकी व्याख्या कालांतर के रूप में भी की गयी है जिसका अर्थ संहारक होता है।

युद्ध में विनाश अपने चरमसीमा पर होता है चाहे कोई युद्ध में भाग ले या ना ले परंतु इसका प्रभाव उसपर जरुर पड़ता है। और यह ओपेनहाइमर और उनके द्वारा आविष्कृत किए गए परमाणु बम के लिए सही साबित हुआ था। अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने की यह वजह बिल्कुल नहीं थी कि वे महत्वपूर्ण शहर थे, बल्कि बड़ी वजह यह थी कि उन शहरों पर उस वक्त तक किसी तरह की बमबारी नहीं की गई थी। अमेरिका ने पहले ही इन शहरों को परमाणु बम गिराने के लिये चिह्नित कर लिया।

अगर वैज्ञानिकों ने परमाणु हथियार बनाने से ही मना कर दिया होता तो शायद जापान को इतना बड़ा नुकसान नहीं होता। परन्तु ये भी सत्य है कि बिना परमाणु बम के भी द्वितीय विश्व युद्ध में मृतको की संख्या उतनी ही होती जितनी परमाणु बम के प्रयोग से हुई थी। वास्तव में यह संख्या बढ़ भी सकती थी क्योंकि बिना परमाणु बम के यह युद्ध नहीं रुकता और यह युद्ध और भी कई महीनों तक जारी रहता।

ओपेनहाइमर भी महाभारत के अर्जुन की तरह थे जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को नहीं मारना चाहते थे लेकिन युद्ध से नफरत करने वाले व्यक्ति को परिस्थितियों ने परमाणु बम विकसित करने के लिए मजबूर कर दिया था। और ओपेनहाइमर एकमात्र दर्शक थे जो इस अनहोनी को देख रहे थे। गीता के अनुसार आत्मा अजर अमर है मतलब उसे अग्नि, वायु, जल या किसी भी शस्त्रों से प्रभावित नहीं किया जा सकता, जबकि शरीर नश्वर है। गीता का उपदेश सुनने के बाद युद्ध के प्रति अर्जुन के विचार पूरी तरह बदल गए क्योंकि श्री कृष्ण के उपदेश को सुनने के बाद उन्हें विश्वास हो गया था कि वध करने के बाद भी उनके सभी परिजनों की आत्मा जीवित रहेगी। दूसरी तरफ अर्जुन की तरह ओपेनहाइमर को अभी भी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था मृत्यु केवल एक भ्रम है।

ओपेनहाइमर का अमर आत्मा के विचार को न स्वीकार पाना उनके मन में कई सवाल खड़े करता था। उन्हें सदैव यही लगता था कि उनके हाथ उन असंख्य लोगों के रक्त से रंगे है, जो उनके द्वारा निर्मित परमाणु बम से मारे गए थे। हालांकि, ये गीता द्वारा प्रेरित ‘कर्तव्य बोध’ ही था जिसने वर्ष 1967 में उनकी मृत्यु तक उनके जीवन का मार्गदर्शन किया था। गीता के कई अर्थ हैं, परंतु गीता का असली सार इसके प्रचलित अर्थ से कहीं ज़्यादा गूढ और रोचक है।

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