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BHU मे ताजिया जुलूस का कोई रिवाज नहीं, तो अब अचानक ये ‘सेक्युलरीकरण’ क्यों?

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
11 September 2019
in मत
BHU मे ताजिया जुलूस का कोई रिवाज नहीं, तो अब अचानक ये ‘सेक्युलरीकरण’ क्यों?

PC: besthindinew

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कल यानी मंगलवार को मुहर्रम था। विश्वविद्यालय में सभी विद्यार्थियों की छुट्टी थी। इस मौके पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के परिसर में ताजिया घुमाया गया जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोग तुरंत एक्टिव हो गए और इसके विरोध में अपने अपने विचार व्यक्त करने लगे। देखते ही देखते इससे संबंधित फोटो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गयी।

दरअसल, देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शुमार वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ( BHU ) में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ताजिया निकाली गयी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 102 वर्षो के इतिहास में शायद ये पहली बार ही हो रहा था कि विश्वविद्यालय के रास्ते से ताजिया घुमाई गयी। हालांकि, सिंह द्वार पर स्पष्ट अक्षरों में लिखा है कि ‘यह आम रास्ता नहीं है’ फिर भी इस्लाम को मानने वाले लोग इस मार्ग पर मुहर्रम का मातम मना रहे थे। छित्तूपुर गेट से बीएचयू परिसर में विधि संकाय, MMV होते हुए सिंह द्वार से यह ताजिया का जुलूस निकाला गया था। ऐसे में सवाल उठने लाजमी थे कि जब विश्वविद्यालय के इतिहास में आज तक ऐसे नहीं हुआ तो आज इस नई परंपरा को जन्म देने की क्या जरूरत आन पड़ी?

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बांग्लादेश में बीएनपी की सत्ता वापसी: जानें क्या हुआ था साल 2024 में ?

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सोशल मीडिया पर इस ममाले में कुलपति राकेश भटनागर की चुप्पी पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए। कई छात्रों ने फेसबूक पर अपना विरोध जताया तो कई ने ट्विटर का सहारा लिया।

https://twitter.com/ippatel/status/1171374643162181632

इस मामले पर गुस्सा जाहिर करते हुए एक यूजर ने लिखा, “क्या किसी #हिंदू को अलिगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कृष्ण जन्माष्टमी या कावड़ यात्रा निकलाने की अनुमति मिल सकती है?????”

क्या AMU में नवरात्रि में मां दुर्गा की मूर्ति लगाई जा सकती है? नही।
तो फिर कैसे BHU में ताजिया कैसे घूम सकता है

— रंजीत ठाकुर (@6V5lnubWDp1JcHj) September 11, 2019

वहीं एक दूसरे यूजर कहा कि “क्या AMU में नवरात्रि में मां दुर्गा की मूर्ति लगाई जा सकती है? नही। तो फिर कैसे BHU में ताजिया कैसे घूम सकता है।”

फेसबूक पर एक छात्र ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा, ‘आखिर विश्वविद्यालय में आज इस ताजिया का क्या काम ? विश्वविद्यालय के इतिहास मे आज तक ऐसे नहीं हुआ तो आज इस नई परम्परा का जन्म क्यों?’

आलोचकों ने तो यहां तक कहा कि विश्वविद्यालय में ये साफ-साफ महामना के मूल्यों का उपहास है। एक यूजर ने कहा किस साजिश के तहत इस तरह के जुलूस को अनुमति मिली ?? जब किसी और धर्म के जुलूस को अनुमति नहीं दी जाती तो एक खास धर्म के ही धार्मिक जुलूस को क्यों अनुमति मिली? क्या यह विश्वविद्यालय कोई धर्मशाला है जब जो मन चाहे मुँह उठा के चला आये..??’

 

बीएचयू के कुलपति को घेरते हुए लोगों ने ये भी कहा कि “JNU से आये BHU के सेक्युलर कुलपति राकेश भटनागर BHU परिसर में ताजिया घुमवा रहे हैं।“

https://twitter.com/ippatel/status/1171374643162181632

इस मामले ने और तूल तब पकड़ लिया जब बीएचयू के छात्रों ने विद्यालय परिसर में ताजिया घुमाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। छात्रों ने चीफ प्रॉक्टर कार्यालय पर धरना दिया और इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए रोक लगाने की मांग की। छात्रों का आरोप है कि ताजिया घुमाए जाने के दौरान नारे लगाने के साथ ही धारदार असलहे भी लहराए गए और विश्वविद्यालय सुरक्षा कर्मी देखते रहे। चीफ प्रॉक्टर ने नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया तब जाकर छात्र वापस लौटे। इसके साथ ही मीडिया से बातचीत में चीफ़ प्रॉक्टर ओपी राय ने ये भी सफाई दी है कि ये परंपरा पुरानी है।

ऐसा लगता है कि ओपी राय कहीं न कहीं ताजिया घुमाए जाने के समर्थन में हैं या फिर उन्हें ऊपर से आदेश मिले हैं। वास्तव में बीएचयू में ऐसी कोई परंपरा रही ही नहीं है। इसे जानबूझकर परंपरा बनाने की कोशिश की जा रही है। वो भी तब जब बीएचयू के कुलपति और कोई नहीं जेएनयू के प्रोफेसर रह चुके राकेश भटनागर हैं। जेएनयू में जब साल 2016 में आतंकी अफजल गुरु की बरसी पर देशविरोधी नारे लगे थे तब राकेश भटनागर वहां प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। और अब उनके कुलपति बनते ही विश्वविद्यालय में ताजिया घुमाना और उनका इसपर कोई स्पष्टीकरण न देना उनकी हामी को दर्शाता है।

जनवरी 1920 के दीक्षांत भाषण में मदन मोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कहा था, ‘हमें काशी को सर्वोच्च सभ्यता की पवित्र भूमि बना देना चाहिए, जिसके लिए यह प्राचीन समय में इतनी प्रसिद्ध था। इस विश्वविद्यालय को हमें इस प्रकार बनाना चाहिए कि इसकी पग पग भूमि से प्राचीन गौरव तथा सभ्यता का आभास मिले।” (पुस्तक- महामना: चिंतन एवं संदेश, डॉ० उमेश दत्त तिवारी)

महामना का यह सपना पूर्ण तो हो रहा है लेकिन साथ ही ताजिया निकाल कर उनके मूल्यों का गला घोंटा जा रहा है।

बता दें कि बीएचयू वर्षों से ही शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है जो जेएनयू , अलीगढ़ और जामिया यूनिवर्सिटी से बिल्कुल अलग रहा है। लेकिन आज अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस सर्व विद्या की राजधानी का इस्तेमाल किया जा रहा है जो एक शैक्षणिक संस्थान के माहौल के बिल्कुल खिलाफ है। विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार को इस बात का ध्यान रखना होगा कि आगे से इस तरह से माहौल बिगाड़ने की कोशिश न की जाए।

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