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1971 में इंदिरा गांधी POK को वापस ले सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
31 October 2019
in समीक्षा
इंदिरा गांधी पाकिस्तान

PC: livemint

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31 अक्टूबर भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है और अब यह और धूमधाम से मनाया जाने लगा है और इसे मनाने के लिए कारण भी है। आज ही के दिन भारत के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल का जन्मदिवस भी है, इसके साथ ही आज से ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बन गये हैं। परन्तु आज एक और महान हस्ती और भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री की पुण्यतिथि है। आइरन लेडी के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी को आज ही के दिन उनके अंगरक्षकों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी।इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 के बीच लगातार तीन बार देश की बागडोर संभाली और उसके बाद 1980 में दोबारा इस पद पर पहुंची, लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गयी। इंदिरा गांधी को भारत में एक मजबूत इरादों वाली तथा निडर फैसले लेने वाली प्रधानमंत्री के रूप में जाना जाता है। उनकी उपलब्धियों में बांग्लादेश को स्वतंत्र करने और पाकिस्तान को 1971 के युद्ध में बुरी तरह से मात देना सबसे ऊपर आता है। इस युद्ध में जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को सबसे अधिक दिया जाता है। कहा जाता है कि यह उनकी दूरदर्शिता ही थी जिसने भारत को पाकिस्तान के खिलाफ अभूतपूर्व जीत दिलाई।

लेकिन क्या यह सच है? और इंदिरा गांधी ने जब पाकिस्तान को घुटनों पर ला ही दिया था तो बंधक बनाए गए 93,000 पाकिस्तानियों को क्यों छोड़ दिया? वह भी ऐसे समय में जब कश्मीर का मुद्दा जीवंत था और कुछ हिस्से पाकिस्तान के कब्जे में थे। वह चाहती तो इन 93,000 युद्ध बंधकों के बदले में कश्मीर को पाकिस्तान से वापस ले कर जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई गलती को सुधार सकती थीं।

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वास्तव में वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ मिली जीत का पूरा श्रेय भारत सेना वायु सेना और जल सेना को मिलना चाहिए। साथ ही फील्ड मार्शल मानेकशॉ को उनकी दूरदर्शिता के लिए सराहा जाना चाहिए। लेकिन इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना के द्वारा किए गए अभूतपूर्व पराक्रम को ऐसे ही व्यर्थ जाने दिया जबकि उनके पास मौका था कि वह पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दा भी सुलझा ले। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया।

दरअसल, 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की तरफ से की गई गोलीबारी का जवाब भारत ने 4 दिसंबर 1971 को ऑपरेशन ट्राइडेंट के रूप में दिया।

भारतीय नौसेना ने भी युद्ध में दो मोर्चों को संभाला। एक तरफ पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला तो दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तानी नौसेना को जवाब देना। 5 दिसंबर को कराची बंदरगाह पर भारतीय नौसेना की कार्रवाई ने पाकिस्तान के नौसैनिक मुख्यालय को तबाह कर दिया। जब पाकिस्तान भारतीय नौसेना से घिरा हुआ था ठीक उसी समय भारतीय थल सेना ढाका को तीनों तरफ से घेर चुकी थी। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तानी गवर्नर के घर पर हमला कर दिया। इसके बाद जनरल नियाजी ने तुरंत युद्ध विराम का प्रस्ताव भेज दिया, लेकिन भारत को ये मंजूर नहीं था। थल सेनाध्यक्ष ने कह दिया कि अब युद्धविराम नहीं बल्कि सरेंडर होगा। कोलकाता से पूर्वी सेना के कमांडर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ढाका पहुंचे। नियाजी ने जनरल अरोड़ा के सामने सरेंडर के कागज पर हस्ताक्षर किए। सरेंडर के प्रतीक के तौर पर नियाजी ने अपनी रिवॉल्वर भी अरोड़ा को सौंप दी। इस सरेंडर के बाद 90,000 से 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदी भारत की हिरासत में ले लिए गये थे।

कुछ विशेषज्ञों का यह कहना है कि बांग्लादेश की स्वतन्त्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शेख़ मुजीबुर रहमान को पाकिस्तानी सेना फांसी देने की फिराक में थी, लेकिन इंदिरा गांधी ने 93,000 हजार बंधकों के बदले में शेख़ मुजीबुर रहमान की जान को भुट्टों से डील कर बचाया था ताकि बांग्लादेश नेता विहीन न हो। लेकिन यह कैसे हो सकता है? भुट्टो या यूं कहे पाकिस्तान ने मुजीबुर रहमान को अंतराष्ट्रीय दबाओ में आकर 8 जनवरी 1972 को ही छोड़ दिया था और वह 10 जनवरी 1972 को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री घोषित हो गए थे। वहीं उनके रिहा होने के आठ महीने बाद शिमला समझौता हुआ और 93,000 बंदियों को छोड़ा गया था।

जब इंदिरा गांधी के पास आठ महीने का समय था तब वह किसी भी तरह से पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दे को सुलझाने की दिशा में बातचीत कर सकती थीं। इससे पाकिस्तान से पीओके वापस लिया जा सकता था और पाकिस्तान तैयार भी हो जाता लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, और शिमला समझौते के तहत 17 दिसंबर 1971 कि यथा स्थिति बरकरार रखने पह सहमत हो गयीं। अगर तब इंदिरा गाँधी ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए थोडा भी प्रयास किया होता तो पीओके आज पाकिस्तान की कैद से आजाद होता।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब आठ महीने का समय जब इन्दिरा गांधी के पास था तब वह किसी भी तरह से पाकिस्तान से कश्मीर मुद्दे को सुलझाने की दिशा में बातचीत क्यों नहीं की? पूर्व विदेश सचिव ज्योतिंद्र नाथ ‘मणि’ दीक्षित ने अपने लेख में लिखा है कि उन्हें लगता है कि जनवरी 1972 में रिहा होने पर मुजीब का पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ कुछ अनौपचारिक संपर्क था। भुट्टो ने मुजीब को पाकिस्तानी POWs जारी करने में मदद करने के लिए कहा था, इसलिय जब भारत ने शिमला समझौते से पहले मुजीबुर रहमान से बातचीत की तब वह बंधकों के पक्ष में रहे। वह लिखते है कि मुजीबुर रहमान आजादी के लिए उत्सुक नहीं थे। वह पूरे पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।

यहीं नहीं भारत के 54 सैनिक जो पाकिस्तान द्वारा बंधक बनाए गए थे उन्हें भी मृत मान लिया गया था और इन्दिरा गांधी ने उन्हें वापस लौटाने के लिए कोई बात नहीं की थी। इससे यही स्पष्ट होता है कि इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बाद भी अपने सैनिकों को ऐसे ही छोड़ दिया गया जबकि कई बार उनके जीवित होने के साक्ष्य मिले।

इन्दिरा गांधी ने सत्ता की लालच में पहले तो कम्यूनिस्टों के साथ संधि किया और उन्हें भारत के शैक्षणिक संस्थान पर अपना कब्जा कर पूरे भारत में वामपंथ की विचारधारा को पनपने का अवसर दिया। यही नहीं उनके कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति भी डावांडोल थी। इंदिरा गांधी के शासन में भारत की अर्थव्यवस्था बिगड़ने लगी थी, भुखमरी बढ़ने लगी थी, वामपंथ का वर्चस्व बढ़ने लगा था, उनके राजनीतिक करियर पर विराम लगने के संकेत मिलने लगे थे। लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना द्वारा जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर हीरो बना दिया जिसका फायदा उन्हें चुनाव में भी मिला। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि पाकिस्तान के खिलाफ हमें जीत सेना के पराक्रम और डिप्लोमेसी से मिली थी। इंदिरा गांधी को जिस युद्ध के लिए बड़ा चढ़ाकर नायक के तौर पर चित्रित किया जाता रहा है वास्तव में वो इसकी पूर्ण रूप से हकदार ही नहीं हैं। सच कहें तो देश के सैनिकों को पाकिस्तान से वापस न लाने और 93,000 पाक बंधकों को ऐसे ही रिहा करने के लिए उनकी भर्त्सना की  जानी चाहिए।

Tags: इंदिरा गाँधीपाकिस्तानबांग्लादेश
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