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पूर्व आर्थिक सलाहकार ने उठाये अभिजीत बनर्जी के रिसर्च के तरीकों पर गंभीर सवाल

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
3 January 2020
in अर्थव्यवस्था
अभिजीत बनर्जी
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पिछले वर्ष भारतीय अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी को इकोनॉमिक्स के लिए प्रतिष्ठित नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनके साथ उनकी पत्नी Esther Duflo और Michael Kremer को भी नोबल पुरस्कार दिया गया था। इन सभी को यह पुरस्कार अर्थशास्त्र में यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण यानि Randomised Controlled Trial(RCT) प्रणाली के सफल प्रयोग हेतु दिया गया था। अभिजीत बनर्जी ने ये प्रयोग भारत के ही राजस्थान के एक गांव में किया था, लेकिन भारत में इस तरह के प्रयोगों के लिए किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है। RCT प्रयोग एक अमानवीय प्रयोग है जिसमें लोगों को लैबोरेटरी के वस्तु की तरह ट्रीट किया जाता है।

उपरोक्त तीनों अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक गरीबी से निपटने के लिये एक नई प्रणाली RCT को विकसित किया है जिसके माध्यम से गरीबी उन्मूलन के लिये लागू की जाने वाली योजनाओं की प्रभावी जांच करने में मदद मिलेगी।

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आखिर RCT है क्या?

यह एक प्रकार का वैज्ञानिक प्रयोग है जिसके अंतर्गत व्यक्ति समूह को यादृच्छिक यानि Random  आधार पर दो समूहों में बांटा जाता है। इसमें से एक समूह में प्रयोग के तौर पर कुछ अधिक तत्व दिये जाते हैं तथा दूसरे समूह का उपचार पारंपरिक तरीके से ही किया जाता है। उसके बाद दोनों प्रयोगों से प्राप्त परिणामों की तुलना की जाती है। इस प्रयोग के परिणाम का उपयोग हस्तक्षेप की प्रभावशीलता का आंकलन करने के लिये किया जाता है।

आसान भाषा में कहें तो इस प्रक्रिया में किसी गांव को अपनी प्रयोगशाला बनाकर व्यक्ति समहू को किसी सब्जेक्ट या जानवर जैसा बर्ताव किया जाता है। कितना अमानवीय है ये। आप खुद ही सोच कर देखें कि अगर आपके साथ कोई ऐसा करे तो कैसा लगेगा? लेकिन फिर भी इस RCT का प्रयोग करने वालों को नोबल पुरस्कार दिया जाता है और लोग खुश भी होते है।

इंडियन एक्सप्रेस अनुसार यदि किसी समुदाय के लोगों को हमें मोबाइल वैक्सीनेशन की सुविधा देनी है तथा अनाज बाँटने हैं तो RCT प्रयोग के तहत गांव के लोगों को चार समूहों A, B, C तथा D में विभाजित किया जाएगा। समूह A को केवल मोबाइल वैक्सीनेशन की सुविधा दी जाएगी, समूह B को केवल अनाज दिया जाएगा, समूह C को दोनों सुविधाएँ दी जायेंगी तथा समूह D को कोई सुविधा नहीं दी जाएगी। इसमें समूह D को ‘नियंत्रित समूह’ कहा जाएगा जबकि अन्य सभी को ‘उपचार समूह’ कहा जाएगा। इस परीक्षण से प्राप्त परिणामों से यह पता चलेगा कि किसी विशेष हस्तक्षेप से किसी योजना के क्रियान्वयन में अलग-अलग समूहों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

माइकल क्रेमर ने इस प्रयोग को सर्वप्रथम केन्या के स्कूलों में लागू किया था एवं इस बात की जांच की थी कि मुफ्त खाना तथा किताब बांटने से बच्चों की शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

इससे पहले, RCT केवल बायोमेडिकल और स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में लोकप्रिय था। लेकिन अब सामाजिक वैज्ञानिकों ने लोगों पर किसी नीति के प्रभाव को देखने के लिए इस विधि का उपयोग करना शुरू कर दिया है। अब तक, अमेरिका RCT के लिए सबसे लोकप्रिय स्थान है, जहां RCT करने वाले अधिकांश शोधकर्ता आधारित हैं। हालांकि, भारत भी RCT की लोकप्रियता के मामले में अमेरिका से पीछे नहीं है और अमेरिका के बाद भारत का ही नंबर है। अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन के अनुसार, 2012 से भारत में 247 आरसीटी आयोजित किए गए हैं।

इसी के मद्देनजर भारत सरकार की पूर्व प्रधान आर्थिक सलाहकार इला पटनायक ने द प्रिंट में लिखा है कि भारत शोधकर्ताओं के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य के रूप में उभरा है। इसके कई कारणों में से एक है गरीब लोगों की अधिकता और भारत के अधिकांश हिस्सों में अंग्रेजी का उपयोग।

हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक बात यह है कि अभिजीत बनर्जी जैसे लोगों द्वारा की जाने वाली इस RCT को नियंत्रित करने के लिए एक कानूनी ढांचे की कमी। हालांकि, भारत ने वर्ष 2017 में biomedical और health research के लिए दिशानिर्देश तैयार किए थे लेकिन, non-clinical trials  के लिए अभी भी किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं है। आसान शब्दों में कहे तो गरीब लोग जिनपर ये अमीर विद्वान प्रयोग करते है उनकी जान की कीमत ही नहीं है। कई देशों में इस RCT के लिए कड़े दिशा निर्देश मौजूद है। जैसे जिनपर ये प्रयोग किया जा रहा है, उनसे पहले उनकी सहमति ली जाएगी।

केन्या, मलावी और कई अन्य गरीब देशों ने आरसीटी को कंट्रोल करने के लिए दिशानिर्देश तैयार कर चुके हैं। इसलिए, भारत अभी भी इस तरह के प्रयोगों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प बना हुआ है, जो अन्य देशों में आयोजित नहीं किए जा सकते हैं। शोधकर्ता को आमतौर पर विश्वविद्यालय संस्थागत समीक्षा बोर्डों (IRBs) या नैतिकता बोर्डों से बस ग्रीन सिग्नल की आवश्यकता होती है। शोधकर्ताओं को देश के दिशानिर्देशों का पालन करने की आवश्यकता होती है। लेकिन भारत जैसे देश के साथ जहां दिशानिर्देशों को अभी तक तैयार नहीं किया गया है, शोधकर्ता आमतौर पर ऐसे प्रयोगों को संचालित करने के लिए तुरंत अप्रूवल मिल जाता है।

भारत में अभिजीत बनर्जी जैसे लोगों द्वारा गरीबों को लैब के उपकरण की तरह प्रयोग करने के दौरान किसी भी प्रकार से सरकार का हस्तक्षेप नहीं होता और वे मनमानी ढंग से अपने प्रयोग को अंजाम देते है। जिन लोगों को सबजेक्ट बनाया जाता उनके अधिकारों के बारे में कोई नहीं सोचता और कम ही मामलों में उनकी सहमति ली जाती है। इस तरह से ऐसे प्रयोग में मानवाधिकार के हनन की संभावना अत्यधिक रहती है और इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता।

ऐसे में जब अभिजीत बनर्जी जो इस तरह के शोध कर लोगों को लैब के एक वस्तु की तरह ट्रीट कर नोबल पुरस्कार पा जाते है तो इससे इस तरह के शोध की संभावना और अधिक हो जाती है। जिस तरह से मीडिया ने उन्हें अपने सिर आँखों पर बैठाया उससे तो यही प्रतीत होता है कि जिन लोगों को किसी लैब के जानवर की तरह प्रयोग में लाया जाता, उनकी जान या उनके अधिकार का कोई महत्व ही नहीं है। अधिकतर मामलों में ये प्रयोग गरीब परिवारों पर ही किया जाता है जो समाज में सबसे कमजोर तबके से आते हैं और उनके  लिए कोई बोलने वाला भी नहीं होता है। अब देश की संसद को यह तय करना है कि इस तरह से प्रयोगों को नियंत्रित करने के लिए एक legislative framework तैयार करे जिससे और गरीबों पर अत्याचार न हो।

Tags: अभिजीत बनर्जीमीडिया
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