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मोपला दंगों के 100 साल, पर आज भी केरल में कुछ नहीं बदला है

इससे बड़े दुःख की बात और क्या होगी!

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
20 August 2021
in मत
मोपला विद्रोह

PC: VSK Bharat

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1921 में हुए मालाबार/मोपला विद्रोह की आज 100वीं वर्षगांठ है।

केरल के मालाबार के मुसलमानों का यह विद्रोह शुरू में खिलाफत आंदोलन के समर्थन और अंग्रेजों के खिलाफ था, परंतु जल्द ही इसने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। इस हिंसा में बड़े पैमाने पर हिंदुओं का नरसंहार किया गया था। हजारों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन किया गया। हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। यही कारण है कि मोपला विद्रोह को हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का पहला जिहाद कहा जाता है। परंतु आज भी केरल में हिंदुओं के खिलाफ जिहाद जारी है।

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1921 में केरल के मालाबार जिलों के मुस्लिम किसान जिन्हें मोपला के नाम से जाना जाता है, अपने जमींदारों, नंबूदरी और नायरों के खिलाफ उठ खड़े हुए थे।

दरअसल, हिंदू जमींदारो को क्षेत्रीय भाषा में ‘जेनमी’ कहा जाता था। 19वीं शताब्दी में केरल के मालाबार क्षेत्र के मोपलाओं ने जमीदारों के अत्याचारों से पीड़ित होकर कई बार विद्रोह किया था। अगस्त, 1921 में ये विद्रोह सांप्रदायिक कारणों से प्रेरित होकर हिंदुओं के नरसंहार में बदल गया जो कि खिलाफत आंदोलन का सांप्रदायिक विस्तार था। वरियंकुनाथ कुंजाहमद हाजि, सिथी कोया थंगल, अली मुसलियारी इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे।

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कारण:

20 अगस्त 1921 को, पुलिस ने पुक्कोट्टूर में एरनाड क्षेत्र के खिलाफत समिति के सचिव वडक्केविटिल मुहम्मद को गिरफ्तार करने का प्रयास किया। उसपर आरोप था कि उसने नीलांबुर में एक कोविलकम (जागीर) से एक हिंदू थिरुमुलपद की पिस्तौल चोरी की थी। पड़ोस से 2,000 मप्पिलाओं की भीड़ ने इस प्रयास को विफल कर दिया, लेकिन अगले दिन, पुलिस के एक दस्ते ने कई खिलाफत स्वयं सेवकों को गिरफ्तार कर लिया और तिरुरंगाडी में मम्बरम मस्जिद में रखे रिकॉर्ड को जब्त कर लिया, जिससे अफवाह फैल गई कि मस्जिद को अपवित्र कर दिया गया है। मोपलाओ की एक बड़ी भीड़ तिरुरंगडी पर जमा हो गई और स्थानीय पुलिस स्टेशन को घेर लिया। पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चलाईं, जिससे उग्र प्रतिक्रिया हुई, जिसने जल्द ही पड़ोसी क्षेत्रों के साथ-साथ एरानाड और वल्लुवनद तालुका को अपनी चपेट में ले लिया। बाद में इसका कहर हिंदुओं को झेलना पड़ा और उनका नरसंहार  दो महीने से अधिक समय तक जारी रहा।

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मोपला विद्रोह और सांप्रदायिकता:

मोपला विद्रोह प्रारंभ में वर्ग संघर्ष के रूप में शुरू हुआ था लेकिन बाद में उसने सांप्रदायिक रूप ले लिया। लेकिन, इसके विपरीत महात्मा गाँधी के आह्वान पर मालाबार में मोपलाओं के धार्मिक प्रमुख के नेतृत्त्व में एक ‘खिलाफत समिति’ का गठन किया गया। ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ‘ (।NC) द्वारा मोपला विद्रोह का समर्थन किया गया तथा कृषि सुधारों और स्वतंत्रता दोनों की मांग का एक साथ समर्थन किया गया। कुख्यात वरियामकुननाथ कुंजाहम्मद हाजी को खिलाफत आंदोलन के नेताओं तथा भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने उनको भारत में खिलाफत आंदोलन के प्रणेता के रूप में पेश किया। परंतु, ।CHR रिपोर्ट के अनुसार हाजी एक ‘कुख्यात मोपला विद्रोही नेता’ और ‘कट्टर अपराधी’ था। रिपोर्ट के अनुसार, हाजी ने वर्ष 1921 के मोपला विद्रोह के दौरान असंख्य हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला और उनके शवों को एक कुएँ में जमा कर दिया था। मोपला विद्रोह के अंतिम चरण में हाजी को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर, 20 जनवरी, 1922 को गोली मारकर हत्या कर दी गई।

विभीषिका:

विनायक दामोदर सावरकर ने अपने उपन्यास ‘मोपला’ के माध्यम से मोपला विद्रोह को हिंदू विरोधी नरसंहार के रूप में वर्णित करने वाले पहले इंसान थे, जो 1924 में प्रकाशित होने पर बेहद लोकप्रिय हो गया था।

एक अन्य पुस्तक, द मोपला रिबेलियन, 1921 के अनुसार, हाजी एक डाकू था जिसने विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1923 में प्रकाशित और क्षेत्र के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर सी गोपालन नायर द्वारा एक साथ रखी गई पुस्तक को इस घटना के सबसे प्रामाणिक खातों में से एक माना जाता है। नायर ने अपनी किताब में लिखा है, “हत्याएं, डकैती, जबरन धर्म परिवर्तन और हिंदू महिलाओं पर आक्रोश हर दिन का क्रम बन गया।”

यहां तक कि डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने ‘पाकिस्तान में विद्रोह और भारत विभाजन’ नामक अपनी किताब में इस नरसंहार पर एक विस्तृत विवरण प्रदान किया है। हिंदुओं के प्रति यह नरसंहार इतना नृशंस था कि सावरकर और अंबेडकर तक को एक मंच पर आना पड़ा।

निष्कर्ष:

‘संघ परिवार’ सहित अनेक हिंदूवादी नेताओं का मानना है कि मोपला विद्रोह में शामिल नेताओं ने न केवल सैकड़ों हिंदुओं का नरसंहार किया अपितु अनेक हिंदुओं को इस्लाम धर्मं अपनाने को मज़बूर किया गया।

आज के परिदृश्य को देखें तो केरल में अभी भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।

केरल मे मुसालमानों की आबादी 27% है। वहाँ की वामपंथी सरकार इसे वोट बैंक की तरह देखती है। आईएसआईएस और अन्य आतंकी संगठन के प्रति यहाँ के कुछ युवाओं का प्रेम देश विरोधी तत्वों को बढ़ावा देता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री द्वारा ‘शहीदों की सूची’ से संबंधित एक पुस्तक ‘शहीदों का शब्दकोष: भारत का स्वतंत्रता संग्राम वर्ष 1857-1947’ को जारी किया गया था। इस शब्दकोश में मोपला विद्रोह में शामिल नेताओं को भी स्वतंत्रता सेनानियों की ‘शहीद सूची’ में केरल की वामपंथी सरकार द्वारा शामिल किया गया था। जबकि, ‘भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद’  को रिपोर्ट में ‘मालाबार विद्रोह’ (मोपला विद्रोह) के नेताओं के नाम ‘शहीदों की सूची’ से हटाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में अली मुसलीयर, वरियामकुननाथ कुंजाहम्मद हाजी सहित 387 मोपला विद्रोहियों तथा ‘वैगन त्रासदी’ में शहीद नेताओं के नाम भी ‘शहीदों की सूची’ से हटाने की मांग की गई।

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एक फिल्म निर्देशक आशिक अबू द्वारा कुख्यात हिंदू नरसंहार वरियान कुन्नाथु कुंजाहमद के जीवन पर आधारित फिल्म की घोषणा के बाद इस्लामवादी नियंत्रित मलयालम फिल्म उद्योग इस नरसंहार की लीपापोती में जुट गया है। सत्तारूढ़ सीपीएम के तत्वावधान में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन, हिंदुओं में भय मनोविकृति पैदा करने के लिए 1921 के डर का इस्तेमाल कर रहे हैं। मलप्पुरम में हाल ही में सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान, पीएफआई-जेईआई चरमपंथियों ने नारे लगाए: “हमने मालाबार खंजर को नहीं फेंका है जिसे हमने 1921 में इस्तेमाल किया था।” 1921 के हिंदू नरसंहार की बरसी मनाने के लिए उन्होंने भड़काऊ नारेबाजी के साथ तलवारें और अन्य हथियार लेकर कई रैलियां भी की थीं। केरल को मोपला इतिहास से कुछ सीखना चाहिए वरना इतिहास आनेवाले वक़्त में इतिहास फिर से खुद को दोहराएगा।

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