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“मिशन 2024” के साथ ही भारत ने अब शुक्र ग्रह पर अपनी नजरें टिका दी है

शुक्र पर तिरंगा लहराने की हो गई है तैयारी!

Shashwat Singh द्वारा Shashwat Singh
7 May 2022
in चर्चित
ISRO शुक्रयान मिशन

Source- Google

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भारत विज्ञान की दुनिया में बहुत आगे पहुंच चुका है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी दुनिया की सबसे बेहतरीन अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है और इसने विश्व में भारत का कद एक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में काफी बढ़ा दिया है। इसी क्रम में चंद्रमा और मंगल मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद भारत, अमेरिका और कई अन्य देशों के साथ शुक्र पर जाने की दौड़ में शामिल होने के लिए पूरी तरह से तैयार है। भारत अब धरती की छोटी बहन कहे जाने वाले शुक्र ग्रह के लिए ‘शुक्रयान’ मिशन (वीनस मिशन) पर काम कर रहा है। इसे दिसंबर 2024 तक लॉन्च किया जा सकता है। भारत अमेरिका, रूस, जापान समेत उन चुनिंदा देशों में शामिल होने की रेस में शामिल हो गया है जिन्होंने धरती के सबसे करीबी ग्रह शुक्र यानी वीनस तक अंतरिक्षयान भेज चुके हैं। शुक्रयान शुक्र ग्रह के वातावरण का अध्ययन करेगा जो जीवन के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है। जो सल्फ्यूरिक एसिड के बादलों से घिरा हुआ है।

और पढ़ें: चंद्रयान के बाद सूर्य, मंगल, शुक्र की बारी, इसरो के नए प्रोजेक्ट दिलचस्प हैं

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दिसंबर 2024 तक होगी लॉन्चिंग

इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ का कहना है कि “शुक्रयान मिशन पर काम सालों से चल रहा है और अंतरिक्ष एजेंसी अब “शुक्र पर एक ऑर्बिटर भेजने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “प्रोजेक्ट रिपोर्ट बन चुकी है, सारे प्लान तैयार हैं, लागत की तैयारी हो चुकी है। भारत के लिए शुक्र की कक्षा में मिशन भेजना बहुत कम समय में मुमकिन है क्योंकि हमारे पास आज यह क्षमता है।” भारत के शुक्रयान मिशन को औपचारिक तौर पर ‘शुक्रयान’ मिशन नाम नहीं दिया गया है लेकिन जिस तरह मून मिशन को चंद्रयान, मार्स मिशन को मंगलयान नाम दिया गया, उसी तरह इसरो के वीनस मिशन को शुक्रयान नाम दिया जा सकता है।

भारत दिसंबर 2024 तक शुक्रयान मिशन को लॉन्च करना चाहता है। इसकी वजह ये है कि उस वक्त पृथ्वी और शुक्र ग्रह की स्थिति ऐसी रहेगी कि किसी स्पेसक्राफ्ट को वीनस तक पहुंचने में कम से कम ईंधन लगे। अगर दिसंबर 2024 में लॉन्चिंग नहीं हो पाती है तो फिर उसके 7 साल बाद यानी 2031 में उस तरह की अनुकूल खगोलीय स्थिति बन पाएगी। हालांकि, इसरो ने अभी आधिकारिक तौर पर शुक्रयान मिशन के लिए कोई टाइमलाइन जारी नहीं किया है।

शुक्रयान मिशन के लिए जिन एक्सपेरिमेंट्स की योजना बनाई गई है उनमें सतह की जांच करना, सतह के निचले भाग की परतों की जांच करना, शुक्र ग्रह पर कहां-कहां ज्वालामुखी सक्रिय हैं, किस तरह लावा बह रहे हैं, वातावरण किन-किन चीजों से बना है यानी एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री आदि का अध्ययन करना शामिल है। इसके अलावा सौर हवाओं का शुक्र के आयनमंडल यानी आयनोस्फेयर पर क्या असर पड़ता है, इसकी जांच की जाएगी।

जानें क्यों महत्वपूर्ण है यह शुक्रयान मिशन?

आपको बता दें कि शुक्र ग्रह धरती का सबसे नजदीकी ग्रह है। उसे सोलर सिस्टम का पहला ग्रह माना जाता है जहां जीवन था। कभी वह बिल्कुल धरती की तरह था। आकार में भी पृथ्वी जैसा ही। धरती की तरह वहां भी महासागर था। वहां की जलवायु भी धरती की तरह थी लेकिन अब शुक्र ग्रह जीवन के लायक नहीं है। वहां सतह का तापमान 900 डिग्री फारेनहाइट यानी 475 डिग्री सेल्सियस है। ये तापमान इतना ज्यादा है कि शीशे तक को पिघला सके। वीनस का वातावरण बहुत जहरीला है। वह कॉर्बनडाई ऑक्साइड से भरा पड़ा है। शुक्र ग्रह सल्फ्यूरिक एसिड के पीले बादलों से घिरा हुआ है। शुक्र के वातावरण का घनत्व पृथ्वी के मुकाबले 50 गुना ज्यादा है। ये सोलर सिस्टम का सबसे गर्म ग्रह है। कभी सोलर सिस्टम का पहला जीवन वाला ग्रह रहा शुक्र आज नरक की तरह क्यों है? ये क्यों और कैसे हुआ? कहीं धरती की भी वही स्थिति तो नहीं हो जाएगी? दुनियाभर के वैज्ञानिक इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। वीनस के अध्ययन से धरती पर भी जीवन के संभावित विनाश को टाला जा सकता है।

इसरो के अलावा, नासा पृथ्वी के इस रहस्यमय जुड़वां ग्रह का अध्ययन करने के लिए शुक्र पर दो अंतरिक्ष यान भेज रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने शुक्र की दुनिया का पता लगाने के लिए करीब 1 अरब डॉलर की राशि निर्धारित की है। इसी तरह, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने भी पड़ोसी ग्रह के लिए एक मिशन की घोषणा की है। यूरोप का एनविज़न शुक्र के ऊपर चक्कर लगाने वाला अगला ऑर्बिटर होगा, जो ग्रह के आंतरिक कोर से ऊपरी वायुमंडल तक एक समग्र दृश्य प्रदान करेगा। ध्यान देने वाली बात है कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ, दुनिया भर में अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा सौर प्रणाली के अध्ययन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा सकती है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी भी हमारे सौर मंडल के ज्ञान आधार का विस्तार करने के लिए अवलोकन क्षमताओं और कम्प्यूटेशनल प्रौद्योगिकियों का उपयोग कर रही है और भारतीय अंतरिक्ष तंत्र इस बार पूरी कोशिश में हैं कि शुक्रयान मिशन सफलतापूर्वक हो जाए।

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हालांकि, शुक्रयान मिशन को लेकर भारत पर सभी की नजरें इसलिए टिकी हुई है क्योंकि ISRO के किसी भी मिशन के फेल होने की संभावना लगभग न के बराबर होती है और इसरो लगातार इसे सिद्ध करते आया है। अगर इसरो की सफलता की बात करें तो1969 में स्थापित, इसरो की सफलता की कहानियां कहीं अधिक हैं और इस एजेंसी ने देश को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आसमान तक पहुंचा दिया है। इसरो की कुछ प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार है। भारत का पहला उपग्रह, आर्यभट्ट,19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ द्वारा अंतरिक्ष में छोड़ा गया था। इसका नाम महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था। इसने 5 दिन बाद काम करना बन्द कर दिया था। लेकिन यह अपने आप में भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।

7 जून 1979 को भारत का दूसरा उपग्रह भास्कर जो 442 किलो का था, पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया।

1980 में रोहिणी उपग्रह पहला भारत-निर्मित प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बन गया जिसे कक्षा में स्थापित किया गया।

1983: INSAT की लॉन्चिंग, इसरो ने संचार और प्रसारण उद्देश्यों के लिए नौ उपग्रह लॉन्च किए।

1993: PSLV ने 40 विभिन्न देशों के 40 से अधिक उपग्रहों को लॉन्च किया है।

2008: भारत ने अपना पहला चंद्र मिशन लॉन्च किया।

2014: मंगल पर सफल मिशन और मिशन मंगलयान की लागत अमेरिका द्वारा किए गए पहले मंगल मिशन की तुलना में 10 गुना कम है।

2016: भारत का अपना उपग्रह नेविगेशन सिस्टम IRNSS बनाया गया।

Tags: ISROभारतीय अंतरिक्ष एजेंसीवीनस मिशन
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