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गुमनायक नायक: बंगाल के ‘वास्तविक टाइगर’ बाघा जतिन की कहानी

यह कहानी कोई और आपको नहीं बताएगा!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
7 August 2022
in इतिहास, ज्ञान
baag jatin

Source- TFIPOST.in

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जब कोई आपसे शुद्ध बांग्ला में कहे, “आमरा मोरबो, जगत जॉगबे” तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होती? आप कहते – पागल हो क्या, हमारे मरने से क्या होगा? परंतु एक मतवाले ऐसे भी थे, जिनके प्रभाव, जिनके शौर्य से उनके शत्रु तक प्रभावित थे। एक साम्राज्यवादी का तो यहां तक मानना था कि यदि वो कुछ दिनों तक और जीवित रहते तो अकेले ही भारत को स्वतंत्र कराने योग्य थे। जिस बंगाल टाइगर को बंगाल के वैभव और उसके समृद्धि का प्रतीक माना जाता हैं, आज बंगाल उसका अंशमात्र भी नहीं है। आज एक भी बंगाली ऐसा नहीं है जो गर्व से यह कह सके कि वह अपने पूर्वजों के स्वप्नों के बंगाल को आत्मसात कर पाया है।

हालांकि, ऐसा प्रारंभ से नहीं था। एक ऐसा भी समय था, जब बंगाल का दूसरा नाम शौर्य था, जब बंगाल के हर दूसरे घर में क्रांतिकारी दिखते थे। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे जतींद्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें लोग ‘बाघा जतिन’ भी कहते थे। परंतु यह नाम उन्हें किसलिए मिला और ‘बाघा जतिन’ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए तांडव का पर्याय कैसे सिद्ध हुए? उनका जन्म 7 दिसंबर 1879 को जैसोर जिले में में सन् १८७९ ईसवी में हुआ परंतु उनका बचपन कठिनाइयों से परिपूर्ण था। अल्पायु में ही उनके पिता का देहावसान हो गया और मां ने बड़ी कठिनाई से उनका लालन-पालन किया। १८ वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली और परिवार के जीविकोपार्जन हेतु स्टेनोग्राफी सीखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए।

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जतींद्रनाथ मुखर्जी बालपन से ही हृष्ट पुष्ट थे। कहते हैं कि एक बार जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक बाघ से हो गयी। उन्होंने बाघ को अपने हंसिये से मार गिराया था। इस घटना के बाद यतीन्द्रनाथ “बाघा जतीन” नाम से विख्यात हो गए थे। कुछ जन श्रुतियों के अनुसार उन्होंने यह कार्य बचपन में अपनी बहन को बचाने हेतु किया था, जिसमें वो बुरी तरह घायल भी हुए परंतु जो भी था, इस कार्य के पश्चात ‘बाघा जतिन’ का नाम उनके साथ सदैव के लिए जुड़ गया।

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20वीं सदी प्रारंभ हो रही थी और देश एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के युग को अनुभव कर रहा था। एक ओर ब्रिटिश शासन अपनी जड़ों को जमा रहा था तो दूसरी ओर देशवासियों को अपने अधिकारों की अनुभूति हो रही थी। तीसरी ओर अंग्रेज़ी शिक्षा के चाशनी में डूबी कुछ महान आत्माएं कांग्रेस में नरम दल के नाम पर ‘अधिकारों’ की भीख मांगने में जुटी हुई थी और परिणाम निकला – निल बटे सन्नाटा।

उसी समय 1905 में तत्कालीन भारतीय वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की और कांग्रेस की राजनीतिक निष्क्रियता को देखते हुए ‘गरम दल’ का उद्भव हुआ, जिन्होंने क्रांतिकारियों को बढ़ावा देना प्रारंभ किया। इसका लाभ उठाते हुए बंगाल के युवा क्रांतिकारियों ने आक्रामक रूप से भारत की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन पर कार्य करना प्रारंभ किया और इन्हीं आक्रामक क्रांतिकारियों में सम्मिलित थे जतींद्रनाथ मुखर्जी। कुछ समय बाद वो श्री अरबिंदो के सम्पर्क में आये, जिसके बाद उनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ विद्रोह की भावना और भी प्रबल हो गयी। महर्षि अरबिंदो की प्रेरणा से उन्होंने ‘युगांतर’ नामक गुप्त संगठन बनाई। यह संस्था नौजवानों में बहुत मशहूर थी, उन्होंने स्वयं इसकी कमान संभाली।

बंगाल विभाजन के बाद देश में उथल-पुथल शुरू हो चुकी थी। अंग्रेजों के खिलाफ़ जनता का आक्रोश जितना बढ़ रहा था, ब्रिटिश हुकूमत का उत्पीड़न भी उतना ही तीव्र होता जा रहा था। ऐसे में बाघा जतिन ने ‘आमरा मोरबो, जगत जॉगबे’ का नारा दिया, जिसका मतलब था कि ‘जब हम मरेंगे तभी देश जागेगा’! उनके इस साहसी कदम से प्रेरित होकर बहुत से युवा युगांतर में शामिल हो गये। जल्द ही युगांतर के चर्चे भारत के बाहर भी होने लगे। अन्य देशों में रह रहे क्रांतिकारी भी इस पार्टी से जुड़ने लगे। अब यह क्रांति बस भारत तक ही सीमित नहीं थी बल्कि पूरे विश्व में अलग-अलग देशों में रह रहे भारतीयों को जोड़ चुकी थी। बाघा जतिन ने सशस्त्र तरीके से ‘पूर्ण स्वराज’ प्राप्त करने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई।

वर्ष 1908 में बंगाल में कई क्रांतिकारियों को मुजफ्फरपुर के अलीपुर बम प्रकरण में आरोपित किया गया लेकिन बाघा जतिन गिरफ्तार नहीं हुए थे। उन्होंने गुप्त तरीके से देशभर के क्रांतिकारियों को जोड़ना शुरू किया। वो बंगाल, बिहार, उड़ीसा और संयुक्त प्रांत के विभिन्न शहरों में क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित करने में लग गये। यूं समझ लीजिए कि जो कार्य HRA के लिए चंद्रशेखर आज़ाद करते थे, वही कार्य युगांतर के लिए जतींद्रनाथ मुखर्जी करते थे। दोनों के विचार भी अधिक भिन्न नहीं थे और दोनों ही अंतिम श्वास तक देश की स्वाधीनता के लिए लड़ते रहें।

क्या आपको पता है कि रासबिहारी बसु, जतींद्रनाथ मुखर्जी से प्रभावित होकर क्रांति आंदोलन में जुड़े थे? 27 जनवरी,1910 को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया गया था लेकिन उनके खिलाफ़ कोई ठोस प्रमाण न मिलने के कारण कुछ दिनों के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से अपनी रिहाई के बाद बाघा जतिन ने राजनीतिक विचारों और विचारधाराओं के एक नए युग की शुरूआत की। उनकी भूमिका इतनी प्रभावशाली रही कि क्रांतिकारी रासबिहारी बसु ने बनारस से कलकत्ता स्थानांतरित होकर जतींद्रनाथ मुखर्जी के नेतृत्व में काम करना शुरू कर दिया था।

दिल्ली में जार्ज पंचम के १२ दिसंबर १९११ को होने वाले दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी बसु की प्रमुख भूमिका रही थी। अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसन्त कुमार विश्वास ने वेश बदलकर उन पर बम फेंका परंतु उनका निशाना चूक गया। उसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बसु के पीछे लग गयी परंतु उन्होंने चतुराई से देहरादून की ट्रेन पकड़ ली और ऑफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। ये तो कुछ भी नहीं, अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी, जिसमें उन्होंने वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की। इस प्रकार उन पर इस षडयंत्र और कांड का प्रमुख सरगना होने का किंचित मात्र भी सन्देह किसी को नहीं हुआ।

इसी बीच वर्ष 1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के समय जतींद्रनाथ मुखर्जी की मुलाकात रासबिहारी बसु से हुई। ऐसे ओजस्वी व्यक्ति से मिलकर रासबिहारी बसु इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन में जुट गये। भारत को स्वतंत्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनायी। फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रांतिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गयी। विदेश में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में प्रथम आजाद हिन्द की सरकार भी स्थापित की गई, जिसमें करतार सिंह सराभा, सोहन सिंह भाकना, रास बिहारी बसु जैसे लोगों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

युगांतर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूंकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गये हुये हैं अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। जतींद्रनाथ मुखर्जी तब भी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आए परंतु एक दिन भाग्य उनके विपरीत चला ही गया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बसु को पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति के लिये जून 1915 में राजा पी. एन. ठाकुर के छद्म नाम से जापान प्रशासित  शंघाई में पहुंचे और वहां रहकर भारत देश की आजादी के लिये काम करने लगे।

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कलकत्ता में उन दिनों राडा कंपनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। इस कंपनी की एक गाडी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को ५२ मौजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियां प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सरकार को ज्ञात हो चुका था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ की डकैतियों में यतींद्रनाथ का हाथ था। ९ सितंबर १९१५ को पुलिस ने यतींद्रनाथ का गुप्त अड्डा ‘काली पोक्ष’ (कप्तिपोद) ढूंढ़ निकाला। वो साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि राज मोहंती नमक अफसर ने गांव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की। बढ़ती भीड़ को तितरबितर करने के लिए यतींद्रनाथ ने गोली चला दी। राज मोहंती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया। किल्वी दल बल सहित वहां आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था, यतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियां चली, चित्तप्रिय ने वहीं पर देह त्याग दिया।

वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्रनाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर ‘पानी-पानी’ चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगे। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त यतींद्रनाथ ने किल्वी से कहा, ‘गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं।’ इसके अगले दिन, 10 सितंबर 1915 को  इस महान सिपाही ने अस्पताल में सदा के लिए आंखें मूंद ली। इस हमले के एक महत्वपूर्ण साक्षी रहे ब्रिटिश साम्राज्यवादी चार्ल्स टेगार्ट ने उन्हें नमन करते हुए कहा था कि “अगर बाघा जतिन अंग्रेज होते तो अंग्रेज लोग उनका स्टैच्यू लंदन में ट्रेफलगर स्क्वायर पर नेल्सन के बगल में लगवाते।” उन्हीं के शौर्य से प्रभावित होकर भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनंत क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया परंतु देश का दुर्भाग्य देखिए, उन्हें अपना उचित सम्मान प्राप्त करने हेतु दशकों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

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10 दिनों की धूमधाम के बाद बप्पा के विसर्जन के साथ ही गणेश उत्सव समाप्त हो गया। गणपति महोत्सव हिंदू धर्म का बहुत ही खास...

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