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घूसखोरी और धोखाधड़ी जैसे संगीन अपराधों के बावजूद तीस्ता सीतलवाड़ को ‘विशेषाधिकार’ क्यों?

तीस्ता सीतलवाड़ को 'पीड़ित' समझने की भूल न करें!

TFI Desk द्वारा TFI Desk
4 September 2022
in चर्चित, समीक्षा
Teesta Seetalvad

Source- Google

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देश में समाजसेवा के नाम पर चल रहे NGO असल में एजेंडा चलाने से लेकर देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त पाए जाते रहे हैं। NGO कुछ राजनीतिक दलों के लिए सहायक बनकर उनका एजेंडा जनता के सामने परोसते रहते हैं और ऐसी ही एक NGO की कर्ताधर्ता हैं तीस्ता सीतलवाड़। तीस्ता ने गुजरात दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक एजेंडा चलाया लेकिन जब पीएम मोदी क्लीन चिट पा चुके हैं तो तीस्ता के दुष्प्रचार को लेकर उन पर भी कार्रवाई जारी है। हालांकि, उन्हें फिलहाल जमानत मिली है लेकिन यह बताता है कि तीस्ता को किस स्तर पर विशेष अधिकारों का फायदा मिल रहा है।

दरअसल, समाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ गिरफ्तारी के दो महीने से अधिक समय बाद शनिवार को जेल से बाहर आईं हैं। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को सीतलवाड़ को अंतरिम जमानत दे दी थी। सीतलवाड़ को वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के संबंध में ”निर्दोष लोगों” को फंसाने के लिए कथित तौर पर सुबूत गढ़ने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 26 जून को गिरफ्तार किया गया था और शनिवार को दो महीने बाद वो बाहर आईं हैं। तीस्ता सीतलवाड़ की कहानी जेल जाने से बाहर आने की नहीं है बल्कि उनका व्यक्तित्व किसी काले कारनामे करने वाली महिला के समान है तो चलिए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या है?

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समझिए पूरा मामला

गुजरात दंगों के दौरान राज्य की स्थिति को भड़काने और नरेंद्र मोदी की छवि को धूमिल करने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ ने उनके खिलाफ केस तक लड़ा। जाकिया जाफरी केस में भी उन्होंने नरेंद्र मोदी को घसीटा। सीतलवाड़ ने दंगो के तथ्यों से छेड़छाड़ करते हुए कदम कदम पर जांच को प्रभावित करने की कोशिश की। उन्होंने पीड़ित बनकर और पीड़ितों का साथ देने का ढोंग करते हुए अपना पूरा जीवन ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ काम करने में लगा दिया। यह कुछ ऐही स्थिति थी कि मानों उन्हें कोई अहम कॉन्ट्रैक्ट मिला है।

तीस्ता सीतलवाड़ भले ही खुद को समाजिक कार्यकर्ता दिखाने का ढोंग करती हों लेकिन सच तो यह है कि उन पर भ्रष्टाचार से जुड़े अनेकों आरोप हैं। तीस्ता पर विशेषाधिकार का गलत तरीके से उपयोग करने से लेकर उनके NGO में फंडिंग से जुड़े कई मामले भी संदिग्ध हैं।  तीस्ता के खिलाफ आइपीसी के सेक्शन 194, 211, 218, 468, 471 और सेक्शन 120बी के चार्ज लगाए गए हैं। तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ एक ही केस नहीं है बल्कि उनके क्राइम फाइल की लंबी फेहरिस्त है। तीस्ता के खिलाफ कम से कम तीन केस पेंडिंग है। इनमें से पहला केस अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के पास है। यह केस दंगा पीड़ितों के लिए जमा किए गए पैसों में गड़बड़ी का है।

NGO के जरिए धोखाधड़ी

आरोप हैं कि तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ सिटिजन्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने दंगा पीड़ितों के लिए फंड एकट्ठा किया। म्युजियम ऑफ रेजिडेंस बनाने के लिए 9.75 करोड़ का चंदा लिया। तीस्ता सीतलवाड़ ने इनमें से 3.85 करोड़ रुपये अपने ऊपर खर्च किए। एनजीओ के फंड में पैसा आ जाने पर तीस्ता ने दंगा पीड़ितों की मदद नहीं की। तीस्ता ने 1 करोड़ 53 लाख रुपये अपने अकाउंट में ट्रांसफर करा लिए। 96 लाख रुपये तीस्ता के पति के खाते में ट्रांसफर हुए। इसके अलावा यह महिला किस तरह से झूठे एजेंडे गढ़ती है यह सर्वविदित है। खास बात यह है कि जिस विशेषाधिकार का प्रयोग कर ये जरूरतमंदों की मदद का ढोंग रचती हैं असल में उसके पीछे इनकी सोच कुछ खास लोगों को राजनीतिक लाभ पहुंचाने की रही है‌।

तीस्ता पर बड़ा आरोप यह है कि उन्होंने जाकिया जाफरी को पीएम मोदी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भड़काया। जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2006 में जाकिया जाफरी ने जो मूल शिकायत दर्ज कराई थी, वह 30-40 पेज की थी। इसमें आरोप लगाए गए थे कि बड़ी साजिश के तहत दंगे हुए थे जिसमें सत्ताधारी पार्टी के नेता, नौकरशाह और पुलिस भी शामिल थी। यानी राज्य ही अपने लोगों के खिलाफ हो गया था। SIT की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए मुकुल रोहतगी ने कहा कि वक्त बीतने के साथ आरोपों की फेहरिस्त बढ़ती गई। कई तरह के गंभीर आरोप जुड़ते गए। शिकायत सैकड़ों पेज की हो गई और वर्ष 2018 में नए सिरे से जांच की मांग की गई।

क्रूर हत्याओं की भयानक कहानियां गढ़ी गई

गुजरात दंगों के आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार SIT ने दंगा पीड़ितों के लिए प्रचार करने वाले गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को ही मामले को मसालेदार बनाने का जिम्मेदार माना है। सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन के नेतृत्व में एसआईटी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि प्रसिद्ध अधिकार कार्यकर्ता ने क्रूर हत्याओं की भयानक कहानियां गढ़ी हैं। एसआईटी ने न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत, न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति पी सदाशिवम की पीठ के समक्ष प्रस्तुत एक रिपोर्ट में कहा कि हत्याओं और हिंसा की कई घटनाओं को गढ़ा गया, तत्कालीन पुलिस प्रमुख पीसी पांडे के खिलाफ झूठे आरोप लगाए गए और झूठे गवाहों को काल्पनिक घटनाओं के बारे में सबूत देने के लिए सिखाया गया।

इसके साथ ही SIT ने कहा कि गुलबर्ग सोसाइटी मामले में यह आरोप लगाया गया था कि पांडे दंगाइयों के प्रकोप का सामना कर रहे लोगों की सुरक्षा के उपाय करने के बजाय भीड़ की मदद कर रहे थे। गुजरात के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने एसआईटी रिपोर्ट के हवाले से कहा कि सच्चाई यह थी कि वह दंगा पीड़ितों के अस्पताल में भर्ती होने और पुलिस बंदोबस्त की व्यवस्था करने में मदद कर रहे थे।

हालांकि, इन सभी मामलों में SIT ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी। इतना ही नहीं SIT की क्लीन चिट पर भी सवाल उठाए गए थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने SIT की रिपोर्ट को भी सही माना था। 22 वर्ष तक नरेंद्र मोदी की छवि के साथ खिलवाड़ करने वाली ये भ्रष्टाचारी और विशेषाधिकार का हनन करने वाली तीस्ता अभी भी अपने गुनाहों को मानने करने के बजाए स्वयं को एक पीड़ित के तौर पर पेश कर रही हैं जो कि इनकी धूर्तता की पराकाष्ठा है।

और पढ़ें: अहमद पटेल ने तीस्ता को दिए थे 30 लाख, मोदी सरकार को गिराने और BJP नेताओं को फंसाने का था षड्यंत्र

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