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कैसे साइकिल पर डिटर्जेंट बेचते बेचते करसनभाई पटेल ने रची Nirma के सफलता की कथा

जहाँ चाह, वाह राह!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
12 September 2023
in व्यवसाय
कैसे साइकिल पर डिटर्जेंट बेचते बेचते करसनभाई पटेल ने रची Nirma के सफलता की कथा
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उद्योग के जगत में कई ऐसे उद्यमी निकले हैं, जिनकी यात्रा भले ही छोटी जगहों से प्रारम्भ हुई हो, परन्तु सपने बड़े थे, और उन्हें पूरा करने की ललक भी अद्भुत थी. करसनभाई पटेल ऐसे ही एक ज्वलंत उदहारण रहे हैं. किसे पता था कि पाटन एवं अहमदाबाद की गलियों में साइकिल से डिटर्जेंट बेचने वाला एक दिन एक प्रभावशाली ब्रांड का स्वामी एवं सफल उद्योगपति बनेगा. परन्तु ये कथा है समर्पण, इनोवेशन एवं अपने सपनों में अटूट विश्वास की. आइये जानते हैं कि कैसे करसनभाई पटेल ने निरमा ब्रांड के साथ उद्यमिता में अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की!

लैब सहायक से 20000 करोड़ से भी बड़े साम्राज्य तक

करसनभाई पटेल उन लोगों में से नहीं थे, जिन्हे उद्यमिता विरासत में मिली थे, अथवा किसी धनाढ्य परिवार से उनका नाता था. इनका 1945 में गुजरात के पाटन जिले में जन्म हुआ था, जहाँ स्वप्न परिश्रम की उपजाऊ भूमि में उगाये जाते थे.

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करसनभाई पटेल केवल एक नाम मात्र नहीं है. वे उस निरमा ग्रुप के संस्थापक, जिनका प्रभाव सीमेंट से लेकर डिटर्जेंट, साबुन, कॉस्मेटिक्स, यहाँ तक कि शिक्षा के क्षेत्र में भी व्याप्त है. इनके करकमलों से अहमदाबाद में Nirma Education and Research Foundation (NERF) एवं निरमा विश्वविद्यालय फल फूल रहे हैं.

परन्तु पहले इनके बीते हुए कल पर भी प्रकाश डालते हैं. 1960 के दशक में केवल रसायनशास्त्र में बीएससी की डिग्री सहित इन्होने बतौर लैब सहायक अपनी यात्रा प्रारम्भ की, और शीघ्र ही इन्हे न्यू कॉटन मिल्स में काम मिला. इसके पश्चात् इन्हे गुजरात सरकार के भूविज्ञान एवं खनन विभाग में एक अच्छी खासी नौकरी भी मिली, परन्तु इनका मन उद्यमिता में ही लगा हुआ था.

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इसीलिए 1969 में इन्होने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए अपनी नौकरी छोड़ी, एवं डिटर्जेंट व्यवसाय में अपना भाग्य आजमाने का निर्णय किया. इनकी प्रारंभिक फैक्ट्री की नींव इनके घर के आंगन में पड़ी. प्रारम्भ में इन्हे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. परन्तु इनके लिए पराजय स्वीकार करना विकल्प नहीं था.

करसनभाई जल्द ही डिटर्जेंट उद्योग में क्रांति लाने के लिए निकल पड़े। उन्होंने आस पड़ोस में घूम-घूमकर दरवाजे खटखटाए और अपने हस्तनिर्मित रत्न पेश किए। उस समय डिटर्जेंट का मूल्य यदि १० से १५ रुपये होता, तो वे इसे मात्र 3 रुपये प्रति किलोग्राम के दर पे बेचने लगे। कुछ ही समय में सफलता उनके द्वार खटखटाने लगी।

कैसे Nirma हुई जन जन में लोकप्रिय

आपको पता है कि निरमा, जो एक समय भारत के डिटर्जेंट उद्योग में अग्रणी रहा था, केवल एक ब्रांड नहीं था, अपितु अपनेपन का एक अद्भुत प्रतीक था? बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि निरमा ब्रांड करसनभाई ने अपनी पुत्री निरुपमा के नाम पर रखा था.

1970 तक आते आते करसनभाई ने अपनी नौकरी को पूर्णत्या त्याग दिया. ये एक साहसी दांव था, परन्तु करसनभाई ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके स्वयं के शब्दों में, “मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था. क्योंकि किसी ने मुझसे पूर्व परिवार में ऐसा कार्य नहीं किया था, इसीलिए मेरे उद्यम को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिला. परन्तु वो क्या है, उत्तरी गुजरात के रग रग में उद्यमिता बसी हुई है”. इसी प्रेरणा के साथ करसनभाई ने अहमदाबाद में अपने उद्यम के लिए एक छोटी सी दुकान बसाई. शीघ्र ही निरमा ब्रांड का प्रभाव गुजरात और महाराष्ट्र से आगे पूरे देश में फैलने लगे.

तो निरमा में ऐसा क्या था, जो अन्य डिटर्जेंट्स में नहीं. ये न केवल गुणवत्ता से परिपूर्ण था, अपितु अफोर्डेबल भी था. ये जल्द ही भारतीय गृहस्थियों की शोभा बढ़ाने लगा, और अगर आप इसके विज्ञापनों से परिचित हैं, तो आप भी जानते हैं कि निरमा की ब्रांड वैल्यू कैसी है. सौ की सीधी एक बात, निरमा केवल एक ब्रांड नहीं, एक इमोशन भी था!

परन्तु ये राह भी बहुत सरल नहीं थी.  1970 से 1980 के दशक में डिटर्जेंट उद्योग में मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन, विशेषकर हिंदुस्तान लीवर का वर्चस्व व्याप्त था. उस समय सर्फ डिटर्जेंट १३ रुपये किलो के दाम से बिकता था. ऐसे में निरमा के लिए प्रतिस्पर्धा बड़ी तगड़ी थी, परन्तु करसनभाई के लिए पीछे हटना विकल्प नहीं था. 1990 आते आते निरमा भारत में सर्वाधिक बिकने वाला डिटर्जेंट बन गया, जो करसनभाई पटेल की उद्यमिता एवं उनकी जिजीविषा का स्पष्ट परिचायक है.

निरमा की सफलता केवल उसके ओनर्स तक सीमित नहीं रही. 2004 तक आते आते ये 14000 व्यक्तियों को रोज़गार देने लगा, जिससे ये भारत के शीर्ष एम्प्लॉयर्स में सम्मिलित हो गया. करसनभाई के दृष्टिकोण ने न केवल डिटर्जेंट मार्केट में व्यापक परिवर्तन को बढ़ावा दिया, अपितु कुछ हानिकारक फॉस्फेट को खत्म करके पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में भी प्रगति की।

आज, करसनभाई पटेल  सफलता के दृढ़निश्चयी प्रतीक के रूप में विद्यमान हैं। मई 2023 तक, उनकी कुल संपत्ति 2.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 22,070 करोड़ रुपये) है। वह फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची और भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची का हिस्सा रहे हैं, जो उद्योग जगत के एक सच्चे दिग्गज हैं। 2010 में, उन्हें प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो समाज में उनके उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है।

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निरमा की अद्वितीय विरासत

सस्ते और गुणवत्तापूर्ण डिटर्जेंट्स के लिए अपनी पहचान अर्जित करने के पश्चात् निरमा ने प्रीमियम सुपर निरमा डिटर्जेंट के साथ-साथ निरमा बाथ और निरमा ब्यूटी साबुन जैसे उत्पादों को पेश करके higher end market में विस्तार किया। हालाँकि शैम्पू और टूथपेस्ट बाज़ार में प्रवेश करने के उनके प्रयासों को उतनी सफलता नहीं मिली, लेकिन उनका खाद्य नमक उत्पाद, शुद्ध को कुछ हद तक सफलता मिली। कुल मिलाकर, निरमा सोप केक मार्केट का लगभग 20% और डिटर्जेंट बाजार में ३५ प्रतिशत हिस्सेदारी का दावा करता है। निरमा का परिचालन आसपास के देशों में भी सफलतापूर्वक फैला हुआ है।

इसके अतिरिक्त निरमा की सफलता ने करसनभाई पटेल को शिक्षा के क्षेत्र में  भी योगदान देने के लिए प्रेरित किया. 1995 में, करसनभाई पटेल ने अहमदाबाद में निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की शुरुआत की, जो तब से गुजरात में एक प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेज बन गया है। बाद में, एक प्रबंधन संस्थान जोड़ा गया, और 2003 में, ये सभी संस्थान निरमा यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की छत्रछाया में एकजुट हो गए। निरमा एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन इस शैक्षिक प्रयास की देखरेख करता है। 2004 में, इच्छुक उद्यमियों को प्रशिक्षित करने और समर्थन देने के उद्देश्य से, Nirmalabs शिक्षा परियोजना शुरू की गई थी।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, करसनभाई ने अगली पीढ़ी को कमान सौंपने का फैसला किया। उनके दो बेटे, राकेश पटेल और हिरेनभाई पटेल, अब विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि निरमा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा की किरण के रूप में चमकता रहे।

आज के अति प्रतिस्पर्धी युग में करसनभाई पटेल ने अपने उदाहरण से ये सिद्ध किया अगर आपके इरादे नेक हो, और आपका संकल्प दृढ़निश्चयी, तो तनिक इनोवेशन के साथ कोई भी व्यक्ति मामूली शुरुआत से उठकर एक साम्राज्य बना सकता है। उनकी कहानी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सफलता इस आधार पर भेदभाव नहीं करती कि आपने कहाँ से शुरुआत की है; यह उन लोगों को पुरस्कृत करता है जो अपने सपनों को पूरा करने का साहस करते हैं।

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