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हाजी पीर दर्रा: भूली हुई जीत, जिंदा ज़ख्म — पुरानी भूल सुधारने का यही वक्त है

समुद्रतल से 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हाजी पीर आज भी कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ का सबसे अहम और सेफ रास्ता बना हुआ है

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
9 May 2025
in इतिहास, रक्षा
28 अगस्त के भारतीय सैनिकों ने रणनीतिक हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया था (सोर्स: www.adityaaryaarchive.com)

28 अगस्त के भारतीय सैनिकों ने रणनीतिक हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया था (सोर्स: www.adityaaryaarchive.com)

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आज से क़रीब 6 दशक पहले भारत से पाकिस्तान के रणनीतिक मोर्चे पर एक ऐसी ही भूल हुई थी, जिसकी सज़ा आने वाली आने वाली एक पूरी पीढ़ी ने भुगती या यूं कहें कि भुगत रहे हैं- ख़ासकर कश्मीरी। भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात और पहलगाम में हुए हालिया आतंकवादी हमले ने एक बार फिर भारत को 65 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक भूल की याद दिला दी है, जब उसने युद्ध में जीता हुआ रणनीतिक ‘हाजी पीर दर्रा’ कूटनीतिक मेज़ पर पाकिस्तान को लौटा दिया था। यह दर्रा पीर पंजाल की बेहद दुर्गम माउंटेन रेंज में स्थित है और जम्मू-कश्मीर के पुंछ को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के रावलकोट से जोड़ता है। इसीलिए समुद्रतल से 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हाजी पीर आज भी कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ का सबसे अहम और सेफ रास्ता बना हुआ है।

रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम हाजी पीर पर दोबारा कब्जा जरूरी

यदि भारत ने हाजी पीर दर्रे को अपने नियंत्रण में बनाए रखा होता, तो पाकिस्तान की घुसपैठ की क्षमता काफी सीमित हो जाती। साथ ही यहां से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर अच्छी तरह से नज़र भी रखी जा सकती है। अगर ये दर्रा भारत के पास होता तो जम्मू के पुंछ और कश्मीर के उरी के बीच की मौजूदा दूरी 282 किलोमीटर से घटकर सिर्फ 56 किलोमीटर ही रह जाती, इससे जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच कनेक्ट और मिलिट्री लॉजिस्टिक्स काफी बेहतर हो जातीं।
बंटवारे से पहले, जब श्रीनगर-जम्मू का मौजूदा मार्ग (रामबन होते हुए) इस रूप में नहीं था, तब हाजी पीर ही जम्मू से कश्मीर घाटी को जोड़ने का मुख्य रास्ता था। हालांकि 1948 में इस दर्रे पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था।

1965 की जंग: जब भारतीय जाँबाज़ों ने फहराया हाजी पीर पर तिरंगा

वर्ष 1962 में भारत, चीन से युद्ध हार चुका था। देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के असामयिक निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे और उनकी छवि एक कमजोर-उदार पीएम के तौर पर पेश की गई थी। भारत की आर्थिक स्थिति भी ख़ास अच्छी नहीं थी-यहां तक कि भारत को गेंहू भी अमेरिका से मंगाना पड़ता था। ऐसे में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को लगा कि यही भारत पर हमला करने और कश्मीर जीतने का सबसे सही मौका है। वर्ष 1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर लॉन्च कर दिया।

1947 की ही तरह एक बार फिर बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक और दूसरे लड़ाकों की कश्मीरी नागरिकों के रूप में घुसपैठ कराई गई। अयूब खान और उनके रणनीतिकारों को यकीन था कि आम कश्मीरी मुस्लिम इन पाकिस्तानी सैनिकों का साथ देंगे लेकिन हुआ उल्टा। कश्मीरियों ने इस घुसपैठ की जानकारी भारतीय सेना को दे दी, जिसके बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तानी घुसपैठिए-सैनिक पकड़े गए या फिर मारे गए। ऑपरेशन जिब्रॉल्टर के जवाब में भारतीय सेना ने भी नियंत्रण रेखा पार की और हाजी पीर की ओर बढ़ना शुरू कर दिया।

ऑपरेशन को लीड कर रहे ब्रिगेडियर ज़ोरावर सिंह बक्शी के निर्देश स्पष्ट थे, बिना हाजी पीर फ़तह किए वापस नहीं लौटना है। हालांकि ये अभियान बिल्कुल भी आसान नहीं था, लेकिन भारतीय सैनिकों की जांबाजी ने इसे मुमकिन बना दिया। वो सर्दी और बारिश की परवाह किए बिना बिल्कुल खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए वहां तक पहुंच गए। संक, लेडवाली गली पर कब्जा करने के बाद आखिरकार 28 अगस्त को हाजी पीर पास पर तिरंगा लहरा दिया गया।

ताशकंद समझौता: जंग में जो जीता- बातचीत की मेज़ पर गंवाया

भारत ने इस युद्ध में पाकिस्तान के लगभग 1,920 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा किया था, जिसमें सियालकोट, लाहौर और हाजी पीर जैसे रणनीतिक स्थान शामिल थे। इसके मुकाबले पाकिस्तान ने भारत के केवल 550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा किया था। फिर भी 10 जनवरी 1966 को हुए ताशकंद समझौते में भारत ने एकतरफा रूप से युद्ध में जीते गए इलाके लौटा दिए। इनमें हाजी पीर का रणनीतिक रूप से अहम दर्रा भी शामिल था।

पाकिस्तान को हाजी पीर का गिफ्ट: कश्मीर के भूगोल की अनदेखी

हाजी पीर पर कब्जा करने में बेहद अहम भूमिका निभाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल रंजीत सिंह दयाल (महावीर चक्र विजेता) ने कहा था, “हमारे पास रणनीतिक बढ़त थी, पर हमने गलती की… हमारे लोग नक्शे नहीं पढ़ते।” अन्य सैन्य रणनीतिकारों ने भी हाजी पीर को पाकिस्तान को लौटाए जाने के फैसले पर निराशा जताई थी।

1971 और 1999: वो दो मौके जब ये भूल सुधारी जा सकती थी

भारत के पास हाजी पीर दर्रा दोबारा हासिल करने के दो और मौके मिले थे।पहला 1971 में और दूसरा 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान, लेकिन अलग प्राथमिकताओं की वजह से इन मौकों को गंवा दिया गया। 1971 में भारत के पास पाकिस्तान के 93,000 युद्धबंदी थे। ज़ाहिर सी बात है कि बातचीत की मेज़ पर भारत ज्यादा मज़बूत था, लेकिन इसके बावजूद भारत को न तो हाजी पीर मिला और न ही वादे के मुताबिक़ पाकिस्तान ने उसे छंब का जीता हुआ इलाका लौटाया।

क्या अब भूल सुधारेगा भारत?

जनवरी 2024 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने माना था कि यदि 1965 के युद्ध में हासिल की गई रणनीतिक बढ़त को स्थाई रूप से क़ायम रखा गया होता, तो आतंकवाद की समस्या काफी हद तक हल हो चुकी होती। उन्होंने कहा, “हमारी सेना ने हाजी पीर में तिरंगा फहराया था, अगर उसे लौटाया न गया होता तो PoK से घुसपैठ के रास्ते बंद हो जाते।” अब जबकि पाकिस्तान एक बार फिर भारत को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहा है, तब जरूरी है कि भारत अपनी सामरिक सोच को दोबारा परिभाषित करे और इस भूगोलिक व रणनीतिक भूल को सुधारने का प्रयास करे। वैसे भी इस वक्त देश का नेतृत्व नरेंद्र मोदी के रूप में एक ऐसे नेता के हाथ में है, जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए शक्ति के इस्तेमाल से भी नहीं कतराता और बातचीत की मेज़ पर तो वो दुनिया का सबसे टफ निगोशिएटर है ही।

Tags: 1965 War1965 का युद्धHaji Pir PassIndiaOperation GibraltarPakistanTashkent Agreementऑपरेशन जिब्रॉल्टरताशकंद समझौतापाकिस्तानभारतहाजी पीर दर्रा
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