दिल्ली की सियासत में आज वह भूचाल आया है जिसकी कल्पना शायद अरविंद केजरीवाल ने कभी नहीं की होगी। आम आदमी पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक, राज्यसभा सांसद और संस्थापक सदस्य राघव चड्ढा ने पार्टी को अलविदा कह दिया है। यह केवल एक इस्तीफा नहीं है, बल्कि राज्यसभा में ‘आप’ के अस्तित्व पर एक गहरा प्रहार है। राघव ने न केवल पार्टी छोड़ी, बल्कि अपने साथ दो-तिहाई सांसदों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय का ऐतिहासिक ऐलान भी कर दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनके शब्दों में वह टीस साफ दिखी, जो पिछले कई महीनों से पार्टी के भीतर सुलग रही थी।
‘गलत पार्टी में सही आदमी’: राघव का दर्द और सिद्धांतों की दुहाई
एक बेहद नाटकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ बैठे राघव चड्ढा ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “मैंने अपनी जवानी के 15 साल इस पार्टी को दिए, इसे अपने खून-पसीने से सींचा। लेकिन आज भारी मन से कहना पड़ रहा है कि आम आदमी पार्टी उन आदर्शों और नैतिकता से पूरी तरह भटक गई है जिसके लिए इसे बनाया गया था।” राघव ने चुटीले अंदाज में खुद को ‘गलत पार्टी में सही आदमी’ बताया। उन्होंने कहा कि पार्टी अब देश हित के बजाय निजी फायदों के लिए काम कर रही है, जिसके कारण वे लंबे समय से ‘घुटन’ महसूस कर रहे थे।
राज्यसभा में ‘आप’ का किला ढहा: 2/3 सांसदों के साथ विलय का मास्टरस्ट्रोक
राघव चड्ढा ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए वह बम फोड़ा जिसने विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी। उन्होंने बताया कि राज्यसभा में ‘आप’ के 10 में से 7 सांसद (दो-तिहाई से ज्यादा) उनके साथ हैं और उन्होंने बीजेपी में विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस फेहरिस्त में हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं। इस टूट के बाद अब राज्यसभा में अरविंद केजरीवाल के पास केवल तीन सांसद (संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलबीर सिंह सिच्चेवाल) ही बचे हैं।
बगावत की पटकथा: दिल्ली की हार और संदीप पाठक की अनदेखी
इस महाबगावत के पीछे की कहानी दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार और उसके बाद पार्टी के भीतर मची आंतरिक खींचतान से जुड़ी है। सूत्रों के अनुसार, दिल्ली की विफलता के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के मुख्य रणनीतिकार संदीप पाठक को हाशिए पर धकेल दिया था। 2022 के पंजाब चुनाव के ‘आर्किटेक्ट’ माने जाने वाले पाठक को अहम फैसलों से बाहर कर दिया गया और उन्हें केवल छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों तक सीमित कर दिया गया। वहीं, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और आतिशी जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण राज्यों की कमान सौंपी गई। इसी ‘सौतेले’ व्यवहार ने पाठक और राघव जैसे युवा नेताओं को बगावत की राह पर धकेल दिया।
संसद में कमजोर हुई ‘आप’: केजरीवाल के लिए अब तक का सबसे बड़ा संकट
आम आदमी पार्टी के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह सीधे तौर पर संसद में उनकी ताकत को आधा कर देता है। स्वाति मालीवाल पहले ही बगावती तेवर अपना चुकी थीं, लेकिन अब राघव और संदीप पाठक जैसे ‘रणनीतिक दिमागों’ का जाना पार्टी की सांगठिक एकता को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर देता है। राघव ने स्पष्ट किया कि वे अब ‘पार्टी’ से दूर होकर ‘जनता’ की ओर बढ़ रहे हैं। बीजेपी में इस बड़े गुट के विलय से न केवल राज्यसभा के समीकरण बदलेंगे, बल्कि आने वाले समय में पंजाब की राजनीति में भी बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
क्या अब ‘AAP’ का अस्तित्व खतरे में है?
यह इस्तीफा और विलय उस समय हुआ है जब पार्टी पहले से ही कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रही है। संस्थापक सदस्यों का इस तरह से साथ छोड़ना और पार्टी पर ‘सिद्धांतों से भटकने’ का आरोप लगाना, केजरीवाल के ‘स्वच्छ राजनीति’ के नैरेटिव पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। राघव चड्ढा का यह कदम दिल्ली और पंजाब की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है, जहाँ बीजेपी अब सीधे तौर पर ‘आप’ के कैडर और नेतृत्व में सेंध लगाने में सफल रही है।




























