राज्य सरकार ने पहले स्कूलों में वंदे मातरम् को अनिवार्य करने के बाद अब राज्य के सभी मान्यता प्राप्त मदरसों में भी इसे गाना जरूरी कर दिया है। सरकार का कहना है कि यह फैसला किसी तरह का विभाजन पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि सभी छात्रों के बीच साझा राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए लिया गया है।
19 मई को मदरसा शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले सभी मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान कक्षाएं शुरू होने से पहले वंदे मातरम् गाया जाएगा। यह नियम सरकारी मॉडल मदरसों, सहायता प्राप्त मदरसों, मान्यता प्राप्त संस्थानों और गैर सहायता प्राप्त संस्थानों पर समान रूप से लागू होगा। इसके साथ ही पुराने सभी निर्देश रद्द कर दिए गए हैं और अब एक समान व्यवस्था लागू की गई है।
यह फैसला उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत पहले ही स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाना अनिवार्य किया जा चुका है। अब मदरसों में भी यही नियम लागू होने से सरकार ने सभी शैक्षणिक संस्थानों में एक समान नागरिक परंपरा स्थापित करने की कोशिश की है।
सभी संस्थानों में एक जैसी सुबह की शुरुआत
इस आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य के सभी मान्यता प्राप्त संस्थानों में वंदे मातरम् एक साझा सुबह की परंपरा बने। अधिकारियों का मानना है कि विविधताओं वाले समाज में यह जरूरी है कि स्कूल और मदरसे, भले अलग व्यवस्थाओं के तहत चलते हों, लेकिन उनमें कुछ साझा राष्ट्रीय परंपराएं हों।
सरकार का कहना है कि यह कदम किसी संस्थान की अलग पहचान खत्म करने के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें एक बड़े राष्ट्रीय ढांचे से जोड़ने के लिए है। इससे सभी छात्र अपने दिन की शुरुआत एक समान राष्ट्रीय भावना के साथ करेंगे।
शिक्षा के जरिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की कोशिश
इस नीति के समर्थकों का मानना है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक भी रहा है। लंबे समय से इसे राष्ट्रीय एकता और सामूहिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
सरकार का मानना है कि स्कूल और मदरसे केवल पढ़ाई की जगह नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे संस्थान भी हैं जहां छात्रों में साझा राष्ट्रीय मूल्यों का निर्माण होता है। इसलिए एक समान प्रार्थना सभा समाज में एकता को मजबूत कर सकती है।
राष्ट्रीय स्तर की नीति के अनुरूप कदम
पश्चिम बंगाल का यह फैसला हाल के राष्ट्रीय घटनाक्रमों से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है। इसी साल केंद्र सरकार ने वंदे मातरम् को जन गण मन के साथ आधिकारिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में विशेष महत्व देने का फैसला किया था।
देश के कई राज्यों में यह गीत पहले से ही सरकारी और शैक्षणिक आयोजनों का हिस्सा है, हालांकि कुछ जगहों पर इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी देखने को मिले हैं। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस हुई है।
एकता की दिशा में कदम
मदरसों में भी वंदे मातरम् को अनिवार्य करके राज्य सरकार ने सभी शैक्षणिक संस्थानों को एक साझा नागरिक ढांचे में जोड़ने की कोशिश की है। सरकार का कहना है कि समाज में एकता तब मजबूत होती है जब लोग कुछ साझा परंपराओं और प्रतीकों को साथ मिलकर अपनाते हैं।
इस फैसले के जरिए वंदे मातरम् को एक ऐसे प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अलगाव नहीं, बल्कि एकता और साझा राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देता है।
































